विक्रम और शनि
- कैसे बन गए शनि सर्वोच्च ग्रह जाने ये अदभुत कथा
शनिदेव की शक्ति से हम सभी भयभीत रहते हैं परंतु स्वंय शनि इससे अनजान थे। कैसे हुआ उन्हें इसका ज्ञान इसकी एक अनोखी कहानी है।
श्रेष्ठता के लिए ग्रहों में विवाद
एक पौराणिक कथाओं के अनुसार बताते हैं कि एक बार सभी नवग्रहों सूर्य, चंद्र, मंगल, बुद्ध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु में विवाद छिड़ गया, कि इनमें सबसे बड़ा कौन है। सभी का दावा था कि वही सर्वोत्तम हैं। जब वे आपस में निर्णय नहीं कर सके तो देवराज इंद्र के दरबार में उनसे इस पर फैसला देने के लिए कहा। इंद्र इस स्थिति से डर गए और उन्होंने कहा कि वे इस पर फैसला लेने में सक्षम नहीं है। साथ ही उन्होंने उस समय पृथ्वी पर राज कर रहे राजा विक्रमादित्य की योग्यता और न्यायप्रियता का जिक्र करते हुए उनकी सलाह लेने के लिए कहा। इस पर सभी ग्रह राजा विक्रमादित्य के पास पहुंचे, और उन्हें अपना विवाद बताते हुए निर्णय के लिये कहा। ग्रहों की बात सुन कर राजा काफी चिंतित हो उठे, क्योंकि वे जानते थे, कि जिस किसी को भी छोटा बताया, वही रुष्ट हो जायेगा। अब राजा ने युक्ति निकाली, उन्होंने स्वर्ण, रजत, कांस्य, पीतल, सीसा, रांगा, जस्ता, अभ्रक और लौह से नौ सिंहासन बनवाये, और उन्हें इसी क्रम से रख दिया। इसके बाद सभी ग्रहों से निवेदन किया, कि वे सिंहासन पर स्थान ग्रहण करें, जो अंतिम सिंहासन पर बैठेगा, वही सबसे छोटा होगा।
शनि हुए रुष्ट
सारे ग्रहों ने अपना स्थान ग्रहण किया जिसमें लौह सिंहासन सबसे आखीर में था जिस पर शनिदेव सबसे बाद में बैठे, और वही सबसे छोटे कहलाये। इस पर शनि कुपित हो गए उन्हें लगा कि राजा ने यह जान बूझ कर किया है। तब शनि ने गुस्से में राजा से कहा कि वो उन्हें नहीं जानते, जैसे सूर्य एक राशि में एक महीना, चंद्रमा सवा दो महीना दो दिन, मंगल डेढ़ महीना, बृहस्पति तेरह महीने, बुद्ध और शुक्र एक एक महीने विचरण करते हैं, वैसे ही शनि ढाई से साढ़े-सात साल तक एक राशि में रहते हैं। जिसके चलते बड़े बड़ों का विनाश हो जाता है। शनि ने कहा कि ये शनि की साढ़े साती ही थी जिसने श्री राम को चौदह वर्ष का बनवास कराया और जब रावण जैसे महावीर पर आई तो मामुली बानर सेना ने लंका पर विजय प्राप्त कर उसका अंत करवा दिया। इसके बाद राजा को सावधान रहने को कहकर शनिदेव गुस्से में वहां से चले गए।
साढ़े साती का प्रभाव
कुछ समय बाद राजा पर शनि साढ़े साती आयी, और शनि देव घोड़ों के सौदागर बनकर उनके राज्य में कई बढ़िया घोड़े लेकर आये। राजा ने यह समाचार सुन कर अपने अश्वपाल को अच्छे घोड़े खरीदने की अज्ञा दी। उसने कई अच्छे घोड़े खरीदे। इन्हीं में से एक श्रेष्ठ घोड़े पर राजा सवारी करने निकले, परंतु जैसे वो उसपर सवार हुए घोड़ा सरपट वन की ओर भागा और भीषण वन में राजा को गिरा कर वहां से भाग गया। भूखा प्यासा राजा उस जंगल भटकने लगा। तब एक ग्वाले ने दया करके उसे पानी पिलाया। राजा ने प्रसन्न हो