नायनार_संत_कण्णप्प की भक्ति गाथा।

दक्षिण भारत में आंध्र प्रदेश के वर्तमान चित्तूर जिले के क्षेत्र में कभी भयानक महारण्य हुआ करता था। इसी जंगल में एक पहाड़ी थी और उसकी तलहटी में बहती थी   स्वर्णामुखी नदी जो वास्तव में पेन्नार नदी की शाखा मात्र थी। 

इस क्षेत्र में चरिष्णु आखेटक जाति निवास करती थी जिसकी उत्तर भारतीय शाखा को कालांतर में अपभ्रंश में #खटीक कहा जाने लगा। आखेट कर वनक्षेत्र के सीमांत पर लगने वाली दैनिक हाट में माँस व चर्म की आपूर्ति करना उनका व्यवसाय था। शिव को अपना आराध्य मानने वाली  खटीक जाति की इस शाखा के सरदार का नाम था #नाग और उसकी पत्नी का नाम था #तत्ता। नगरीय जीवन से असंपृक्त वन्य जीवन में वे और उनका कबीला पूरी तरह मस्त थे। उनके जीवन की एकमात्र कमी अगर थी तो यही थी कि उनके कोई संतान नहीं थी। 

अंततः बहुत दिनों के बाद उनके जीवन की यह इच्छा भी पूर्ण हुई और उन्हें एक पुत्र उत्पन्न हुआ। परंतु वह  सामान्य शिशुओं की तुलना में बहुत भारी था अतः उसका नाम रखा गया #तिण्ण अर्थात #भारी। 
  
सोलह वर्ष की आयु तक तिण्ण धनुष-बाण, भाला, तलवार आदि के संचालन में  निपुण हो गया। अपने कबीले की प्रथानुसार वह नियमित रूप से शिकार पर भी जाने लगा। इसी क्रम में वह एक दिन हमेशा की तरह आखेट को निकला। बहुत-से जानवर मारने के बाद उसने घने जंगल में एक सूअर का शिकार किया। वहीं उसके दो नौकर #नाड़ और #काड उससे आ मिले। उन्होंने सूअर को उठा लिया और बढ़ चले। रास्ते में उनको जोरों की भूख प्यास लगी।
तिण्ण ने पूछा- ‘यहाँ मीठा पानी कहाँ मिलेगा? तुम्हें कुछ पता है?’
नाड़ बोला- ‘उस विशाल शालवृक्ष के उस पार एक पहाड़ी है और उसी के नीचे सुवर्णामुखी नदी बहती है।’ तीनों चल पड़े। 

नदी के तट पर खड़े होकर उसने पहाड़ी की ओर देखा। 

बचपन से ही वह अपने माता पिता से सुनता आया था कि इस पहाड़ी पर उसके देवता निवास करते हैं और उसके बालमन ने कई बार इस पहाड़ी पर आकर देवता को देखना चाहा था पर कभी आ न सका था। पर आज संयोगवश स्वतः ही यहां आ पहुंचा था। 

उसके बालमन में दबी इच्छा प्रबल हो उठी और अंतश्चेतना के वशीभूत हो वह पहाड़ी पर चढ़ने लगा। उसे लग रहा था जैसे कोई उसे चुम्बकीय शक्ति से ऊपर खींच रहा है। उसके दोंनों मित्रों ने भी उसका अनुसरण किया। 

पर्वत पर दुःसाध्य चढ़ाई जैसे उसकी आत्मा का आरोहण बन गई। उसे ना भूख का अनुभव हो रहा था और ना प्यास का। वह स्वयं को वायु सा हल्का पा रहा था और एक आतुर प्रयत्न के साथ ऊपर चढ़ता जा रहा था। अन्ततः वह ऊपर पहुँचा और  ठगा सा रह गया। सामने था एक जीर्ण शीर्ण मंदिर और उसके खुले कपाट में से दर्शन देते महादेव शिव का विग्रह। वह उस पाषाण प्रतिमा में अपने देव को जीवंत रूप में देख पा रहा था। 

तिण्ण कुछ पल एकटक देखता रहा और फिर उसकी आँखों से आँसू बह निकले। वह दौड़ पड़ा और अपने महादेव से लिपट गया। 
    
