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Showing posts from July, 2021

आने वाला कल*

*आने वाला कल*  (जरूर पढ़े)🙏🏻 एक बार मैं अपने अंकल के साथ एक बैंक में गया, क्यूँकि उन्हें कुछ पैसा कही ट्रान्सफ़र करना था। ये स्टेट बैंक एक छोटे से क़स्बे के छोटे से इलाक़े में था। वहां एक घंटे बिताने के बाद जब हम वहां से निकले तो उन्हें पूछने से मैं अपने आप को रोक नहीं पाया। अंकल क्यूँ ना हम घर पर ही इंटर्नेट बैंकिंग चालू कर ले? अंकल ने कहा ऐसा मैं क्यूँ करूँ ? तो मैंने कहा कि अब छोटे छोटे ट्रान्सफ़र के लिए बैंक आने की और एक घंटा टाइम ख़राब करने की ज़रूरत नहीं, और आप जब चाहे तब घर बैठे अपनी ऑनलाइन शॉपिंग भी कर सकते हैं। हर चीज़ बहुत आसान हो जाएगी। मैं बहुत उत्सुक था उन्हें नेट बैंकिंग की दुनिया के बारे में विस्तार से बताने के लिए।  इस पर उन्होंने पूछा ....अगर मैं ऐसा करता हूँ तो क्या मुझे घर से बाहर निकलने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी?  मुझे बैंक जाने की भी ज़रूरत नहीं? मैंने उत्सुकतावश कहा, हाँ आपको कही जाने की जरुरत नही पड़ेगी और आपको किराने का सामान भी घर बैठे ही डिलिवरी हो जाएगा और ऐमज़ॉन, फ़्लिपकॉर्ट व स्नैपडील सबकुछ घर पे ही डिलिवरी करते हैं। उन्होने इस बात पे जो जवाब ...

25. वेताल पच्चीसी :- पच्चीसवा व्रतांत ( वेताल पच्चीस का अंतिम पाठ )

25. वेताल पच्चीसी :- पच्चीसवा व्रतांत ( वेताल पच्चीस का अंतिम पाठ ) वेताल के कहने पर राजा विक्रमादित्य मुर्दे को लेकर योगी के द्वार पहुंचा। योगी राजा और मुर्दे को देखकर बहुत प्रसन्न हुआ। बोला, ‘हे राजन्! तुमने यह कठिन काम करके मेरे साथ बड़ा उपकार किया है। तुम सचमुच सारे राजाओं में श्रेष्ठ हो।’इतना कहकर उसने मुर्दे को उसके कंधे से उतार लिया और उसे स्नान करा कर फूलों की मालाओं से सजा कर रख दिया। फिर मंत्र-बल से वेताल का आवाहन करके उसकी पूजा की। पूजा के बाद उसने राजा से कहा, ‘हे राजन्! तुम शीश झुका कर इसे प्रणाम करो।’राजा को वेताल की बात याद आ गई। उसने कहा, ‘मैं राजा हूं, मैंने कभी किसी के आगे सिर नहीं झुकाया। आप पहले सिर झुका कर बता दीजिए।’ योगी ने जैसे ही सिर झुकाया, राजा ने तलवार से उसका सिर काट दिया। वेताल बड़ा खुश हुआ। बोला, ‘राजन्, यह योगी विद्याधरों का स्वामी बनना चाहता था। अब तुम बनोगे। मैंने तुम्हें बहुत हैरान किया है। तुम जो चाहो सो मांग लो।’ राजा ने कहा, ‘अगर आप मुझसे खुश हैं तो मेरी प्रार्थना है कि आपने जो चौबीस कहानियां सुनाईं, वे, और पच्चीसवीं यह, सारे संसार में प्रसिद्ध हो ...

24. वेताल पच्चीसी :- चौबीसवा व्रतांत ( आपस में क्या रिश्ता हुआ ? )

24. वेताल पच्चीसी :- चौबीसवा व्रतांत ( आपस में क्या रिश्ता हुआ ? ) किसी नगर में मांडलिक नाम का राजा राज्य करता था। उसकी पत्नी का नाम चंडवती था। वह मालव देश के राजा की लड़की थी। उसके घर लावण्यवती नाम की एक कन्या थी। जब वह विवाह के योग्य हुई तो राजा के भाई-बन्धुओं ने उसका राज्य छीन लिया और उसे देश-निकाला दे दिया। राजा रानी और कन्या को साथ लेकर मालव देश को चल दिया। रात को वे एक वन में ठहरे। पहले दिन चल कर भीलों की नगरी में पहुंचे। राजा ने रानी और बेटी से कहा कि तुम लोग वन में छिप जाओ, नहीं तो भील तुम्हें परेशान करेंगे। वे दोनों वन में चली गईं। इसके बाद भीलों ने राजा पर हमला किया। राजा ने मुकाबला किया, पर अंत में वह मारा गया। भील चले गए। उसके जाने पर रानी और बेटी जंगल से निकल कर आईं और राजा को मरा देखकर बड़ी दुखी हुईं।वे दोनों शोक करती हुईं एक तालाब के किनारे पहुंची। उसी समय वहां चंडसिंह नाम का साहूकार अपने लड़के के साथ, घोड़े पर चढ़कर, शिकार खेलने के लिए उधर आया। दो स्त्रियों के पैरों के निशान देखकर साहूकार अपने बेटे से बोला, ‘अगर यह स्त्रियां मिल जाए तो तुम जिससे चाहो, विवाह कर लेना।’ लड...

