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Showing posts from June, 2022

गो-महिमा"

"गो-महिमा"           एक बार नारदजी ने ब्रह्माजी से पूछा- नाथ! आपने बताया है कि ब्राह्मण की उत्पत्ति भगवान् के मुख से हुई है; फिर गौओं की उससे तुलना कैसे हो सकती है ? विधाता! इस विषय को लेकर मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा है।           ब्रह्माजी ने कहा- बेटा! पहले भगवान् के मुख से महान् तेजोमय पुंज प्रकट हुआ। उस तेज से सर्व प्रथम वेद की उत्पत्ति हुई। तत्पश्चात् क्रमशः अग्नि, गौ और ब्राह्मण-ये पृथक्-पृथक् उत्पन्न हुए। मैंने सम्पूर्ण लोकों और भुवनों की रक्षा के लिये पूर्वकाल में एक वेद से चारों वेदों का विस्तार किया। अग्नि और ब्राह्मण देवताओं के लिये हविष्य ग्रहण करते हैं और हविष्य (घी) गौओं से उत्पन्न होता है; इसलिये ये चारों ही इस जगत् के जन्मदाता हैं। यदि ये चारों महत्तर पदार्थ विश्व में नहीं होते तो यह सारा चराचर जगत् नष्ट हो जाता। ये ही सदा जगत् को धारण किये रहते हैं, जिससे स्वभावत: इसकी स्थिति बनी रहती है। ब्राह्मण, देवता तथा असुरों को भी गौ की पूजा करनी चाहिये; क्योंकि गौ सब कार्यों में उदार तथा वास्तव में समस्त गुणों की खान है। वह साक्षात...

विश्वकर्मा : 100 शिल्प ग्रंथ प्रदाता

विश्वकर्मा : 100 शिल्प ग्रंथ प्रदाता 💐 कलाएं कितनी हो सकती हैं?  सब लोकोपयोगी हों। लोक उपयोगी सृजन से बड़ा कोई सृजन नहीं। सृजन श्रम, संघर्ष, समय को बचाने वाला और परिश्रम को सार्थक कर आजीविका देने वाला हो। भारत विश्वकर्मीय ज्ञान के 100 से ज्यादा ग्रंथों से समृद्ध रहा है।  विश्‍वकर्मा और उनके शास्‍त्र (संदर्भ : विश्‍वकर्मा ग्रंथों पर निरंतर आयोजन) यह मेरे लिए प्रसन्नता का विषय है कि कल तक जो शिल्प और स्थापत्य के ग्रंथ केवल शिल्पियों के व्यवहार तक सीमित और केन्द्रित थे, उन पर आज अनेक संस्थानों से लेकर कई विश्व विद्यालयों तक ज्ञान सत्र आयोजित होने लगे हैं, सेमिनार, राष्ट्रीय, अंतर राष्ट्रीय गोष्ठियां होने लगी हैं। अनेक विद्वानों की भागीदारी होने लगी है। शिल्प के ये विषय पाठ्यक्रम के विषय होकर रोजगार और व्यवहार के विषय हुए हैं।  शिल्‍प और स्‍थापत्‍य के प्रवर्तक के रूप में भगवान् विश्‍वकर्मा का संदर्भ बहुत पुराने समय से भारतीय उपमहाद्वीप में ज्ञेय और प्रेय-ध्‍येय रहा है। विश्‍वकर्मा को ग्रंथकर्ता मानकर अनेकानेक शिल्‍पकारों ने समय-समय पर अनेक ग्रंथों को लिखा और स्‍वयं कोई श्रेय...