कर उसे अपनी अंगूठी दे दी। इसके बाद वो एक सेठ की दुकान में उज्जैन पहुंचा और अपना नाम बताया वीका। सेठ की दूकान उन्होंने जल पीकर कुछ देर विश्राम किया, भाग्य से उस दिन सेठ जी की सूब कमाई हुई। सेठ ने समझा कि वीका उसके लिए भाग्यशाली है वह उसे खाना खिलाने अपने साथ घर ले गया। जहां खूंटी पर एक हार टंगा था। अनायास सेठ को अनोखा दृश्य दिखा कि हार को खूंटी निगल रही है, और देखते देखते पूरा हार गायब, ये देख कर सेठ घबरा गया और उसे वीका की कारस्तानी समझ कर कोतवाल से कह कर ना सिर्फ जेल भिजवाया बल्कि हाथ पांव भी कटवा दिए। के और नगर के बहर फिंकवा दिया। राजा अपनी इस दुदर्शा पर हैरान था।
समझा शनि का प्रभाव
जहां वीका गिरा था वहां से गुजर रहे एक तेली को उस पर दया आ गई और उसने अपनी बैलगाड़ी में उसे चढ़ा लिया। वीका बना राजा अपनी जीभ से बैलों को हांकते हुए गाड़ी चलाने लगा। उसी काल में राजा की शनि दशा समाप्त हो गयी, और वो वर्षा के स्वागत के लिए मल्हार गाने लगा। इस गीत को नगर की राजकुमारी ने सुना और उस पर मोहित हो गई। उसने मन ही मन प्रण कर लिया, कि वह गायक से ही विवाह करेगी। पता लगवाने पर राजा कि स्थिति के बारे में पता चला परंतु सबके समझाने के बावजूद राजकुमारी का निश्चय नहीं बदला और उसने उसी अपंग गायक से शादी करने का निर्णय कर लिया। अतत दोनों का विवाह हो गया।तब शनि देव ने राजा को स्वप्न में दर्शन दे कर कहा कि देखा मुझे छोटा बताने का नतीजा। तब राजा ने उनसे क्षमा मांगी और अनुरोध किया कि ऐसा कष्ट किसी को भी ना दें। तब शनिदेव ने का जो उनका व्रत करेगा और कथा कहेगा, उसे शनि की दशा में कोई दुःख और कष्ट नहीं होगा, उसके सारे मनोरथ पूर्ण होंगे। साथ ही राजा को हाथ पैर भी वापस दिये।
शनि बने सर्वोच्च
सुबह राजकुमारी अपने पति को एकदम ठीक देख कर हैरान रह गई तब राजा ने उसे अपना असली परिचय देते हुए बताया कि वह उज्जैन का राजा विक्रमादित्य है। जब सेठ ने यह सब सुना तो वह राजा से क्षमा मांगने लगा, इस पर राजा ने कहा, कि वह तो शनिदेव का कोप था। इसमें किसी का कोई दोष नहीं। सेठ ने कहा कि उसे शांति तब ही मिलेगी जब वे उसके घर चलकर भोजन करेंगे। राजा गया तो सेठ ने देखा की खूंटी ने हार वापस निकल दिया है। सेठ ने अपनी कन्या का विवाह भी राजा से कर दिया। इसके बाद अपनी दोनों पत्नियों के साथ राजा उज्जैन नगरी आये जहां नगरवासियों ने उनका भव्य स्वागत किया। नगर आगमन के उत्सव पर राजा ने घोषणा की कि उन्होंने शनि देव को सबसे छोटा बताया था जोकि गलत है असल में वही सर्वोपरि हैं। तबसे सारे राज्य में शनिदेव की पूजा और कथा नियमित होने लगी।
विक्रम और शनि
विक्रमादित्य और शनि का किस्सा विश्व प्रसिद्ध है इसका प्रमुख उदाहरण है कि शनि से संबंधित विक्रमादित्य की कहानी को कर्नाटक राज्य में अक्सर के यक्षगान में प्रस्तुत किया जाता है।