23. वेताल पच्चीसी :- तेईसवा व्रतांत ( योगी पहले क्यों तो रोया, फिर क्यों हंसा ? )

23. वेताल पच्चीसी :- तेईसवा व्रतांत ( योगी पहले क्यों तो रोया, फिर क्यों हंसा ? ) कलिंग देश में शोभावती एक नगर है। उसमें राजा प्रद्युम्न राज्य करता था। उसी नगरी में एक ब्राह्मण रहता था, जिसके देवसोम नाम का बड़ा ही योग्य पुत्र था। जब देवसोम सोलह बरस का हुआ और सारी विद्याएं सीख चुका तो एक दिन दुर्भाग्य से वह मर गया। बूढ़े मां-बाप बड़े दुखी हुए। चारों ओर शोक छा गया। जब लोग उसे लेकर श्मशान में पहुंचे तो रोने-पीटने की आवाज सुनकर एक योगी अपनी कुटिया में से निकलकर आया। पहले तो वह खूब जोर से रोया, फिर खूब हंसा, फिर योग-बल से अपना शरीर छोड़ कर उस लड़के के शरीर में घुस गया। लड़का उठ खड़ा हुआ। उसे जीता देखकर सब बड़े खुश हुए। वह लड़का वही तपस्या करने लगा।इतना कहकर वेताल बोला, ‘राजन्, यह बताओ कि यह योगी पहले क्यों तो रोया, फिर क्यों हंसा?’ राजा ने कहा, ‘इसमें क्या बात है! वह रोया इसलिए कि जिस शरीर को उसके मां-बाप ने पाला-पोसा और जिससे उसने बहुत-सी शिक्षाएं प्राप्त कीं, उसे छोड़ रहा था। हंसा इसलिए कि वह नए शरीर में प्रवेश करके और अधिक सिद्धियां प्राप्त कर सकेगा।’ राजा का यह जवाब सुनकर वेताल फिर पेड़...

22. वेताल पच्चीसी :- बाइसवा व्रतांत ( अपराध किसने किया ? )

22. वेताल पच्चीसी :- बाइसवा व्रतांत ( अपराध किसने किया ? ) कुसुमपुर नगर में एक राजा राज्य करता था। उसके नगर में एक ब्राह्मण था, जिसके चार बेटे थे। लड़कों के सयाने होने पर ब्राह्मण मर गया और ब्राह्मणी उसके साथ सती हो गई। उनके रिश्तेदारों ने उनका धन छीन लिया। वे चारों भाई नाना के यहां चले गए। लेकिन कुछ दिन बाद वहां भी उनके साथ बुरा व्यवहार होने लगा। तब सबने मिलकर सोचा कि कोई विद्या सीखनी चाहिए। यह सोच करके चारों चार दिशाओं में चल दिए। कुछ समय बाद वे विद्या सीखकर मिले। एक ने कहा- ‘मैंने ऐसी विद्या सीखी है कि मैं मरे हुए प्राणी की हड्डियों पर मांस चढ़ा सकता हूं।’ दूसरे ने कहा- ‘मैं उसके खाल और बाल पैदा कर सकता हूं।’ तीसरे ने कहा- ‘मैं उसके सारे अंग बना सकता हूं।’चौथा बोला- ‘मैं उसमें जान डाल सकता हूं।’ फिर वे अपनी विद्या की परीक्षा लेने जंगल में गए। वहां उन्हें एक मरे शेर की हड्डियां मिलीं। उन्होंने उसे बिना पहचाने ही उठा लिया।  एक ने मांस डाला, दूसरे ने खाल और बाल पैदा किए, तीसरे ने सारे अंग बनाए और चौथे ने उसमें प्राण डाल दिए। शेर जीवित हो उठा और सबको खा गया।यह कथा सुनाकर बेताल बोला,...

21. वेताल पच्चीसी :- इक्कीसवा व्रतांत ( ज्यादा राग में अंधा कौन था ? )

21. वेताल पच्चीसी :- इक्कीसवा व्रतांत ( ज्यादा राग में अंधा कौन था ? ) विशाला नाम की नगरी में पद्‍मनाभ नाम का राजा राज्य करता था। उसी नगर में अर्थदत्त नाम का एक साहूकार रहता था। अर्थदत्त के अनंगमंजरी नाम की एक सुन्दर कन्या थी। उसका विवाह साहूकार ने एक धनी साहूकार के पुत्र मणिवर्मा के साथ कर दिया। मणिवर्मा पत्नी को बहुत चाहता था, पर पत्नी उसे प्यार नहीं करती थी। एक बार मणिवर्मा कहीं गया। उसके जाने के बाद अनंगमंजरी की राजपुरोहित के लड़के कमलाकर पर निगाह पड़ी तो वह उसे चाहने लगी। पुरोहित का लड़का भी लड़की को चाहने लगा। अनंगमंजरी ने महल के बाग में जाकर चंडीदेवी को प्रणाम कर कहा, ‘यदि मुझे इस जन्म में कमलाकर पति के रूप में न मिले तो अगले जन्म में मिले।’ यह कहकर वह अशोक के पेड़ से दुपट्टे की फांसी बना कर मरने को तैयार हो गई। तभी उसकी सखी आ गई और उसे यह वचन देकर ले गई कि कमलाकर से मिला देगी। दासी सबेरे कमलाकर के यहां गई और दोनों के बगीचे में मिलने का प्रबंध कर आई। कमलाकर आया और उसने अनंगमंजरी को देखा। वह बेताब होकर मिलने के लिए दौड़ा। मारे खुशी के अनंगमंजरी के हृदय की गति रुक गई और वह मर गई। ...