गंगा जन्म की कथा

वाल्मीकि रामायण अनुसार ऋषि विश्वामित्र द्वारा कही गई मा गंगा जन्म की कथा 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸 ऋषि विश्वामित्र ने इस प्रकार कथा सुनाना आरम्भ किया, "पर्वतराज हिमालय की अत्यंत रूपवती, लावण्यमयी एवं सर्वगुण सम्पन्न दो कन्याएँ थीं। सुमेरु पर्वत की पुत्री मैना इन कन्याओं की माता थीं। हिमालय की बड़ी पुत्री का नाम गंगा तथा छोटी पुत्री का नाम उमा था। गंगा अत्यन्त प्रभावशाली और असाधारण दैवी गुणों से सम्पन्न थी। वह किसी बन्धन को स्वीकार न कर मनमाने मार्गों का अनुसरण करती थी। उसकी इस असाधारण प्रतिभा से प्रभावित होकर देवता लोग विश्व के क्याण की दृष्टि से उसे हिमालय से माँग कर ले गये। पर्वतराज की दूसरी कन्या उमा बड़ी तपस्विनी थी। उसने कठोर एवं असाधारण तपस्या करके महादेव जी को वर के रूप में प्राप्त किया।" विश्वामित्र के इतना कहने पर राम ने कहा, "गे भगवन्! जब गंगा को देवता लोग सुरलोक ले गये तो वह पृथ्वी पर कैसे अवतरित हुई और गंगा को त्रिपथगा क्यों कहते हैं?" इस पर ऋषि विश्वामित्र ने बताया, "महादेव जी का विवाह तो उमा के साथ हो गया था किन्तु सौ वर्ष तक भी उनके किसी सन्...

मोक्ष पाटम या सांप और सीढ़ी

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13 वीं शताब्दी के कवि संत ज्ञानदेव ने मोक्ष पाटम नामक एक बच्चों का खेल बनाया।   अंग्रेजों ने बाद में इसे मूल मोक्ष पाटम के बजाय सांप और सीढ़ी का नाम दिया।  मूल एक सौ वर्ग गेम बोर्ड में, 12 वां वर्ग विश्वास था, 51 वाँ वर्ग विश्वसनीयता था, 57 वाँ वर्ग उदारता, 76 वाँ वर्ग ज्ञान था और 78 वाँ वर्ग तप था।   ये वे वर्ग थे जहाँ सीढ़ी पाई जाती थी और कोई भी तेज़ी से आगे बढ़ सकता था।  41 वां वर्ग अवज्ञा के लिए था, घमंड के लिए 44 वां वर्ग, अशिष्टता के लिए 49 वां वर्ग, चोरी के लिए 52 वाँ वर्ग, झूठ बोलने के लिए 58 वाँ वर्ग, नशे के लिए 62 वाँ वर्ग, ऋण के लिए 69 वाँ वर्ग, क्रोध के लिए 84 वाँ वर्ग,  लालच के लिए 92 वाँ वर्ग, अभिमान के लिए 95 वाँ वर्ग, हत्या के लिए 73 वाँ वर्ग और वासना के लिए 99 वाँ वर्ग।  ये वे वर्ग थे जहाँ साँप के मुँह खुलने का इंतज़ार किया जाता था।  100 वें वर्ग ने निर्वाण या मोक्ष का प्रतिनिधित्व किया। प्रत्येक सीढ़ी में सबसे ऊपर एक भगवान को दर्शाया गया है, या विभिन्न आकाशों (कैलासा, वैकुंठ, ब्रह्मलोक) और इतने पर।  जैसे-जैसे खेल आगे बढ...

शिवलिंग गुप्तांग नहीं

#शिवलिंग को गुप्तांग की संज्ञा कैसे दी गई..... ? और अब सनातन संस्कृति के लोग खुद ही शिवलिंग को शिव् भगवान का गुप्तांग समझने लगे है और दूसरों को भी ये गलत जानकारी देने लगे हैं। परन्तु सही तथ्यों को जानना बहुत जरूरी है... कुछ लोग शिवलिंग की पूजा की आलोचना करते हैं... छोटे छोटे बच्चों को बताते हैं कि हिन्दू लोग लिंग और योनी की पूजा करते हैं । उन मूर्खों को संस्कृत का ज्ञान नहीं होता है और अपने बच्चों को सनातन संस्कृति के प्रति नफ़रत पैदा करके उनको आतंकी बना देते हैं। संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है । इसे देववाणी भी कहा जाता है। लिंग का अर्थ संस्कृत में चिन्ह, प्रतीक होता है… जबकी जनेन्द्रिय को संस्कृत मे शिशिन कहा जाता है। >शिवलिंग का अर्थ हुआ शिव का प्रतीक…. >पुरुषलिंग का अर्थ हुआ पुरुष का प्रतीक इसी प्रकार स्त्रीलिंग का अर्थ हुआ स्त्री का प्रतीक और नपुंसकलिंग का अर्थ हुआ नपुंसक का प्रतीक।  अब यदि जो लोग पुरुष लिंग को मनुष्य की जनेन्द्रिय समझ कर आलोचना करते है..तो वे बताये ”स्त्री लिंग” के अर्थ के अनुसार स्त्री का लिंग होना चाहिए? शून्य, आकाश, अनन्त, ब्रह्माण्ड और निराकार परमपुरुष...