कहानी के अनुसार, विक्रम नवरात्रि का पर्व बड़े धूम-धाम से मना रहे थे और प्रतिदिन एक ग्रह पर वाद-विवाद चल रहा था। अंतिम दिन की बहस शनि के बारे में थी। ब्राह्मण ने शनि की शक्तियों सहित उनकी महानता और पृथ्वी पर धर्म को बनाए रखने में उनकी भूमिका की व्याख्या की। समारोह में ब्राह्मण ने ये भी कहा कि विक्रम की जन्म कुंडली के अनुसार उनके बारहवें घर में शनि का प्रवेश है, जिसे सबसे खराब माना जाता है। लेकिन विक्रम संतुष्ट नहीं थे; उन्होंने शनि को महज लोककंटक के रूप में देखा, जिन्होंने उनके पिता (सूर्य), गुरु (बृहस्पति) को कष्ट दिया था। इसलिए विक्रम ने कहा कि वे शनि को पूजा के योग्य मानने के लिए तैयार नहीं हैं। विक्रम को अपनी शक्तियों पर, विशेष रूप से अपने देवी मां का कृपा पात्र होने पर बहुत गर्व था। जब उन्होंने नवरात्रि समारोह की सभा के सामने शनि की पूजा को अस्वीकृत कर दिया, तो शनि भगवान क्रोधित हो गए। उन्होंने विक्रम को चुनौती दी कि वे विक्रम को अपनी पूजा करने के लिए बाध्य कर देंगे। जैसे ही शनि आकाश में अंतर्धान हो गए, विक्रम ने कहा कि यह उनकी खुशकिस्मती है और किसी भी चुनौती का सामना करने के लिए उनके पास सबका आशीर्वाद है। विक्रम ने निष्कर्ष निकाला कि संभवतः ब्राह्मण ने उनकी कुंडली के बारे में जो बताया था वह सच हो; लेकिन वे शनि की महानता को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे। विक्रम ने निश्चयपूर्वक कहा कि "जो कुछ होना है, वह होकर रहेगा और जो कुछ नहीं होना है, वह नहीं होगा" और उन्होंने कहा कि वे शनि की चुनौती को स्वीकार करते हैं।
एक दिन एक घोड़े बेचने वाला उनके महल में आया और कहा कि विक्रम के राज्य में उसका घोड़ा खरीदने वाला कोई नहीं है। घोड़े में अद्भुत विशेषताएं थीं - जो एक छलांग में आसमान पर, तो दूसरे में धरती पर पहुंचता था। इस प्रकार कोई भी धरती पर उड़ या सवारी कर सकता है। विक्रम को उस पर विश्वास नहीं हुआ, इसीलिए उन्होंने कहा कि घोड़े की क़ीमत चुकाने से पहले वे सवारी करके देखेंगे. विक्रेता इसके लिए मान गया और विक्रम घोड़े पर बैठे और घोड़े को दौडाया. विक्रेता के कहे अनुसार, घोड़ा उन्हें आसमान में ले गया। दूसरी छलांग में घोड़े को धरती पर आना चाहिए था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। इसके बजाय उसने विक्रम को कुछ दूर चलाया और जंगल में फेंक दिया। विक्रम घायल हो गए और वापसी का रास्ता ढूंढ़ने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि यह सब उनका नसीब है, इसके अलावा और कुछ नहीं हो सकता; वे घोड़े के विक्रेता के रूप में शनि को पहचानने में असफल रहे। जब वे जंगल में रास्ता ढ़ूढ़ने की कोशिश कर रहे थे, डाकुओं के एक समूह ने उन पर हमला किया। उन्होंने उनके सारे गहने लूट लिए और उन्हें खूब पीटा. विक्रम तब भी हालत से विचलित हुए बिना कहने लगे कि डाकुओं ने सिर्फ़ उनका मुकुट ही तो लिया है, उनका सिर तो नहीं। चलते-चलते वे पानी के लिए एक नदी के किनारे पहुंचे। ज़मीन की फिसलन ने उन्हें पानी में पहुंचाया और तेज़ बहाव ने उन्हें काफ़ी दूर घसीटा.