20. वेताल पच्चीसी:- बीसवा व्रतांत ( बालक क्यो हँसा ? )

20. वेताल पच्चीसी:- बीसवा व्रतांत ( बालक क्यो हँसा ? ) चित्रकूट नगर में एक राजा रहता था। एक दिन वह शिकार खेलने जंगल में गया। घूमते-घूमते वह रास्ता भूल गया और अकेला रह गया। थक कर वह एक पेड़ की छाया में लेटा कि उसे एक ऋषि-कन्या दिखाई दी। उसे देखकर राजा उस पर मोहित हो गया। थोड़ी देर में ऋषि स्वयं आ गये। ऋषि ने पूछा: तुम यहाँ कैसे आये हो? राजा ने कहा: मैं शिकार खेलने आया हूँ। ऋषि बोले: बेटा, तुम क्यों जीवों को मारकर पाप कमाते हो? राजा ने वादा किया कि मैं अब कभी शिकार नहीं खेलूँगा। खुश होकर ऋषि ने कहा: तुम्हें जो माँगना हो, माँग लो। राजा ने ऋषि-कन्या माँगी और ऋषि ने खुश होकर दोनों का विवाह कर दिया। राजा जब उसे लेकर चला तो रास्ते में एक भयंकर राक्षस मिला। वह बोला: मैं तुम्हारी रानी को खाऊँगा। अगर चाहते हो कि वह बच जाय तो सात दिन के भीतर एक ऐसे ब्राह्मण-पुत्र का बलिदान करो, जो अपनी इच्छा से अपने को दे और उसके माता-पिता उसे मारते समय उसके हाथ-पैर पकड़ें। डर के मारे राजा ने उसकी बात मान ली। वह अपने नगर को लौटा और अपने दीवान को सब हाल कह सुनाया। दीवान ने कहा: आप परेशान न हों, मैं उपाय करता हूँ। ...

19. वेताल पच्चीसी:- उन्नीसवा व्रतांत ( किसको पिण्ड देना चाहिए ? )

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वेताल पच्चीसी:- उन्नीसवा व्रतांत ( किसको पिण्ड देना चाहिए ? ) वक्रोलक नामक नगर में सूर्यप्रभ नाम का राजा राज्य करता था। उसके कोई संतान नहीं थी। उसी समय में एक दूसरी नगरी में धनपाल नाम का एक साहूकार रहता था। उसकी स्त्री का नाम हिरण्यवती था और उसके धनवती नाम की एक पुत्री थी। जब धनवती बड़ी हुई तो धनपाल मर गया और उसके नाते-रिश्तेदारों ने उसका धन ले लिया। हिरण्यवती अपनी लड़की को लेकर रात के समय नगर छोड़कर चल दी। रास्ते में उसे एक चोर सूली पर लटकता हुआ मिला। वह मरा नहीं था। उसने हिरण्यवती को देखकर अपना परिचय दिया और कहा, ‘मैं तुम्हें एक हजार अशर्फियां दूंगा। तुम अपनी लड़की का ब्याह मेरे साथ कर दो।’ हिरण्यवती ने कहा, ‘तुम तो मरने वाले हो।’ चोर बोला, ‘मेरे कोई पुत्र नहीं है और निपूते की परलोक में सद्‍गति नहीं होती। अगर मेरी आज्ञा से और किसी से भी इसके पुत्र पैदा हो जाएगा तो मुझे सद्‍गति मिल जाएगी।’ हिरण्यवती ने लोभ के वश होकर उसकी बात मान ली और धनवती का ब्याह उसके साथ कर दिया। चोर बोला, ‘इस बड़ के पेड़ के नीचे अशर्फियां गड़ी हैं, सो ले लेना और मेरे प्राण निकलने पर मेरा क्रिया-कर्म करके तुम अपन...

18. वेताल पच्चीसी :- अठारहवा व्रतांत ( विद्या क्यों नष्ट हो गई ? )

18. वेताल पच्चीसी :- अठारहवा व्रतांत ( विद्या क्यों नष्ट हो गई ? ) उज्जैन नगरी में महासेन नाम का राजा राज्य करता था। उसके राज्य में वासुदेव शर्मा नाम का एक ब्राह्मण रहता था, जिसके गुणाकर नाम का बेटा था। गुणाकर बड़ा जुआरी था। वह अपने पिता का सारा धन जुए में हार गया। ब्राह्मण ने उसे घर से निकाल दिया। वह दूसरे नगर में पहुंचा। वहां उसे एक योगी मिला। उसे हैरान देखकर उसने कारण पूछा तो उसने सब बता दिया। योगी ने कहा, ‘लो, पहले कुछ खा लो।’ गुणाकर ने जवाब दिया, ‘मैं ब्राह्मण का बेटा हूं। आपकी भिक्षा कैसे खा सकता हूं?’ इतना सुनकर योगी ने सिद्धि को याद किया। वह आई। योगी ने उससे आवभगत करने को कहा। सिद्धि ने एक सोने का महल बनवाया और गुणाकर उसमें रात को अच्छी तरह से रहा। सबेरे उठते ही उसने देखा कि महल आदि कुछ भी नहीं है। उसने योगी से कहा, ‘महाराज, उस स्त्री के बिना अब मैं नहीं रह सकता।’ योगी ने कहा, ‘वह तुम्हें एक विद्या प्राप्त करने से मिलेगी और वह विद्या जल के अंदर खड़े होकर मंत्र जपने से मिलेगी। लेकिन जब वह लड़की तुम्हें मेरी सिद्धि से मिल सकती है तो तुम विद्या प्राप्त करके क्या करोगे?’ गुणाकर ने ...