क्यों मेघनाद का वध केवल लक्षमण ही कर सकते थे?

क्यों मेघनाद का वध केवल लक्षमण ही कर सकते थे? लंका के युद्ध के कुछ वर्षों बाद एक बार अगस्त्य मुनि अयोध्या आए। श्रीराम ने उनकी अभ्यर्थना की और आसन दिया। राजसभा में श्रीराम अपने भ्राता भरत, शत्रुघ्न और देवी सीता के साथ उपस्थित थे। बात करते-करते लंका युद्ध का प्रसंग आया। भरत ने बताया कि उनके भ्राता श्रीराम ने कैसे रावण और कुंभकर्ण जैसे प्रचंड वीरों का वध किया और लक्ष्मण ने भी इंद्रजीत और अतिकाय जैसे शक्तिशाली असुरों को मारा।  अगस्त्य मुनि बोले - "हे भरत! रावण और कुंभकर्ण निःसंदेह प्रचंड वीर थे, किन्तु इन सबसे बड़ा वीर तो मेघनाद ही था। उसने अंतरिक्ष में स्थित होकर इंद्र से युद्ध किया था और उन्हें पराजित कर लंका ले आया था। तब स्वयं ब्रह्मा ने इंद्रजीत से दान के रूप में इंद्र को मांगा तब जाकर इंद्र मुक्त हुए थे। लक्ष्मण ने उसका वध किया इसलिए वे सबसे बड़े योद्धा हुए। और ये भी सत्य है कि इस पूरे संसार में मेघनाद को लक्ष्मण के अतिरिक्त कोई और मार भी नहीं सकता था, यहाँ तक कि स्वयं श्रीराम भी नहीं।" भरत को बड़ा आश्चर्य हुआ लेकिन भाई की वीरता की प्रशंसा से वह खुश थे।  उन्होंने श्रीराम से ...

बुधवार को बेटियों की #विदाई क्यों नही-?

🙏🏻🌹#बुधवार को बेटियों की #विदाई क्यों नही-? वार के अनुसार निषेध कार्य शास्त्रों में दिन के अनुसार सप्ताह के हर दिन कुछ कार्य करने की मनाही है।  इसमें रोजाना जीवन से जुड़ी चीजों के अलावा यात्रा करने तक के लिए निषेध वार शामिल हैं। यहां हम आपको बुधवार से जुड़ी उस मान्यता के विषय में बता रहे हैं जिसके अनुसार इस दिन बेटियों को ससुराल विदा करने की मनाही है। बुधवार के दिन बेटी को विदा करना/करना आपके लिए और आपकी बेटी के लिए अत्यंत दुखदायी हो सकता है।  अगर आपकी बेटी की बुध ग्रह की दशा खराब हो तो आपको ऐसी गलती बिल्कुल भी नहीं करनी चाहिए। बुधवार के दिन  बेटी को विदा करना- ऐसी मान्यता है कि बुधवार के दिन अपनी बेटियों को ससुराल के लिए विदा नहीं करना चाहिए।  इस दिन बेटी को विदा करने से रास्ते में किसी प्रकार की दुर्घटना होने की संभावना रहती है।  इतना ही नहीं, आपकी बेटी का अपने ससुराल से संबंध भी बिगड़ सकता है।  शास्त्र में इस अपशकुन से जुड़े कारणों की भी व्याख्या है। बुध ग्रह चंद्र की शत्रुता- एक पौराणिक मान्यता के अनुसार ‘बुध’ ग्रह ‘चंद्र’ को शत्रु मानता है लेकिन ‘चंद्रम...

स्त्री क्या है ?