किसी तरह धीरे-धीरे विक्रम एक नगर पहुंचे और भूखे ही एक पेड़ के नीचे बैठ गए। जिस पेड़ के नीचे विक्रम बैठे हुए थे, ठीक उसके सामने एक कंजूस दुकानदार की दुकान थी। जिस दिन से विक्रम उस पेड़ के नीचे बैठे, उस दिन से दुकान में बिक्री बहुत बढ़ गई। लालच में दुकानदार ने सोचा कि दुकान के बाहर इस व्यक्ति के होने से इतने अधिक पैसों की कमाई होती है और उसने विक्रम को घर पर आमंत्रित करने और भोजन देने का निर्णय लिया। बिक्री में लंबे समय तक वृद्धि की आशा में, उसने अपनी पुत्री को विक्रम के साथ शादी करने के लिए कहा. भोजन के बाद जब विक्रम कमरे में सो रहे थे, तब पुत्री ने कमरे में प्रवेश किया। वह बिस्तर के पास विक्रम के जागने की प्रतीक्षा करने लगी। धीरे- धीरे उसे भी नींद आने लगी। उसने अपने गहने उतार दिए और उन्हें एक बत्तख के चित्र के साथ लगी कील पर लटका दिया। वह सो गई। जागने पर विक्रम ने देखा कि चित्र का बत्तख उसके गहने निगल रहा है। जब वे अपने द्वारा देखे गए दृश्य को याद कर ही रहे थे कि दुकानदार की पुत्री जग गई और देखती है कि उसके गहने गायब हैं। उसने अपने पिता को बुलाया और कहा कि वह चोर है।
विक्रम को वहां के राजा के पास ले जाया गया। राजा ने निर्णय लिया कि विक्रम के हाथ और पैर काट कर उन्हें रेगिस्तान में छोड़ दिया जाए. जब विक्रम रेगिस्तान में चलने में असमर्थ और ख़ून से लथपथ हो गए, तभी उज्जैन में अपने मायके से ससुराल लौट रही एक महिला ने उन्हें देखा और पहचान लिया। उसने उनकी हालत के बारे में पूछताछ की और बताया कि उज्जैनवासी उनकी घुड़सवारी के बाद गायब हो जाने से काफी चिंतित हैं। वह अपने ससुराल वालों से उन्हें अपने घर में जगह देने का अनुरोध करती है और वे उन्हें अपने घर में रख लेते हैं। उसके परिवार वाले श्रमिक वर्ग के थे; विक्रम उनसे कुछ काम मांगते हैं। वे कहते हैं कि वे खेतों में निगरानी करेंगे और हांक लगाएंगे ताकि बैल अनाज को अलग करते हुए चक्कर लगाएं. वे हमेशा के लिए केवल मेहमान बन कर ही नहीं रहना चाहते हैं।
एक शाम जब विक्रम काम कर रहे थे, हवा से मोमबत्ती बुझ जाती है। वे दीपक राग गाते हैं और मोमबत्ती जलाते हैं। इससे सारे नगर की मोमबत्तियां जल उठती हैं - नगर की राजकुमारी ने प्रतिज्ञा कि थी कि वे ऐसे व्यक्ति से विवाह करेंगी जो दीपक राग गाकर मोमबत्ती जला सकेगा। वह संगीत के स्रोत के रूप में उस विकलांग आदमी को देख कर चकित हो जाती है, लेकिन फिर भी उसी से शादी करने का फैसला करती है। राजा जब विक्रम को देखते हैं तो याद करके आग-बबूला हो जाते हैं कि पहले उन पर चोरी का आरोप था और अब वह उनकी बेटी से विवाह के प्रयास में है। वे विक्रम का सिर काटने के लिए अपनी तलवार निकाल लेते हैं। उस समय विक्रम अनुभव करते हैं कि उनके साथ यह सब शनि की शक्तियों के कारण हो रहा है। अपनी मौत से पहले वे शनि से प्रार्थना करते हैं। वे अपनी ग़लतियों को स्वीकार करते हैं और सहमति जताते हैं कि उनमें अपनी हैसियत की वजह से काफ़ी घमंड था। शनि प्रकट होते हैं और उन्हें उनके गहने, हाथ, पैर