17. वेताल पच्चीसी :- सत्रहवा व्रतांत ( अधिक साहसी कोन ? )

17. वेताल पच्चीसी :- सत्रहवा व्रतांत ( अधिक साहसी कोन ? ) चंद्रशेखर नगर में रत्नदत्त नाम का एक सेठ रहता था। उसके एक लड़की थी। उसका नाम था उन्मादिनी। जब वह बड़ी हुई तो रत्नदत्त ने राजा के पास जाकर कहा कि आप चाहें तो उससे ब्याह कर लीजिए। राजा ने तीन दासियों को लड़की को देख आने को कहा। उन्होंने उन्मादिनी को देखा तो उसके रूप पर मुग्ध हो गईं, लेकिन उन्होंने यह सोचकर कि राजा उसके वश में हो जाएगा, आकर कह दिया कि वह तो कुलक्षिणी है, राजा ने सेठ से इंकार कर दिया। इसके बाद सेठ ने राजा के सेनापति बलभद्र से उसका विवाह कर दिया। वे दोनों अच्छी तरह से रहने लगे। किसानों कि खबरों के लिए click करे :- एक दिन राजा की सवारी उस रास्ते से निकली। उस समय उन्मादिनी अपने कोठे पर खड़ी थी। राजा की उस पर निगाह पड़ी तो वह उस पर मोहित हो गया। उसने पता लगाया। मालूम हुआ कि वह सेठ की लड़की है। राजा ने सोचा कि हो-न-हो, जिन दासियों को मैंने देखने भेजा था, उन्होंने छल किया है। राजा ने उन्हें बुलाया तो उन्होंने आकर सारी बात सच-सच कह दी। इतने में सेनापति वहां आ गया। उसे राजा की बैचेनी मालूम हुई। उसने कहा, ‘स्वामी उन्मादिनी क...

16. वेताल पच्चीसी :- सोलहवा व्रतांत ( बड़ा काम किसने किया ? )

16. वेताल पच्चीसी :- सोलहवा व्रतांत ( बड़ा काम किसने किया ? ) हिमाचल पर्वत पर गंधर्वों का एक नगर था, जिसमें जीमूतकेतु नामक राजा राज्य करता था। उसके यहां एक लड़का था, जिसका नाम जीमूतवाहन था। बाप-बेटे दोनों भले थे। धर्म-कर्म मे लगे रहते थे। इससे प्रजा के लोग बहुत स्वच्छंद हो गए और एक दिन उन्होंने राजा के महल को घेर लिया। राजकुमार ने यह देखा तो पिता से कहा कि आप चिंता न करें। मैं सबको मार भगाऊंगा। राजा बोला, ‘नहीं, ऐसा मत करो। युधिष्ठिर भी महाभारत करके पछताए थे।’ इसके बाद राजा अपने गोत्र के लोगों को राज्य सौंप राजकुमार के साथ मलयाचल पर जाकर मढ़ी बना कर रहने लगा। वहां जीमूतवाहन की एक ऋषि के बेटे से दोस्ती हो गई। एक दिन दोनों पर्वत पर भवानी के मंदिर में गए तो दैवयोग से उन्हें मलयकेतु राजा की पुत्री मिली। दोनों एक-दूसरे पर मोहित हो गए। जब कन्या के पिता को मालूम हुआ तो उसने अपनी बेटी उसे ब्याह दी। एक दिन की बात है कि जीमूतवाहन को पहाड़ पर एक सफेद ढे़र दिखाई दिया। पूछा तो मालूम हुआ कि पाताल से बहुत-से नाग आते हैं, जिन्हें गरुड़ खा लेता है। यह ढे़र उन्हीं की हड्डियों का है। उसे देखकर जीमूतवाहन ...

15. वेताल पच्चीसी :- पंद्रहवा व्रतांत ( दोनों में से पत्नी किसकी ? )

15. वेताल पच्चीसी :- पंद्रहवा व्रतांत ( दोनों में से पत्नी किसकी ? ) नेपाल देश में शिवपुरी नामक नगर में यशकेतु नामक राजा राज्य करता था। उसके घर चंद्रप्रभा नाम की रानी और शशिप्रभा नाम की लड़की थी। जब राजकुमारी बड़ी हुई तो एक दिन वसंत उत्सव देखने बाग में गई। वहां एक ब्राह्मण का लड़का आया हुआ था। दोनों ने एक-दूसरे को देखा और प्रेम करने लगे। इसी बीच एक पागल हाथी वहां दौड़ता हुआ आया। ब्राह्मण का लड़का राजकुमारी को उठाकर दूर ले गया और हाथी से बचा दिया। शशिप्रभा महल में चली गई; पर ब्राह्मण के लड़के के लिए व्याकुल रहने लगी। उधर ब्राह्मण के लड़के की भी बुरी दशा थी। वह एक सिद्धगुरु के पास पहुंचा और अपनी इच्छा बताई। उसने एक योग-गुटिका अपने मुंह में रखकर ब्राह्मण का रूप बना लिया और एक गुटिका ब्राह्मण के लड़के के मुंह में रखकर उसे सुंदर लड़की बना दिया। राजा के पास जाकर कहा, ‘मेरा एक ही बेटा है। उसके लिए मैं इस लड़की को लाया था; पर लड़का न जाने कहां चला गया। आप इसे यहां रख ले। मैं लड़के को ढूंढ़ने जाता हूं। मिल जाने पर इसे ले जाऊंगा।’ सिद्धगुरु चला गया और लड़की के भेष में ब्राह्मण का लड़का राजकुमारी...