  ‘ऐसे घोर वन में जंगली जन्तुओं के बीच तुम्हें डर नहीं लगता? किसने तुम्हें यहां अकेले छोड़ दिया है? कोई मित्र    भी तुम्हारे पास नहीं है।" 

उसका धनुष सरककर गिर गया और  तूणीर निकलकर गिर गया। वह विह्वल हो उठा। 

उसी विह्वल अवस्था में उसने भरी आंखों से देवता के श्रीविग्रह का अवलोकन किया। देवविग्रह के पर कुछ हरे पत्ते, जंगली फूल और शीतल जल देखकर वह पहले दुःखित और फिर क्रुद्ध हो गया - ‘किस नराधम ने मेरे स्वामी के सिर पर ये चीजें रखी हैं?"
    
नाड़ ने उत्तर दिया- ‘आपके  पिता के साथ मैं यहाँ बहुत बार आया हूँ। हमने एक ब्राह्मण को यह करते देखा था। उसने देवता के सिर पर ठंडा पानी डाल दिया और फूल-पत्तियाँ रख दीं। आज भी जरूर यह उसने ही किया होगा।"

"वह मूर्ख तुम्हें ये घास पत्ती अर्पित करता है। कैसे पेट भरता होगा तुम्हारा ? जाने कब से भूखे बैठे हो तुम?" वह स्वगत बुदबुदाया।

"तुम बस कुछ पल प्रतीक्षा कर लो, मैं तुम्हारे खाने के लिये कुछ लाता हूँ।" और वह बाहर की ओर चल पड़ा। 
    
 तिण्ण मन्दिर से रवाना हुआ, मगर तुरंत ही लौट आया। वह बार-बार जाने की कोशिश करता था, किंतु किसी अनजान आकर्षण से वशीभूत हो बार बार लौट आता। 
    
अंततः वह नीचे उतरा और उसने सूअर के मांसखंडों को भूना। साल के पत्तों में लपेटकर ऊपर जाने को उद्यत हुआ। उसके मित्र उसे विक्षिप्त मानकर निराश हो लौट गये। वे उसे  समझते भी कैसे क्योंकि जो विग्रह उनके लिये पाषाण का एक टुकड़ा था वह तिण्ण के लिये पूर्ण चैतन्य था जिसमें वह अपनी ही चेतना को देव रूप में देख रहा था।   

तिण्ण अपनी ही धुन में मग्न था। संसार उसके लिये तिरोहित हो चुका था। 

फिर सहसा उसे नाड़ द्वारा वर्णित उस ब्राह्मण की पूजन विधि याद हो आई और उसने पूजन की तैयारी शुरू की। 
-अपने बालों में उसने कुछ जंगली सुगन्धित फूल खोंसे,     -मुँह में नदी का ताजा पानी भर लिया क्योंकि उसके पास कोई बरतन नहीं था। 
-एक हाथ में उसने मांस लिया व दूसरे में अपना धनुष और दोपहर की उस कड़ी धूप में पहाड़ पर चढ़ने लगा। 

"मेरे देवता भूखे हैं।"उसकी चेतना में बस यही चार शब्द गूंज रहे थे और वह दौड़ने लगा। 

-जूते उतारने का उसके पास समय नहीं था। 
-हाथ खाली नहीं थे, सो पैरों से ही उस बुड्ढे की चढ़ाई फूल पत्तियाँ हटा दीं।
-मुंह से पिचकारी से धार बनाकर उसने देवता को प्रेम से स्नान कराया। 
-और फिर देवता के आगे चखकर सबसे अच्छे भुने मांस के टुकड़ों को रखकर खाने का आग्रह किया। 

 इस मनुहार के बीच अँधेरा हो आया। 

"यह समय तो जंगली जानवरों के घूमने का है। देवता को यहाँ अकेले छोड़कर मैं नहीं जा सकता।’' वह धनुष पर बाण चढ़ाकर वीरासन से बैठ गया। 