और सब कुछ वापस लौटाते हैं। विक्रम शनि से अनुरोध करते हैं कि जैसी पीड़ा उन्होंने सही है, वैसी पीड़ा सामान्य जन को ना दें। वे कहते हैं कि उन जैसा मजबूत इन्सान भले ही पीड़ा सह ले, पर सामान्य लोग सहन करने में सक्षम नहीं होंगे। शनि उनकी बात से सहमत होते हुए कहते हैं कि वे ऐसा कतई नहीं करेंगे। राजा अपने सम्राट को पहचान कर, उनके समक्ष समर्पण करते हैं और अपनी पुत्री की शादी उनसे कराने के लिए सहमत हो जाते हैं। उसी समय, दुकानदार दौड़ कर महल पहुंचता है और कहता है कि बतख ने अपने मुंह से गहने वापस उगल दिए हैं। वह भी राजा को अपनी बेटी सौंपता है। विक्रम उज्जैन लौट आते हैं और शनि के आशीर्वाद से महान सम्राट के रूप में जीवन व्यतीत करते हैं।
एक बार की बात है कि सभी देवता गण में इस बात को लेकर कि उनमें सर्व श्रेष्ठ कौन है वाद-विवाद हो गया। उनका विवाद जब बढ़ने लगा तो वह तो उन्होंने देवराज इंद्र के पास जाने का निर्णय किया और सभी देवता गण उनके पास पहुंच गए। वहां जाकर सब उनसे इस बात का उत्तर मांगने लग कि उन में से सर्व श्रेष्ठ देवता कौन है। देवताओं की बात सुनक देवराज भी चिंता में पड़ गए की इनको क्या उत्तर दूं। फिर उन्होंने ने उन सब से कहा पृथ्वीलोक में उज्जैनी नामक एक नगरी है, वहां के राजा विक्रमादित्य जो न्याय करने में बहुत ज्ञानी माने जाते हैं। वह तुरंत ही दूध का दूध और पानी का पानी कर देते हैं। आप सब उनके पास जाईए वो आपकी शंका का समाधान अवश्य करेंगे |
सभी देवता गण देवराज इंद्र की बात मानकर विक्रमादित्य के पास पहुंचेऔर उनको सारी बात बताई, तो विक्रमादित्य ने अलग-अलग धातुओं सोना,तांबा, कांस्य, चंडी आदि के आसन बनवाए और सभी को एक के बाद एक रखने को कहा और सभी देवताओं को उन पर बैठने को कहा उसके बाद राजा ने कहा फैसला हो गया जो सबसे आगे बैठे हैं वो सबसे ज्यादा श्रेष्ठ हैं। इस हिसाब से शनिदेव सबसे पीछे बैठे थे, राजा की ये बात सुनकर शनिदेव बहुत ही क्रोधित हुए और राजा को बोला तुमने मेरा घोर अपमान किया है जिसका दंड तुम्हें अवश्य भुगतना पड़ेगा।
उसके बाद शनि देव समेत सभी देवता वहां से चले गए लेकिन शनिदेव अपने अपमान को भूल नहीं पाए। वह राजा विक्रमदित्य को दंड देना चाहते थे। राजा को दंड देने के लिए एक बार शनिदेव ने एक घोड़े के व्यापारी का रूप धारण किया और राजा के पास पहुंच गए। राजा को घोड़ा बहुत पसंद आया और उन्होंने वो घोड़ा खरीद लिया। पर जब वो उस पर सवार हुए तो घोडा़ तेजी से भागने लगा और राजा को एक घने जंगल में गिरा कर भाग गया। अब राजा विक्रमादित्य जंगल में अकेले भूखे प्यासे भटकते-भटकते एक नगर में जा पंहुंचे। वहां जब एक सेठ ने राजा की ये हालत देखी तो उसे राजा पर बहुत दया आई और वह उन्हें अपने घर ले गया। उस ही दिन सेठ को अपने व्यापर में काफी मुनाफा हुआ। उसको लगा कि ये मेरे लिए यकीनन ही बहुत भाग्यशाली है। सेठ के घर में एक सोने का हार खूंटी से लटके हुए था। सेठ विक्रमादित्य को घर में कुछ देर अकेला छोड़ किसी काम से बाहर गया तो इस बीच खूंटी सोने के हार को निगल गई। सेठ जब वापस आया तो सोने के हार को न पाकर बहुत क्रोधित हुआ।