14. वेताल पच्चीसी :- चौदहवा व्रतांत ( चोर ज़ोर-ज़ोर से क्यों रोया और फिर हँसा? )

14. वेताल पच्चीसी :- चौदहवा व्रतांत ( चोर ज़ोर-ज़ोर से क्यों रोया और फिर हँसा? ) अयोध्या नगरी में वीरकेतु नाम का राजा राज्य करता था। उसके राज्य में रत्नदत्त नाम का एक साहूकार था, जिसके रत्नवती नाम की एक लड़की थी। वह सुंदर थी। वह पुरुष के भेष में रहा करती थी और किसी से भी ब्याह नहीं करना चाहती थी। उसका पिता बड़ा दुखी था। इसी बीच नगर में खूब चोरियां होने लगी। प्रजा दुखी हो गई। कोशिश करने पर भी जब चोर पकड़ में न आया, तो राजा स्वयं उसे पकड़ने के लिए निकला। एक दिन रात को जब राजा भेष बदल कर घूम रहा था, तो उसे परकोटे के पास एक आदमी दिखाई दिया। राजा चुपचाप उसके पीछे चल दिया। चोर ने कहा, ‘तब तो तुम मेरे साथी हो। आओ, मेरे घर चलो।’ दोनो घर पहुंचे। उसे बिठा कर चोर किसी काम के लिए चला गया। इसी बीच उसकी दासी आई और बोली, ‘तुम यहां क्यों आए हो? चोर तुम्हें मार डालेगा। भाग जाओ।’ राजा ने ऐसा ही किया। फिर उसने फौज लेकर चोर का घर घेर लिया। जब चोर ने यह देखा तो वह लड़ने के लिए तैयार हो गया। दोनों में खूब लड़ाई हुई। अंत में चोर हार गया। राजा उसे पकड़ कर राजधानी में लाया और सूली पर लटकाने का हुक्म दे दिया। स...

13. वेताल पच्चीसी :- तेरहवा व्रतांत ( तीनों में अपराधी कौन है? )

13. वेताल पच्चीसी :- तेरहवा व्रतांत ( तीनों में अपराधी कौन है? ) बनारस में देवस्वामी नाम का एक ब्राह्मण रहता था। उसके यहां हरिदास नाम का पुत्र था। हरिदास की बड़ी सुंदर पत्नी थी। नाम था लावण्यवती। एक दिन वे महल के ऊपर छत पर सो रहे थे कि आधी रात के समय एक गंधर्व-कुमार आकाश में घूमता हुआ उधर से निकला। वह लावण्यवती के रूप पर मुग्ध होकर उसे उड़ा कर ले गया। "वेताल पच्चीसी" की सभी कहानिया एक ही जगह click करे -- जागने पर हरिदास ने देखा कि उसकी स्त्री नही है, तो उसे बड़ा दुख हुआ और वह मरने के लिए तैयार हो गया। लोगों के समझाने पर वह मान तो गया; लेकिन यह सोचकर कि तीरथ करने से शायद पाप दूर हो जाए और स्त्री मिल जाए, वह घर से निकल पड़ा। चलते-चलते वह किसी गांव में एक ब्राह्मण के घर पहुंचा। उसे भूखा देख ब्राह्मणी ने उसे कटोरा भरकर खीर दे दी और तालाब के किनारे बैठ कर खाने को कहा। हरिदास खीर लेकर एक पेड़ के नीचे आया और कटोरा वहां रखकर तालाब मे हाथ-मुंह धोने गया। इसी बीच एक बाज किसी सांप को लेकर उसी पेड़ पर आ बैठा ओर जब वह उसे खाने लगा तो सांप के मुंह से जहर टपक कर कटोरे में गिर गया। हरिदास को ...

12. वेताल पच्चीसी :- बारहवा व्रतांत ( दीवान की मृत्यु क्यूँ ? )

12. वेताल पच्चीसी :- बारहवा व्रतांत ( दीवान की मृत्यु क्यूँ ? ) किसी जमाने में अंगदेश में यशकेतु नाम का राजा था। उसके यहां दीर्घदर्शी नाम का बड़ा ही चतुर दीवान था। राजा बड़ा विलासी था। राज्य का सारा बोझ दीवान पर डालकर वह भोग में पड़ गया। दीवान को बहुत दुख हुआ। उसने देखा कि राजा के साथ सब जगह उसकी निंदा होती है। इसलिए वह तीरथ का बहाना करके चल पड़ा। चलते-चलते रास्ते में उसे एक शिव-मंदिर मिला। उसी समय निछिदत्त नाम का एक सौदागर वहां आया और दीवान के पूछने पर उसने बताया कि वह सुवर्णद्वीप में व्यापार करने जा रहा है। दीवान भी उसके साथ हो लिया। दोनों जहाज पर चढ़कर सुवर्णद्वीप पहुंचे और वहां व्यापार करके धन कमा कर लौटे। रास्ते में समुद्र में दीवान को एक कल्पवृक्ष दिखाई दिया। उसकी मोटी-मोटी शाखाओं पर रत्नों से जुड़ा एक पलंग बिछा था। उस पर एक रूपवती कन्या बैठी वीणा बजा रही थी। थोड़ी देर बाद वह गायब हो गई। पेड़ भी नहीं रहा। दीवान बड़ा चकित हुआ। "वेताल पच्चीसी" की सभी कहानिया एक ही जगह click करे -- दीवान ने अपने नगर में लौट कर सारा हाल कह सुनाया। सुनकर राजा उस सुंदरी को पाने के लिए बैचेन ह...

11. वेताल पच्चीसी :- ग्यारवा व्रतांत ( सबसे ज्यादा कोमल कौन ? )

11. वेताल पच्चीसी :- ग्यारवा व्रतांत ( सबसे ज्यादा कोमल कौन ? ) गौड़ देश में वर्धमान नाम का एक नगर था, जिसमें गुणशेखर नाम का राजा राज्य करता था। उसके यहां अभयचंद्र नाम का दीवान था। उस दीवान के समझाने से राजा ने अपने राज्य में शिव और विष्णु की पूजा, गोदान, भूदान, पिंड दान आदि सब बंद कर दिए।नगर में डोंडी पिटवा दी कि जो कोई यह काम करेगा, उसका सबकुछ छीन कर उसे नगर से निकाल दिया जाएगा। एक दिन दीवान ने कहा, ‘महाराज, अगर कोई किसी को दुख पहुंचाता है और उसके प्राण लेता है, तो पाप से उसका जन्म-मरण नहीं छूटता। वह बार-बार जन्म लेता और मरता है। इसलिए मनुष्य का जन्म पाकर धर्म को बढ़ाना चाहिए। आदमी को हाथी से लेकर चींटी तक सबकी रक्षा करनी चाहिए। जो लोग दूसरों के दुख को नहीं समझते और उन्हें सताते हैं, उनकी इस पृथ्वी पर उम्र घटती जाती है और वे लूले-लंगड़े, काने, बौने होकर जन्म लेते हैं।’ राजा ने कहा ‘ठीक है।’ अब दीवान जैसे कहता, राजा वैसे ही करता। दैवयोग से एक दिन राजा मर गया। उसकी जगह उसका बेटा धर्मराज गद्दी पर बैठा। एक दिन उसने किसी बात पर नाराज होकर दीवान को नगर से बाहर निकलवा दिया। कुछ दिन बाद, एक ...