स्त्री क्या है ? जब भगवान स्त्री की रचना कर रहे थे तब उन्हें काफी समय लग गया । आज छठा दिन था और स्त्री की रचना अभी भी अधूरी थी। इसिलए देवदूत ने पूछा भगवन्, आप इसमें इतना समय क्यों ले रहे हो...? भगवान ने जवाब दिया, "क्या तूने इसके सारे गुणधर्म (specifications) देखे हैं, जो इसकी रचना के लिए जरूरी है ? १. यह हर प्रकार की परिस्थितियों को संभाल सकती है। २. यह एक साथ अपने सभी बच्चों को संभाल सकती है एवं खुश रख सकती है । *३. यह अपने प्यार से घुटनों की खरोंच से लेकर टूटे हुये दिल के घाव भी भर सकती है । ४. यह सब सिर्फ अपने दो हाथों से कर सकती है। ५. इस में सबसे बड़ा "गुणधर्म" यह है कि बीमार होने पर भी अपना ख्याल खुद रख सकती है एवं 18 घंटे काम भी कर सकती है। देवदूत चकित रह गया और आश्चर्य से पूछा- "भगवान ! क्या यह सब दो हाथों से कर पाना संभव है ?" भगवान ने कहा यह स्टैंडर्ड रचना है। (यह गुणधर्म सभी में है ) देवदूत ने नजदीक जाकर स्त्री को हाथ लगाया और कहा, "भगवान यह तो बहुत नाज़ुक है" भगवान ने कहा हाँ यह बहुत ही नाज़ुक है, मगर इसे बहुत Strong बनाया है । इसमें हर प...

नारियल_का_जन्म_कैसे_हुआ

“#नारियल_का_जन्म_कैसे_हुआ" 〰〰🌼〰🌼〰🌼〰〰 हिन्दू धर्म में नारियल का विशेष महत्तव है।  नारियल के बिना कोई भी धार्मिक कार्यक्रम संपन्न नहीं होता है। नारियल से जुड़ी एक पौराणिक कथा भी प्रचलित है जो जिसके अनुसार नारियल का इस धरती पर अवतरण ऋषि विश्वामित्र द्वारा किया गया था। यह कहानी प्राचीन काल के एक राजा सत्यव्रत से जुड़ी है। सत्यव्रत एक प्रतापी राजा थे, जिनका ईश्वर में सम्पूर्ण विश्वास था। उनके पास सब कुछ था लेकिन उनके मन की एक इच्छा थी जिसे वे किसी भी रूप में पूरा करना चाहते थे। वे चाहते थे की वे किसी भी प्रकार से पृथ्वीलोक से स्वर्गलोक जा सकें। स्वर्गलोक की सुंदरता उन्हें अपनी ओर आकर्षित करती थी, किंतु वहां कैसे जाना है, यह सत्यव्रत नहीं जानते थे। एक बार ऋषि विश्वामित्र  तपस्या करने के लिए अपने घर से काफी दूर निकल गए थे और लम्बे समय से वापस नहीं आए थे। उनकी अनुपस्थिति में क्षेत्र में सूखा पड़ा गया और उनका परिवार भूखा-प्यासा भटक रहा था। तब राजा सत्यव्रत ने उनके परिवार की सहायता की और उनकी देख-रेख की जिम्मेदारी ली। जब ऋषि विश्वामित्र वापस लौटे तो उन्हें परिवार वालों ने राजा की अच्छा...