उसे लगा की विक्रमादित्य ने हार चुरा लिया वो उसे लेकर उस नगर के राजा पास गया और सारी बात बताई। राजा ने विक्रमादित्य से पूछा की ये सच है तो विक्रमादित्य ने बताया कि जिस खूंटी पर सोने का हार लटक रहा था वो खूंटी उस हार को निगल गई। राजा को इस बात पर बिल्कुल भरोसा नहीं हुआ और राजा ने विक्रमादित्य के हाथ-पैर काट देने की सजा सुना दी। अब विक्रमादित्य के हाथ को पैर काटकर नगर के चौराहे पर रख दिया गया।
एक दिन उधर से एक तेली गुजरा उसने जब विक्रमादित्य की हालत देखी तो उसे बहुत दुख हुआ और वह उन्हें अपने घर ले आया। एक दिन राजा विक्रमादित्य मल्लहार गा रहे थे और उस ही रास्ते से उस नगर की राजकुमारी जा रही थी। उसने जब मल्लहार की आवाज सुनी तो वो आवाज का पीछा करते विक्रमादित्य के पास पहुंचीं और उनकी ये हालत देखकर बहुत दुखी हुई और अपने महल जा कर पिता से विक्रमादित्य से शादी करने की जिद्द करने लगी।
पहले तो राजा को बहुत क्रोधित आया लेकिन फिर बेटी की जिद्द के आगे झुक कर उन दोनों का विवाह करा दिया। तब तक विक्रमादित्य पर शनि देव की साढ़े सती का प्रकोप भी समाप्त हो गया था फिर एक दिन शनिदेव विक्रमादित्य के स्वप्न में आए और बताया की ये सारी घटना उनके प्रकोप के कारण हुई। तब राजा ने कहा हे प्रभु! आपने जितना कष्ट मुझे दिया उतना किसी को न देना। शनि देव ने राजा को कहा जो शुद्ध मन से मेरी पूजा करेगा शनिवार का व्रत रखेगा वो हमेशा मेरी कृपा का पात्र रहेगा। सुबह हुई तो राजा के हाथ पैर वापस आ चुके थे, राजकुमारी ने जब यह देखा तो बहुत प्रसन्न हुई। अब राजा विक्रमादित्य और रानी उज्जैनी नगरी आए और नगर में घोषणा करवाई कि शनिदेव सबसे श्रेष्ठ हैं सब लोगो को शनिदेव का उपवास और व्रत रखना चाहिए।
Shani vrat katha _ चल रही है शनि की साढ़ेसाती तो पढ़ लीजिए यह व्रत कथा, बचे रहेंगे दुष्प्रभाव से
शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या के दौरान शनिवार को व्रत रखने के साथ-साथ शनिवार व्रत कथा का पढ़ना और सुनना विशेष रूप से लाभदायक होता है। चूंकि कल यानी 24 जनवरी से शनि अपनी राशि मकर में प्रवेश करने जा रहे हैं, शनि के इस गोचर के दौरान कुछ राशियां ऐसी भी हैं जिनकी साढ़ेसाती और ढैय्या भी शुरू हो जाएगी। इसलिए अगर आपकी राशि पर शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या लगने वाली है तो आप शनिवार के दिन व्रत अवश्य रखें, इससे साढ़ेसाती और ढैय्या में लाभ मिलता है। शनिवार व्रत के साथ शनिदेव की कथा भी पढ़नी चाहिए ऐसा करने से शनिदेव की विशेष कृपा बनी रहती है। तो चलिए जानते हैं कि क्या है शनिवार व्रत की कथा जिसे पढ़ना शुभफलदायी होता है।
1/9छिड़ा नवग्रहों में विवाद