10. वेताल पच्चीसी :- दसवाँ व्रतांत ( अधिक त्यागी कौन ? )

10. वेताल पच्चीसी :- दसवाँ व्रतांत ( अधिक त्यागी कौन ? ) मदनपुर नगर में वीरवर नाम का राजा राज्य करता था। उसके राज्य में एक वैश्य था, जिसका नाम हिरण्यदत्त था। उसके मदनसेना नाम की एक कन्या थी। एक दिन मदनसेना अपनी सखियों के साथ बाग में गई। वहां संयोग से सोमदत्त नामक सेठ का लड़का धर्मदत्त अपने मित्र के साथ आया हुआ था। वह मदनसेना को देखते ही उससे प्रेम करने लगा। घर लौटकर वह सारी रात उसके लिए बैचेन रहा। अगले दिन वह फिर बाग में गया। मदनसेना वहां अकेली बैठी थी। उसके पास जाकर उसने कहा, ‘तुम मुझसे प्यार नहीं करोगी तो मैं प्राण दे दूंगा।’ "वेताल पच्चीसी" की सभी कहानिया एक ही जगह click करे -- मदनसेना ने जवाब दिया, ‘आज से पांचवे दिन मेरी शादी होने वाली है। मैं तुम्हारी नहीं हो सकती।’ वह बोला, ‘मैं तुम्हारे बिना जीवित नहीं रह सकता।’मदनसेना डर गई। बोली, ‘अच्छी बात है। मेरा ब्याह हो जाने दो। मैं अपने पति के पास जाने से पहले तुमसे जरूर मिलूंगी।’ वचन देकर मदनसेना डर गई। उसका विवाह हो गया और वह जब अपने पति के पास गई तो उदास होकर बोली, ‘आप मुझ पर विश्वास करें और मुझे अभय दान दें तो एक बात कहूं।’...

09. वेताल पच्चीसी :- नौवा व्रतांत ( सर्वश्रेष्ठ वर कौन ? )

09. वेताल पच्चीसी :- नौवा व्रतांत ( सर्वश्रेष्ठ वर कौन ? ) चम्मापुर नाम का एक नगर था, जिसमें चम्पकेश्वर नाम का राजा राज्य करता था। उसके सुलोचना नाम की रानी थी और त्रिभुवनसुंदरी नाम की लड़की। राजकुमारी यथा नाम तथा गुण थी। जब वह बड़ी हुई तो उसका रूप और निखर गया। राजा और रानी को उसके विवाह की चिंता हुई। चारों ओर इसकी खबर फैल गई। बहुत-से राजाओं ने अपनी-अपनी तस्वीरें बनवा कर भेजी, पर राजकुमारी ने किसी को भी पसंद नहीं किया। राजा ने कहा, ‘बेटी, कहो तो स्वयंवर करूं?’ लेकिन वह राजी नहीं हुई। आखिर राजा ने तय किया कि वह उसका विवाह उस आदमी के साथ करेगा, जो रूप, बल और ज्ञान, इन तीनों में बढ़ा-चढ़ा होगा। "वेताल पच्चीसी" की सभी कहानिया एक ही जगह click करे -- एक दिन राजा के पास चार देश के चार वर आए। एक ने कहा, ‘मैं एक कपड़ा बनाकर पांच लाख में बेचता हूं, एक लाख देवता को चढ़ाता हूं, एक लाख अपने अंग लगाता हूं, एक लाख स्त्री के लिए रखता हूं और एक लाख से अपने खाने-पीने का खर्च चलाता हूं। इस विद्या को और कोई नहीं जानता।’ दूसरा बोला, ‘मैं जल-थल के पशुओं की भाषा जानता हूं।’ तीसरे ने कहा, ‘मैं इतना श...

08. वेताल पच्चीसी :- आठवाँ व्रतांत ( सबसे बढ़कर कौन ?)

08. वेताल पच्चीसी :- आठवाँ व्रतांत ( सबसे बढ़कर कौन ?) अंग देश के एक गांव में एक धनी ब्राह्मण रहता था। उसके तीन पुत्र थे। एक बार ब्राह्मण ने एक यज्ञ करना चाहा। उसके लिए एक कछुए की जरूरत हुई। उसने तीनों भाइयों को कछुआ लाने को कहा। वे तीनों समुद्र पर पहुंचे। वहां उन्हें एक कछुआ मिल गया। बड़े ने कहा, ‘मैं भोजनचंग हूं, इसलिए कछुए को नहीं छुऊंगा।’ मझला बोला, ‘मैं नारीचंग हूं, मैं नहीं ले जाऊगा।’ सबसे छोटा बोल, ‘मैं शैयाचंग हूं, सो मैं नहीं ले जाऊंगा।’वे तीनों इस बहस में पड़ गए कि उनमें कौन बढ़ कर है। जब वे आपस में इसका फैसला न कर सके तो राजा के पास पहुंचे। राजा ने कहा, ‘आप लोग रूके। मैं तीनों की अलग-अलग जांच करूंगा।’ "वेताल पच्चीसी" की सभी कहानिया एक ही जगह click करे -- इसके बाद राजा ने बढ़िया भोजन तैयार कराया और तीनों खाने बैठे। सबसे बड़े ने कहा, ‘मैं खाना नहीं खाऊंगा। इसमें मुर्दे की गंध आती है।’ वह उठकर चला। राजा ने पता लगाया तो मालूम हुआ कि वह भोजन श्मशान के पास के खेत का बना था। राजा ने कहा, ‘तुम सचमुच भोजनचंग हो, तुम्हें भोजन की पहचान है।’रात के समय राजा ने एक सुंदर वेश्या को...

