सकारात्मक ऊर्जा उपासना - दीपावली

सकारात्मक ऊर्जा उपासना - दीपावली 

       शुभं करोति कल्याणम् आरोग्यम् धनसंपदा।
        शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपकाय नमोऽस्तु ते।।
        दीपो ज्योति परं ब्रह्म दीपो ज्योतिर्जनार्दन:।
        दीपो हरतु मे पापं संध्यादीप नमोऽस्तु ते।।

       दीपावली पर्वके साथ अनेक कथाएं कही जाती है । भगवान राम वनवास पूरा कर अयोध्या पधारे । श्रीकृष्ण ने नरकासुर का वध किया । भगवान महावीर का निर्वाह । शिख गुरु की बंधन मुक्ति ऐसी अनेक घटना इसी समय हुई होगी वो विषय अलग है पर दीपावली तो सत्युगमे भी ये पर्वरूप उत्सव था । तब ये कोई घटना ही नही घटी थी। श्रीराम और कृष्ण के जन्मसे पहले सत्युगमे भी ये पर्व मनाया जाता था ।

      ब्रह्मांड रचना ओर ग्रह , नक्षत्र  ओर विविध लोक का चोककस स्थान और पल,विपल,घड़ी,मुहूर्त,प्रहर,तिथि ,मास ओर वर्ष की चोककस समय गणना ओर उन समय ऊर्जा शक्ति ( विविध देवी शक्तिओ ) के स्थान प्रवाह की सूक्ष्म जानकारी के आधार पर पूजा , स्मरण या विवुध क्रियाओ द्वारा ज्यादा से ज्यादा लाभ प्राप्त करने हेतु दिया गया दिशा निर्देश मतलब खगोल शास्त्र । 

    नित्य संध्या कालमे देव वंदन , ऊर्जा ( सूर्य ) की पूजा से दिव्य लाभ प्राप्त होता है । ऐसे ही वर्ष की "महासंध्या" जब नया साल ओर पुराने साल की संध्या का समय त्रयोदशी, चतुर्दशी,अमावस्या का समय पर ब्रह्मांडमें सकारात्मक और नकारात्मक ऊर्जा सबसे ज्यादा प्रबल होती है । इसलिए उन समय सकारात्मक ऊर्जा की उवासना द्वारा श्रेष्ठ लाभ प्राप्त करने का पर्व है दीपावली । 
संधिकाल में जिस तरह प्रकृति में परिवर्तन होता है उसी तरह हमारे शरीर, मन और मस्तिष्क में भी परिर्तन होता है। कोई व्यक्ति यदि संध्या के समय खुद के या परिवार के लिए कटु वचन बोलता है तो उसके यह वचन धीरे-धीरे बुरी घटनाओं का रूप ले लेते हैं। क्योंकि यह एक ऐसा समय होता है जबकि हमारे मन और मस्तिष्क का द्वार खुला रहता है। हम प्रकृति से और प्रकृति हमसे इस काल में हमारी इच्छाएं, आकांशाएं आदि सभी ग्रहण कर रही होती है। प्रकृति जो सुनती है वैसा ही आपके लिए करती है। इस काल में जो लोग ईश्वर के समक्ष उपस्थित होकर मन्नत मांगते हैं उनकी मन्नत अवश्यपूर्ण होती है। इसीलिए कहा जाता है कि संध्याकाल अर्थात उषाकाल, सायंकाल और प्रदोष काल में व्यक्ति को भगवान की शरण में रहकर सकारात्मक बातों को सोचना चाहिए जिससे की जीवन में सब कुछ सकारात्मक ही हो।

     सर्वप्रथम तो यह दीपावली सतयुग में ही मनाई गई। जब देवता और दानवों ने मिलकर समुद्र मंथन किया तो इस महा अभियान से ही ऐरावत, चंद्रमा, उच्चैश्रवा, परिजात, वारुणी, रंभा आदि 14 रत्नों के साथ हलाहल विष भी निकला और अमृत घट लिए धन्वंतरि भी प्रकटे। इसी से तो स्वास्थ्य के आदिदेव धन्वंतरि की जयंती से दीपोत्सव का महापर्व आरंभ होता है।

कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी अर्थात धनतेरस को। तत्पश्चात इसी महामंथन से देवी महालक्ष्मी जन्मीं और सारे देवताओं द्वारा उनके स्वागत में प्रथम दीपावली मनाई गई। ऋषिमियोनियो ने उस पर्व का श्रेष्ठ लाभ प्राप्त करने हेतु जो पूजा पाठ के निर्देश दिए है वो समझते है ।

    त्रयोदशी जिसे धनतेरस कहते है । उस दिन धन्वंतरि पूजन सुआरोग्य केलिए किया जाता है । शारदा पूजन सोलह कला का ज्ञान प्राप्त हेतु । सोना , चांदी , नए वस्त्र बिगरे की खरीद करना , मिठाई बगैरा पकवान ये सब घरके छोटे बच्चे , घरकी स्त्रीओ की प्रसन्नता केलिए है । उन समय कुटुम्ब , परिवार , पड़ोसी , याचक हर कोई प्रसन्न रहे तो उनकी मनकी प्रसन्नता भी श्रेष्ठ सकारात्मक ऊर्जा देती है । 

 चतुर्दशी  जिसे नरक चतुर्दशी कालरात्रि भी कहते है । नकारात्मक ( आसुरी ) ऊर्जा से रक्षण केलिए उपास्य देवी देवताओं के उग्र स्वरुप की पूजा की जाती है । हनुमानजी , भैरवजी , महाकाली , पितृदेव , यमदेव बिगेरा की पूजा की जाती है । 

   दीपावली अमावस्या - इस दिन संध्या के बाद गणपति , कुलदेवी , इष्टदेव सह लक्ष्मीजी की पूजा की जाती है । धन , धान्य , आरोग्य , संतति सुख संपदा केलिए ये सब कुलगोत्र के देवी देवताओं की पूजा कर विशेष लाभ लिया जाता है । 

    पूरे दीपावली पर्व का महत्वपूर्ण अंग है भगवान सूर्यनारायण के प्रतीक दिप पूजा । घरके पूजा स्थानमे कुलदेवी ओर लक्ष्मी की ज्योत पीतल या अन्य धातु के दिये लगाए और इस विशेष पर्व पर पांच मिट्टी के दिये गाय के घी से घर के पूजा स्थानमे लगाए । पंचतत्व के देवता गणपति , सूर्य , विष्णु,शक्ति और रुद्र केलिए ये पांच दिप पूजा स्थानमे लगाए । मिट्टीके दिए में तेल से दिया घर के बाकी स्थानों ओर लगाए । जिसमे घर की छत पर एक वो ब्रह्म दिप है । घरके प्रवेशद्वार की दोनों तरफ एक एक लाभ और शुभ केलिए है । तुलसी क्यारे पर एक वनदेवी केलिए है । सभी बारी दरवाजे पर के दिये नभमंडल की ऊर्जा प्राप्ति जेलिये है । घरके कूड़ादान के पास एक दिया आरोग्य केलिए है । पीपल के वृक्ष के पास ग्रहदेवताओ केलिए है । इस तरह दिप जलाकर सकारात्मक ऊर्जा प्राप्ति केलिए मिट्टी के दिये तेल से जलाये ।

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