एक बार की बात है सभी नवग्रहों यथा सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति,शुक्र, शनि, राहु और केतु में विवाद छिड़ गया कि इनमें सबसे बड़ा कौन है? सभी आपस में लड़ने लगे और कोई निर्णय न होने पर देवराज इंद्र के पास निर्णय कराने पहुंचे। इंद्रदेव घबरा गए और उन्होंने निर्णय करने में अपनी असमर्थता जताई परंतु उन्होंने कहा, कि इस समय पृथ्वी पर राजा विक्रमादित्य हैं, जो कि अति न्यायप्रिय हैं। वे ही इसका निर्णय कर सकते हैं। सभी ग्रह एक साथ राजा विक्रमादित्य के पास पहुंचे, और अपना विवाद बताया। साथ ही निर्णय के लिये कहा।
साढ़ेसाती में भी दिन, रात बीतेगा शानदार, ये उपाय आजमाकर तो देखिए
2/9राजा विक्रमादित्य के पास पहुंचा मामला

राजा विक्रमादित्य इस समस्या से चिंतित थे क्योंकि वे जानते थे कि जिस किसी को भी छोटा बताया, वही क्रोधित हो उठेगा। तब राजा को एक उपाय सूझा। उन्होंने स्वर्ण, रजत, कांस्य, पीतल, सीसा, रांगा, जस्ता, अभ्रक और लौह से 9 सिंहासन बनवाए, और उन्हें इसी क्रम से रख दिया। फिर उन सबसे निवेदन किया कि आप सभी अपने-अपने सिंहासन पर स्थान ग्रहण करें। जो भी अंतिम सिंहासन पर बैठेगा, वही सबसे छोटा होगा।
3/9 विक्रमादित्य पर फूटा शनिदेव का क्रोध

इसके अनुसार लौह सिंहासन सबसे बाद में होने के कारण, शनिदेव सबसे बाद में बैठे। तो वही सबसे छोटे कहलाए। शनिदेव को लगा कि राजा ने ऐसा जानकर किया है और वह गुस्से में राजा से बोले, ‘राजा! तू मुझे नहीं जानता। सूर्य एक राशि में एक महीना, चंद्रमा सवा दो महीना दो दिन, मंगल डेड़ महीना, बृहस्पति तेरह महीने, व बुद्ध और शुक्र एक एक महीने विचरण करते हैं लेकिन मैं ढाई से साढ़े-सात साल तक रहता हूं। बड़े-बड़ों का मैंने विनाश किया है।’ श्री राम की साढ़े साती आई तो उन्हें वनवास हो गया, रावण की आई तो उसकी लंका को वानरों की सेना से हारना होना पड़ा। अब तुम सावधान रहना। ऐसा कहकर कुपित होते हुए शनिदेव वहां से चले गए।
4/9जब आई राजा की साढ़ेसाती

अन्य देवता खुशी-खुशी चले गए। कुछ समय बाद राजा की साढ़े साती आई। तब शनिदेव घोड़ों के सौदागर बनकर वहां आए। उनके साथ कई बढ़िया घोड़े थे। राजा ने यह समाचार सुन अपने अश्वपाल को अच्छे घोड़े खरीदने की आज्ञा दी। उसने कई अच्छे घोड़े खरीदे व एक सर्वोत्तम घोड़े को राजा को सवारी हेतु दिया। राजा ज्यों ही उस पर बैठा, वह घोड़ा सरपट वन की ओर भागा, भीषण वन में पहुंच वह अंतर्धान हो गया।
5/9इस तरह राजा के शुरू हुए बुरे दिन

अब राजा भूखा प्यासा भटकता रहा, तब एक ग्वाले ने उसे पानी पिलाया। राजा ने प्रसन्न हो कर उसे अपनी अंगूठी दी। वह अंगूठी देकर राजा नगर को चल दिया और वहां अपना नाम उज्जैन निवासी वीका बताया। वहां एक सेठ की दुकान में उसने जल इत्यादि पिया। और कुछ देर आराम किया। भाग्यवश उस दिन सेठ की खूब बिक्री हुई। सेठ उसे खाना इत्यादि कराने खुश होकर अपने साथ घर ले गया। वहां उसने एक खूंटी पर देखा, कि एक हार टंगा है, जिसे खूंटी निगल रही है। थोड़ी देर में पूरा हार गायब था। तब सेठ ने आने पर देखा कि हार गायब है। सेठ ने समझा कि वीका ने ही उसे चुराया है, उसने वीका को कोतवाल के पास पकड़वा दिया।
6/9राजा का हुआ राजकुमारी से विवाह