छोटी सी #गौरैया का #श्रीकृष्ण पर विश्वास

"छोटी सी #गौरैया का #श्रीकृष्ण पर विश्वास"        ☘️☘️☘️☘️☘️ कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र को विशाल सेनाओं के आवागमन की सुविधा के लिए तैयार किया जा रहा था। उन्होंने हाथियों का इस्तेमाल पेड़ों को उखाड़ने और जमीन साफ करने के लिए किया। ऐसे ही एक पेड़ पर एक गौरैया अपने चार बच्चों के साथ रहती थी। जब उस पेड़ को उखाड़ा जा रहा था तो उसका घोंसला जमीन पर गिर गया, लेकिन चमत्कारी रूप से उसकी संताने अनहोनी से बच गई। लेकिन वो अभी बहुत छोटे होने के कारण उड़ने में असमर्थ थे। कमजोर और भयभीत गौरैया मदद के लिए इधर-उधर देखती रही। तभी उसने कृष्ण को अर्जुन के साथ वहा आते देखा। वे युद्ध के मैदान की जांच करने और युद्ध की शुरुआत से पहले जीतने की रणनीति तैयार करने के लिए वहां गए थे। उसने कृष्ण के रथ तक पहुँचने के लिए अपने छोटे पंख फड़फड़ाए और किसी प्रकार श्री कृष्ण के पास पहुंची। हे कृष्ण, कृपया मेरे बच्चों को बचाये क्योकि लड़ाई शुरू होने पर कल उन्हें कुचल दिया जायेगा। सर्व व्यापी भगवन बोले: मैं तुम्हारी बात सुन रहा हूं, लेकिन मैं प्रकृति के कानून में हस्तक्षेप नहीं कर सकता। गौरैया ने कहा: हे भगव...

धन्वंतरी_देव का पौराणिक मंत्र मुहूर्त एवं पूजा की सही विधि

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#धन्वंतरी_देव का पौराणिक मंत्र मुहूर्त एवं पूजा की सही विधि धन्वंतरि देव का पौराणिक मंत्र ॐ नमो भगवते महासुदर्शनाय वासुदेवाय धन्वंतराये: अमृतकलश हस्ताय सर्व भयविनाशाय सर्व रोगनिवारणाय त्रिलोकपथाय त्रिलोकनाथाय श्री महाविष्णुस्वरूप श्री धन्वंतरि स्वरूप श्री श्री श्री औषधचक्र नारायणाय नमः॥ धनतेरस, धन्वंतरि त्रयोदशी या धन त्रयोदशी दीपावली से पूर्व मनाया जाना महत्वपूर्ण पर्व है। इस दिन आरोग्य के देवता धन्वंतरि, मृत्यु के अधिपति यम, वास्तविक धन संपदा की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी तथा वैभव के स्वामी कुबेर की पूजा की जाती है। इस त्योहार को मनाए जाने के पीछे मान्यता है कि लक्ष्मी के आह्वान के पहले आरोग्य की प्राप्ति और यम को प्रसन्न करने के लिये कर्मों का शुद्धिकरण अत्यंत आवश्यक है। कुबेर भी आसुरी प्रवृत्तियों का हरण करने वाले देव हैं। धन्वंतरि और मां लक्ष्मी का अवतरण समुद्र मंथन से हुआ था। दोनों ही कलश लेकर अवतरित हुए थे। श्री सूक्त में लक्ष्मी के स्वरूपों का विवरण कुछ इस प्रकार मिलता है। ‘धनमग्नि, धनम वायु, धनम सूर्यो धनम वसु:’ अर्थात प्रकृति ही लक्ष्मी है और प्रकृति की रक्षा करके मनुष्य स्वयं ...

सकारात्मक ऊर्जा उपासना - दीपावली

सकारात्मक ऊर्जा उपासना - दीपावली         शुभं करोति कल्याणम् आरोग्यम् धनसंपदा।         शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपकाय नमोऽस्तु ते।।         दीपो ज्योति परं ब्रह्म दीपो ज्योतिर्जनार्दन:।         दीपो हरतु मे पापं संध्यादीप नमोऽस्तु ते।।        दीपावली पर्वके साथ अनेक कथाएं कही जाती है । भगवान राम वनवास पूरा कर अयोध्या पधारे । श्रीकृष्ण ने नरकासुर का वध किया । भगवान महावीर का निर्वाह । शिख गुरु की बंधन मुक्ति ऐसी अनेक घटना इसी समय हुई होगी वो विषय अलग है पर दीपावली तो सत्युगमे भी ये पर्वरूप उत्सव था । तब ये कोई घटना ही नही घटी थी। श्रीराम और कृष्ण के जन्मसे पहले सत्युगमे भी ये पर्व मनाया जाता था ।       ब्रह्मांड रचना ओर ग्रह , नक्षत्र  ओर विविध लोक का चोककस स्थान और पल,विपल,घड़ी,मुहूर्त,प्रहर,तिथि ,मास ओर वर्ष की चोककस समय गणना ओर उन समय ऊर्जा शक्ति ( विविध देवी शक्तिओ ) के स्थान प्रवाह की सूक्ष्म जानकारी के आधार पर पूजा , स्मरण या विवुध क्रियाओ द्वारा ज्यादा से ज्यादा ल...

