पूजा और व्रत में प्याज लहसुन का प्रयोग क्यों नहीं होता।
पूजा और व्रत में प्याज लहसुन का प्रयोग क्यों नहीं होता।
राक्षस के अंश से लहसुन और प्याज की उत्पत्ति
भारत ब्राह्मणों, पंडितों, साधु सन्तों का देश है। इन सभी को आपने प्याज और लहसुन से परहेज करते देखा होगा। भारत में घर पर जब भी किसी पूजा पाठ का आयोजन किया जाता है तो उस दिन भी बिना प्याज-लहसुन के भोजन को तैयार किया जाता है।
हर नियम के पीछे कुछ न कुछ कारण जरूर होता है, तो भारत में चली आ रही इस परंपरा के पीछे भी कोई न कोई वजह तो जरूर होगी।
चलिए आज हम आपको भारत में चली आ रही इस प्राचीन परंपरा के बारे में पूरी जानकारी देने जा रहे हैं।
यह कहानी शुरू होती है समुद्र मंथन से, जैसा कि यह सर्वविदित है कि समुद्र मंथन के समय समुद्र से 14 रत्न निकले 14 रत्नों में सबसे अंतिम व 14 रत्न अमृत था।
जब समुद्र मंथन से अमृत निकला था तो अमृत पीने के लिए देवताओं व राक्षसों में छीना-झपटी होने लगी। यह छीना झपटी बारह देव दिनों तक चली। तब भगवान विष्णु ने एक माया रची, तब भगवान विष्णु धर्म की रक्षा के लिए और देवताओं को अमृतपान कराने के उद्देश्य से मोहिनी रूप धर देवों और राक्षसों को भ्रमित कर देवताओं को अमृत व दैत्यों को सुरा बांटना शुरू कर दिया।
उन्हें राक्षसों में से राहु नामक एक राक्षस को मोहिनी पर संदेह हुआ तो वह वेश बदलकर चुपके से देवताओं की पंक्ति में बैठ गया। मोहिनी के रूप में अमृत बांटते-बांटते भगवान विष्णु भी उस राक्षस को नहीं पहचान पाए और उसे भी अमृतपान करवा दिया।
मगर सूर्यदेव और चंद्रद्रेव ने तत्काल ही उस राक्षस को पहचान लिया और मोहिनी के रूप में अमृत बांट रहे भगवान विष्णु के सामने उसका भेद खोल दिया। राहु अभी इसे पूरी तरह सटक भी नहीं पाया था कि भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से उस राक्षस का सिर धड़ से अलग कर दिया। सिर कटते समय अमृत का प्रवाह गले से हो रहा था। इस प्रकार अमृत तीन हिस्सों में बट गया, उस अमृत का एक हिस्सा मुख में रह गया दूसरा हिस्सा जो पेट में चला गया और तीसरा हिस्सा बूंदों के रूप में रक्त और मजा के साथ भूमि पर गिर गया। जमीन पर गिरीं, अमृत की बूंदों से प्याज और लहसुन की उत्पत्ति हुई।
अमृत से पैदा होने के कारण प्याज और लहसुन रोगनाशक व जीवनदायिनी है। अगर यह राक्षस की रक्त के द्वारा सिंचित नहीं होती तो यह पवित्र होती परंतु राक्षसी रक्त से सिंचित होने के कारण इनमें राक्षसी गुणों जैसे उत्तेजना, क्रोध, हिंसा अशांति, पाप आदि का समावेश हो गया है। संतो न ऐसा महसूस किया है कि इन पदार्थों के सेवन करने से उत्तेजना, क्रोध, हिंसा अशांति व पाप में वृद्धि होती है। इसलिए संतजन तथा भक्तजन अपने सामान्य भोजन व व्रत के खाने में तथा भगवान के भोग में प्याज-लहसुन का प्रयोग नहीं करते। ले इसी कारण लहसुन और प्याज को तामसिक भोजन की संज्ञा दी गई है। इस वजह से लहसुन और प्याज को पूजा आदि में वर्जित किया गया है।
लहसुन और प्याज को तामसिक या राक्षसी भोजन माना गया है। कई असाध्य रोगों का रोगनाशक व जीवनदायिनी होने के बाद भी यह पाप बढ़ाता, बुद्धि को भ्रष्ट कर देता है इसलिए इसे भारत के संत जन और भक्तजन लोग प्रयोग में नहीं लाते।
लेकिन हमारा मानना है कि अन्य चीजों की तरह ही लहसुन और प्याज भी भूमि से उत्पन्न होती हैं। अतः इन्हें औषधि के रूप में उपयोग करना पड़े तो कर लेना चाहिए परन्तु इसे अपने दैनिक जीवन का हिस्सा नहीं बनाना चाहिए।
राधे राधे जय श्री कृष्णा।
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