फिर उस नगर के राजा ने भी वीका को चोर समझ कर उसके हाथ पैर कटवा दिए और नगर के बाहर फेंकवा दिया। वहां से एक तेली निकल रहा था, जिसे दया आई, और उसने वीका को अपनी गाड़ी में बैठाया। वह अपनी जीभ से बैलों को हांकने लगा। उस समय राजा की शनिदशा समाप्त हो गई। वर्षा ऋतु आने पर राजा मल्हार गाने लगा। राजा जिस नगर में था, वहां की राजकुमारी मनभावनी को उसका गाना इतना पसंद आया कि उसने मन ही मन प्रण कर लिया कि वह उस राग गाने वाले से ही विवाह करेगी। राजकुमारी ने दासी को राग गाने वाले को ढूंढने भेजा। दासी ने बताया कि वह एक चौरंगिया (अपाहिज) है परंतु राजकुमारी ना मानी। अगले ही दिन से उठते ही वह अनशन पर बैठ गई कि विवाह करेगी तो उसी से ही करेगी। बहुत समझाने पर भी जब राजकुमारी नहीं मानी, तो राजा ने उस तेली को बुला भेजा, और विवाह की तैयारी करने को कहा, फिर उसका विवाह राजकुमारी से हो गया।
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7/9सपने में दिए राजा को शनिदेव ने दर्शन

तब एक दिन सोते हुए स्वप्न में शनिदेव ने राजा से कहा, ‘ राजन देखा तुमने मुझे छोटा बता कर कितना दुःख झेला है, तब राजा ने उनसे क्षमा मांगी, और प्रार्थना करते हुए कहा कि हे शनिदेव जैसा दुःख मुझे दिया है, किसी और को ना दें।’ शनिदेव मान गए, और कहा कि जो मेरी कथा और व्रत कहेगा, उसे मेरी दशा में कोई दुख नहीं होगा। जो भी व्यक्ति रोज मेरा ध्यान करेगा और चींटियों को आटा डालेगा, उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होंगी और शनिदेव ने राजा को हाथ पैर वापस कर दिए।
8/9सेठ को हुआ गलती का अहसास

प्रातः आंख खुलने पर राजकुमारी ने देखा, तो वह आश्चर्यचकित हुआ। वीका ने उसे बताया, कि वह उज्जैन का राजा विक्रमादित्य है। सभी अत्यंत प्रसन्न हुए, सेठ ने जब सुना, तो वह राजा के पैरों पर गिर कर क्षमा मांगने लगा। राजा ने कहा, कि वह तो शनिदेव का क्रोध था, इसमें किसी का कोई दोष नहीं, सेठ ने फिर भी निवेदन किया, कि मुझे शांति तब ही मिलेगी जब आप मेरे घर चलकर भोजन करेंगे। सेठ ने अपने घर नाना प्रकार के व्यंजनों से राजा का सत्कार किया। साथ ही सबने देखा, कि जो खूंटी हार निगल गयी थी, वही अब उसे उगल रही थी। सेठ ने अनेक मोहरें देकर राजा का धन्यवाद किया।
9/9शनिदेव ही हैं असली सर्वोपरि

सेठ ने राजा से अपनी कन्या श्रीकंवरी से विवाह करने का निवेदन किया। राजा ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। कुछ समय बाद राजा अपनी दोनों रानियों मनभावनी और श्रीकंवरी को सभी उपाहार् सहित लेकर उज्जैन नगरी को चले। वहां राजा के राज्यवासियों ने सीमा पर खूब आदर-सत्कार किया। सारे नगर में दीपमाला बनाई गई। राजा ने घोषणा की , कि मैंने शनि देव को सबसे छोटा बताया था, जबकि असल में वही सर्वोपरि हैं। तबसे सारे राज्य में शनिदेव की पूजा और कथा नियमित होने लगी। सारी प्रजा खुशी और आनंद के साथ जीवन बिताने लगी। जो भी कोई शनि देव की इस कथा को सुनता या पढ़ता है, उसके सारे दुःख दूर हो जाते हैं। व्रत के दिन इस कथा को अवश्य पढ़ना चाहिए।
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