कृष्ण ने कलयुग की कौन सी पांच बातें बताई पांडवों को

कृष्ण ने कलयुग की कौन सी पांच बातें बताई पांडवों को "  महाभारत के समय की बात है पांचों पांडवों ने भगवान श्रीकृष्ण से कलियुग के बारे में चर्चा की और कलियुग के बारे में विस्तार से पुछा और जानने की इच्छा जाहिर की कि कलियुग में मनुष्य कैसा होगा, उसके व्यवहार कैसे होंगे और उसे मोक्ष कैसे प्राप्त होगा ? इन्ही प्रश्नों का उत्तर देने के लिए भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं - “तुम पांचों भाई वन में जाओ और जो कुछ भी दिखे वह आकर मुझे बताओ। मैं तुम्हें उसका प्रभाव बताऊंगा।” पांचों भाई वन में गएं। युधिष्ठिर महाराज ने देखा कि किसी हाथी की दो सूंड है। यह देखकर आश्चर्य का पार न रहा।  अर्जुन दूसरी दिशा में गये। वहां उन्होंने देखा कि कोई पक्षी है, उसके पंखों पर वेद की ऋचाएं लिखी हुई हैं पर वह पक्षी मुर्दे का मांस खा रहा है यह भी आश्चर्य है।  भीम ने तीसरा आश्चर्य देखा कि गाय ने बछड़े को जन्म दिया है और बछड़े को इतना चाट रही है कि बछड़ा लहुलुहान हो जाता है।  सहदेव ने चौथा आश्चर्य देखा कि छः सात कुएं हैं और आसपास के कुओं में पानी है किन्तु बीच का कुआं खाली है। बीच का कुआं गहरा है फिर भी पानी नही...

झाड़ू में धन की देवी महालक्ष्मी का वास होता है!!

झाड़ू में धन की देवी महालक्ष्मी का वास होता है!! पौराणिक शास्त्रों में कहा गया है कि जिस घर में झाड़ू का अपमान होता है वहां धन हानि होती है, क्योंकि झाड़ू में धन की देवी महालक्ष्मी का वास माना गया है। विद्वानों के अनुसार झाड़ू पर पैर लगने से महालक्ष्मी का अनादर होता है। झाड़ू घर का कचरा बाहर करती है और कचरे को दरिद्रता का प्रतीक माना जाता है।  जिस घर में पूरी साफ-सफाई रहती है वहां धन, संपत्ति और सुख-शांति रहती है। इसके विपरित जहां गंदगी रहती है वहां दरिद्रता का वास होता है।  ऐसे घरों में रहने वाले सभी सदस्यों को कई प्रकार की आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इसी कारण घर को पूरी तरह साफ रखने पर जोर दिया जाता है ताकि घर की दरिद्रता दूर हो सके और महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त हो सके। घर से दरिद्रता रूपी कचरे को दूर करके झाड़ू यानि महालक्ष्मी हमें धन-धान्य, सुख-संपत्ति प्रदान करती है। वास्तु विज्ञान के अनुसार झाड़ू सिर्फ घर की गंदगी को दूर नहीं करती है बल्कि दरिद्रता को भी घर से बाहर निकालकर घर में सुख समृद्घि लाती है।  झाड़ू का महत्व इससे भी समझा जा सकता है कि रोगों को ...