07. वेताल पच्चीसी :- सातवा व्रतांत ( किसका काम बड़ा हुआ ? )

07. वेताल पच्चीसी :- सातवा व्रतांत ( किसका काम बड़ा हुआ ? ) मिथलावती नाम की एक नगरी थी। उसमें गुणधिप नाम का राजा राज्य करता था। उसकी सेवा करने के लिए दूर देश से एक राजकुमार आया। वह बराबर कोशिश करता रहा, लेकिन राजा से उनकी भेंट न हुई। जो कुछ वह अपने साथ लाया था, वह सब बराबर हो गयाएक दिन राजा शिकार खेलने चला। राजकुमार भी साथ हो लिया। चलते-चलते राजा एक वन में पहुंचा। वहां उसके नौकर-चाकर बिछुड़ गए। राजा के साथ अकेला वह राजकुमार रह गया। उसने राजा को रोका। राजा ने उसकी ओर देखा तो पूछा, ‘तू इतना कमजोर क्यों हो रहा है।’ उसने कहा, ‘इसमें मेरे कर्म का दोष है। मैं जिस राजा के पास रहता हूं, वह हजारों को पालता है, पर उसकी निगाह मेरी और नहीं जाती। राजन् छ: बातें आदमी को हल्का करती हैं- खोटे नर की प्रीति, बिना कारण हंसी, स्त्री से विवाद, असज्जन स्वामी की सेवा, गधे की सवारी और बिना संस्कृत की भाषा। और हे राजा, यह पांच चीजें आदमी के पैदा होते ही विधाता उसके भाग्य में लिख देता है- आयु, कर्म, धन, विद्या और यश। राजन्, जब तक आदमी का पुण्य उदय रहता है, तब तक उसके बहुत-से दास रहते हैं। जब पुण्य घट जाता है तो...

06. वेताल पच्चीसी :- छटा व्रतांत ( स्त्री किसकी ? )

06. वेताल पच्चीसी :- छटा व्रतांत ( स्त्री किसकी ? ) धर्मपुर नाम की एक नगरी थी। उसमें धर्मशील नाम का राजा राज्य करता था। उसके यहां अंधक नाम का दीवान था। एक दिन दीवान ने कहा, ‘महाराज, एक मंदिर बनवा कर देवी को बिठा कर पूजा किया जाए। बड़ा पुण्य मिलेगा।’राजा ने ऐसा ही किया। एक दिन देवी ने प्रसन्न होकर उससे वर मांगने को कहा। राजा के घर कोई संतान नहीं थी। उसने देवी से पुत्र मांगा। देवी बोली, ‘अच्छी बात है, तेरा बड़ा प्रतापी पुत्र प्राप्त होगा।’ "वेताल पच्चीसी" की सभी कहानिया एक ही जगह click करे -- कुछ दिन बाद राजा के एक लड़का हुआ। सारे नगर में बड़ी खुशी मनाई गई। एक दिन एक धोबी अपने मित्र के साथ उस नगर में आया। उसकी निगाह देवी के मंदिर में पड़ी। उसने देवी को प्रणाम करने का इरादा किया। उसी समय उसे एक धोबी की लड़की दिखाई दी, जो बड़ी सुंदर थी। उसे देखकर वह इतना पागल हो गया कि उसने मंदिर में जाकर देवी से प्रार्थना की, ‘हे देवी! यह लड़की मुझे मिल जाए। अगर मिल गई तो मैं अपना सिर तुझ पर चढ़ा दूंगा।’ इसके बाद वह हर घड़ी बेचैन रहने लगा। उसके मित्र ने उसके पिता से सारा हाल कहा। अपने बेटे की यह...

05. वेताल पच्चीसी :- पांचवा व्रतांत ( असली वर कौन? )

05. वेताल पच्चीसी :- पांचवा व्रतांत ( असली वर कौन? ) उज्जैन में महाबल नाम का एक राजा रहता था। उसने यहां हरिदास नाम का एक दूत था। उसके घर महादेवी नाम की बड़ी सुंदर कन्या थी। जब वह विवाह योग्य हुई तो हरिदास को बहुत चिंता होने लगी। इसी बीच राजा ने उसे एक दूसरे राजा के पास भेजा। कई दिन चलकर हरिदास वहां पहुंचा। राजा ने उसे बड़ी अच्छी तरह से रखा। एक दिन एक ब्राह्मण हरिदास के पास आया। बोला, ‘तुम अपनी लड़की मुझे दे दो।’ हरिदास ने कहां, ‘मैं अपनी लड़की उसे दूंगा, जिसमें सब गुण होंगे।’ "वेताल पच्चीसी" की सभी कहानिया एक ही जगह click करे -- ब्राह्मण ने कहा, ‘मेरे पास एक ऐसा रथ है, जिस पर बैठकर जहां चाहो, घड़ी-भर में पहुंच जाओगे।’ हरिदास बोला, ‘ठीक है। सबेरे उसे ले आना।’ अगले दिन दोनों रथ पर बैठकर उज्जैन आ पहुंचे। दैवयोग से उससे पहले हरिदास का लड़का अपनी बहन को किसी दूसरे को और स्त्री अपनी लड़की को किसी तीसरे को देने का वादा कर चुकी थी। इस तरह तीन वर इकट्ठे हो गए। हरिदास सोचने लगा कि कन्या एक है, वह तीन हैं। क्या करें! इसी बीच एक राक्षस आया और कन्या को उठाकर विंध्याचल पहाड़ पर ले गया। तीन...