मेधा_सूक्त

#मेधा_सूक्त ॥  यजुर्वेद के ३२वें अध्याय में मेधा-प्राप्ति के कुछ मन्त्र पठित हैं, जो मेधा-परक होने से ‘मेधा-सूक्त’ कहलाते हैं ।  मेधा’ शब्द का शाब्दिक अर्थ है – धारणा शक्ति (Judgeent Power), प्रज्ञा (WisefulL, Intellect), बुद्धि आदि । मेधा-शक्ति-सम्पन्न व्यक्ति ही ‘मेधावी’ (Intelligent, Brilliant) कहलाता है । ‘ मेधा’ बुद्धि की एक शक्ति-विशेष है । जो गृहित-ज्ञान को धारण करती है और यथा-समय उसे व्यक्त भी कर देती है । इसी मेधा की प्राप्ति के लिये इन मन्त्रों में अग्नि, वरुण-देव, प्रजापति, इन्द्र, वायु, धाता आदि की प्रार्थना की गयी है ।  इन मन्त्रों के यथा-विधि पाठ से बुद्धि विशद बनती है और उसमें पवित्रता का आधान होता है । इस सूक्त का एक मन्त्र अत्यन्त प्रसिद्ध है, जो इस प्रकार है –  “मेधां मे वरुणो ददातु मेधामग्निः प्रजापतिः ।  मेधामिन्द्रश्च वायुश्च मेधां धाता ददातु मे स्वाहा ॥”  षोडश संस्कारों में पुत्र-जन्म के अनन्तर जात-कर्म नामक एक संस्कार होता है, जो नालच्छेदन से पूर्व ही किया जाता है; क्योंकि नालच्छेदन के अनन्तर जननाशौच की प्रवृत्ति हो जाती है । जात-कर्म...

मंदिर में #परिक्रमा क्यों करते हैं?

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐 #मंदिर में #परिक्रमा क्यों करते हैं?   मंदिरों में हम कुछ विशेष धार्मिक गतिविधियां करते हैं। हाथ जोड़ने से लेकर, सिर झुकाने, घंटी बजाने और परिक्रमा करने तक.. लेकिन यह हम परंपरागत रूप से करते आए हैं। इनके पीछे के रहस्य से हम अवगत नहीं होते। आइए आज जानते हैं कि प्रतिमाओं की परिक्रमा क्यों की जाती है... प्राण-प्रतिष्ठित देवमूर्ति जिस स्थान पर स्थापित होती है, उस स्थान के मध्य से चारों ओर कुछ दूरी तक दिव्य शक्ति का आभामंडल रहता है। उस आभामंडल में उसकी आभा-शक्ति के सापेक्ष परिक्रमा करने से श्रद्धालु को सहज ही आध्यात्मिक शक्ति मिलती है। दैवीय शक्ति के आभामंडल की गति दक्षिणवर्ती होती है।   इसी कारण दैवीय शक्ति का तेज और बल प्राप्त करने के लिए भक्त को दाएं हाथ की ओर परिक्रमा करनी चाहिए। बाएं हाथ की ओर से परिक्रमा करने से दैवीय शक्ति के आभामंडल की गति और हमारे अंदर की आंतरिक शक्ति के बीच टकराव होने लगता है। परिणामस्वरूप हमारा अपना जो तेज है, वह भी नष्ट होने लगता है। अतएव देव प्रतिमा की विपरीत परिक्रमा नहीं करनी चाहिए।   भगवान की मूर्ति और मंदिर की परिक्रमा हमे...

विवाह_संस्कार_में_स्त्री-पुरुष का वस्त्र‌-बन्धन

“#विवाह_संस्कार_में_स्त्री-पुरुष का वस्त्र‌-बन्धन”   विवाह संस्कार के अवसर पर वर-वधु का “वस्त्र-बन्धन” एक महत्वपूर्ण क्रिया होती है । इस हेतु वरपक्ष द्वारा ‘उत्तरीय वस्त्र’ दुपट्टे और वधुपक्ष द्वारा ‘लाल अथवा पीली ओढनी’ अथवा ‘चुनरी’ की व्यवस्था विशेष रूप से की जाती है ।  ‘विवाह संस्कार’ के आरम्भ में ‘पाणिग्रहण संस्कार’ हेतु वधुपक्ष द्वारा (वधु की माता या माता के न रहने पर अन्य द्वारा, जिसके द्वारा कन्यादान किया जाना है, के द्वारा) जब ‘वर’ को ‘कोहबर’ में (वह स्थान विशेष जहां कुलदेवी या कुलदेवता के समक्ष विवाह की रस्में पूर्ण की जाती हैं ।) ले जाया जाता है, तो उस समय ‘वर’ अकेला ही वहाँ प्रवेश करता है । किंतु ‘पाणिग्रहण संस्कार’ के पश्‍चात जब ‘वर’ कोहबर से बाहर आता है तो उस समय ‘वर–वधु दोनों ही अपने दुपट्टे और चुनरी के द्वारा परस्पर ‘वस्त्र-बन्धन’ को अपनाये हुए होते हैं ।  अब ‘विवाह संस्कार’ की शेष सभी रस्में ‘वर-वधु’ को इस ‘वस्त्र-बन्धेन’ को अपनाकर ही पूर्ण करना होती है । विवाह के पश्‍चात वर और वधु दोनों मिलकर अर्द्धांग और अर्द्धांगिनी जाने जाते हैं । वे दोनों मिलकर पू...

हमें रोज मंदिर जाना चाहिए

💥हमें रोज मंदिर जाना चाहिए"""""🌞 ~~~~~~~~~~~~~~~~~ 🌹भारतीय परंपरा में मंदिर जाने का बहुत महत्व है। धर्म और पूजा पाठ के अलावा मंदिर में कदम रखते ही हमे चौमुखी लाभ मिलते है। 💖 मंदिर जाने से हमारा समाजिक दायरा बड़ता है और हमे अन्य धार्मिक प्राणियों से मिलने का सौभाग्य प्राप्त होता है।  हमारे मंदिर जाने से समाज संगठित होता है और धर्म, देश और हमारे संस्कारों कि रक्षा तथा उन्नति होती है।  हम मंदिर मे जा कर सूर्य को जल अर्पित करते है जिसकी अलौकिक किरणो से हमे बहुत लाभ होता है।  हम पीपल के पास जा कर जल अर्पण करते है जिससे हमे वहाँ फैली ख़ास तरह की आक्सिजन मिलती है। पीपल ही एक अकेला दिव्य वृक्ष है रात्रि मे भी चंद्रमा की किरणों मे विध्मान सुर्य फोटोन से फ़ोटोविषलेशन कर कार्बनडाईओक्साईड CO2 को विघटित करता है और विशेष आक्सिजन पैदा करता है तथा कार्बन को अपने तने में एकत्रित कर लेता है।  जब हम मंदिर में आरती और कीर्तन के दौरान ताली बजाते है तो हमे एक्यूप्रेशर से लाभ मिलता है।  मंदिर मे जब हम दण्डवत हो कर माथा धरती पर लगाते है तो हमारा घमण्ड चूर चूर होकर धरती मे समाहित ह...

प्रतिदिन स्मरण योग्य शुभ सुंदर मंत्र संग्रह

!! प्रतिदिन स्मरण योग्य शुभ सुंदर मंत्र संग्रह !! प्रात: कर-दर्शनम्.... कराग्रे वसते लक्ष्मी करमध्ये सरस्वती। करमूले तु गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम्॥ पृथ्वी क्षमा प्रार्थना..... समुद्र वसने देवी पर्वत स्तन मंडिते। विष्णु पत्नी नमस्तुभ्यं पाद स्पर्शं क्षमश्वमेव॥ त्रिदेवों के साथ नवग्रह स्मरण..... ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी भानु: शशी भूमिसुतो बुधश्च। गुरुश्च शुक्र: शनिराहुकेतव: कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम्॥ स्नान मन्त्र....... गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती। नर्मदे सिन्धु कावेरी जले अस्मिन् सन्निधिम् कुरु॥ सूर्यनमस्कार...... ॐ सूर्य आत्मा जगतस्तस्युषश्च आदित्यस्य नमस्कारं ये कुर्वन्ति दिने दिने। दीर्घमायुर्बलं वीर्यं व्याधि शोक विनाशनम्  सूर्य पादोदकं तीर्थ जठरे धारयाम्यहम्॥ ॐ मित्राय नम: ॐ रवये नम: ॐ सूर्याय नम: ॐ भानवे नम: ॐ खगाय नम: ॐ पूष्णे नम: ॐ हिरण्यगर्भाय नम: ॐ मरीचये नम: ॐ आदित्याय नम: ॐ सवित्रे नम: ॐ अर्काय नम: ॐ भास्कराय नम: ॐ श्री सवितृ सूर्यनारायणाय नम: आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीदमम् भास्कर। दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तु ते॥ दीप दर्शन...... शुभं करोति कल्याणम् आर...