04. वेताल पच्चीसी :- चौथा व्रतांत ( ज्यादा पापी कौन ? )

04. वेताल पच्चीसी :- चौथा व्रतांत ( ज्यादा पापी कौन ? ) भोगवती नाम की एक नगरी थी। उसमें राजा रूपसेन राज्य करता था। उसके पास चिंतामणि नाम का एक तोता था। एक दिन राजा ने उससे पूछा, ‘हमारा ब्याह किसके साथ होगा?’ तोते ने कहा, ‘मगध देश के राजा की बेटी चंद्रावती के साथ होगा।’ राजा ने ज्योतिषी को बुलाकर पूछा तो उसने भी यही कहा। उधर मगध देश की राज-कन्या के पास एक मैना थी। उसका नाम था मदन मञ्जरी। एक दिन राज-कन्या ने उससे पूछा कि मेरा विवाह किसके साथ होगा तो उसने कह दिया कि भोगवती नगर के राजा रूपसेन के साथ। "वेताल पच्चीसी" की सभी कहानिया एक ही जगह click करे -- इसके बाद दोनों को विवाह हो गया। रानी के साथ उसकी मैना भी आ गई। राजा-रानी ने तोता-मैना का ब्याह करके उन्हें एक पिंजरे में रख दिया। एक दिन की बात कि तोता-मैना में बहस हो गई। मैना ने कहा, ‘आदमी बड़ा पापी, दगाबाज और अधर्मी होता है।’ तोते ने कहा, ‘स्त्री झूठी, लालची और हत्यारी होती है।’ दोनों का झगड़ा बढ़ गया तो राजा ने कहा, ‘क्या बात है, तुम आपस में लड़ते क्यों हो?’ मैना ने कहा, ‘महाराज, मर्द बड़े बुरे होते हैं।’ इसके बाद मैना ने एक क...

03. वेताल पच्चीसी :- तीसरा व्रतांत ( पुण्य किसका ? )

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03. वेताल पच्चीसी :- तीसरा व्रतांत ( पुण्य किसका ? ) वर्धमान नगर में रूपसेन नाम का राजा राज्य करता था। एक दिन उसके यहां वीरवर नाम का एक राजपूत नौकरी के लिए आया। राजा ने उससे पूछा कि उसे खर्च के लिए क्या चाहिए तो उसने जवाब दिया, हजार तोले सोना। सुनकर सबको बड़ा आश्चर्य हुआ। राजा ने पूछा, ‘तुम्हारे साथ कौन-कौन है?’ उसने जवाब दिया, ‘मेरी स्त्री, बेटा और बेटी।’ राजा को और भी अचम्भा हुआ। आखिर चार जन इतने धन का करेंगे? फिर भी उसने उसकी बात मान ली। उस दिन से वीरवर रोज हजार तोले सोना भंडारी से लेकर अपने घर आता। उसमें से आधा ब्राह्मणों में बांट देता, बाकी के दो हिस्से करके एक मेहमानों, वैरागियों और संन्यासियों को देता और दूसरे से भोजन बनवाकर पहले गरीबों को खिलाता, उसके बाद जो बचता, उसे स्त्री-बच्चों को खिलाता, आप खाता। काम यह था कि शाम होते ही ढाल-तलवार लेकर राज के पलंग की चौकीदारी करता। राजा को जब कभी रात को जरूरत होती, वह हाजिर रहता। एक आधी रात के समय राजा को मरघट की ओर से किसी के रोने की आवाज आई। उसने वीरवर को पुकारा तो वह आ गया। राजा ने कहा, ‘जाओ, पता लगाकर आओ कि इतनी रात गए यह कौन रो रहा है...

02. वेताल पच्चीसी :- दूसरा व्रतांत ( पति कौन ? )

02. वेताल पच्चीसी :- दूसरा व्रतांत ( पति कौन ? ) यमुना के किनारे धर्मस्थान नामक एक नगर था। उस नगर में गणाधिप नाम का राजा राज्य करता था। उसी में केशव नाम का एक ब्राह्मण भी रहता था। ब्राह्मण यमुना के तीर पर जप-तप किया करता था। उसकी एक लड़की थी, जिसका नाम मालती था। वह बड़ी रूपवती थीं। जब वह ब्याह के योग्य हुई तो उसके माता, पिता और भाई को चिंता हुई। संयोग से ब्राह्मण अपने किसी यजमान की बारात में गया, भाई पढ़ने चला गया। तभी उनके घर में एक ब्राह्मण का लड़का आया। लड़की की मां ने उसके रूप और गुणों को देखकर उससे कहा कि मैं तुमसे अपनी लडकी का ब्याह करूंगी। होनहार की बात की, उधर ब्राह्मण को एक लड़का मिल गया और उसने वचन दे दिया। उधर जहां ब्राह्मण का लड़का जहां पढ़ने गया था, वहां वह भी एक लड़के से वादा कर आया। कुछ समय बाद बाप-बेटे घर में इकट्ठे हुए, तो देखते क्या हैं कि वहां एक तीसरा लड़का और मौजूद है। दो उनके साथ आए थे। अब क्या हो? ब्राह्मण, उसका लड़का और ब्राह्मणी बड़े सोच में पड़े। दैवयोग से हुआ क्या कि लड़की को सांप ने काट लिया। वह मर गई। उसके बाप, भाई और तीनों लड़कों ने बड़ी भाग-दौड़ की, जहर झ...