सबेरा होने पर जब चिड़ियाँ चहचहाने लगीं, तब वह उठा। 

"अच्छी नींद आई ना?" वह प्रफुल्लित था। 

"अच्छा आज तुम्हें मृग का सुस्वादु मांस खिलाऊँगा।" वह पहाड़ी से उतर गया। 
 
 ब्राह्मण पुजारी,  नियमानुसार प्रातःकाल मंदिर में आया। मन्दिर में जूतों की छाप तथा चारों ओर मांस छितराया देखकर वह बहुत ही घबरा गया,  ‘हे, भगवन्! अब मैं क्या करूँ? किसी जंगली शिकारी ने मन्दिर भ्रष्ट कर दिया है!"  लाचार उससे झाड़-बुहार कर साफ किया। मांस के टुकड़े कहीं पैरों से छू न जायँ, इसलिये उसे बड़ी कठिनता से इधर-उधर चलना पड़ता था। फिर वह नदी में स्नान करके लौटा और मन्दिर की सम्पूर्ण शुद्धि की। आँखों में आँसू भरकर देवता के आगे प्रणिपात किया और  वेद-ऋचाओं से परम परमात्मा की स्तुति की। पूजा समाप्त करके वह अपने आवास को लौट गया।
  इधर  तिण्ण ने एक हिरण का शिकार किया और पिछले दिन के समान चुनकर मांस पकाया  अच्छे-अच्छे टुकड़े अलग रख लिये। 

"आज देवता को और स्वादिष्ट भोजन कराऊंगा"

और उसने कई अच्छे ताजे मधु के छत्ते इकट्ठे किये, उनका मधु मांस में निचोड़ा। फिर वह मुँह में पानी भरकर, बालों में फूल खोंसकर, एक हाथ में मांस लिये हुए और दूसरे में धनुष-बाण लेकर पहाड़ पर दौड़ा।  

‘देवता! कल से आज का मांस स्वादिष्ट है।  उसमें मधु भी मिलाया है मैंने।" गर्व से तिण्ण ने देवता से कहा। 

इस तरह तिण्ण के पाँच दिन, दिनभर शिकार करके देवता के लिये मांस इकट्ठा करने और रातभर पहरा देने में बीते। उसे आप खाने-पीने की सुध ही न रही। तिण्ण के चले जाने के बाद प्रतिदिन पुजारी आता और रात के इस भ्रष्टाचार पर विलाप करता, मन्दिर धोकर साफ करता, नदी-स्नान करके शुद्धि करता और पूजा-पाठ करके अपने स्थान पर लौट जाता। इधर जब इतने दिनों तक तिण्ण नहीं लौटा, तब उसके सभी सम्बन्धी और मां-बाप निराश हो गये।
    ब्राह्मण पुजारी रोज ही हार्दिक प्रार्थना करता, '‘प्रभु! मेरे पाप क्षमा करो। ऐसा भ्रष्टाचार रोको।’' 

और तब एक रात स्वप्न में शिव  उनके सामने आये, "तुम मेरे इस प्रिय शिकारी भक्त को नहीं जानते। वह निरा शिकारी ही है पर पूर्ण प्रेममय है। वह मेरे सिवा और कुछ जानता ही नहीं। वह जो कुछ करता है, मुझको प्रसन्न करने के लिये ही। जब वह अपने जूते की नोक से मेरे सिर पर से सूखे फूल हटाता है, तब उसका स्पर्श मुझे कार्तिकेय के स्पर्श  से भी अधिक प्रिय लगता है। जब मुझ पर वह प्रेम और भक्ति से कुल्ला करता है, तब वह कुल्ले का पानी मुझे गंगाजल से भी अधिक पवित्र जान पड़ता है। वह अनपढ़  सच्चे स्वाभाविक प्रेम और भक्ति से जो फूल अपने बालों में निकालकर मुझ पर चढ़ाता है, वे मुझे नंदनवन के पारिजात पुष्पों से भी अधिक सुगंधित जान पड़ते हैं। और अपनी मातृभाषा में वह आनन्द और भक्ति से भरकर जो थोड़े से शब्द कहकर, मेरे सिवा सारी दुनिया का भान भूलकर मुझे प्रसाद पाने को कहता है, वे शब्द मेरे कानों में ऋषि-मुनियों के वैदिक स्तुतियों के शब्दों  से कहीं अधिक मीठे लगते हैं। यदि उसकी भक्ति का महत्त्व देखना हो तो कल आकर छिपकर खड़े हो जाना।"
    
इस स्वप्न के बाद पुजारी को रातभर नींद नहीं आयी। प्रातःकाल वह नियमानुसार मन्दिर में पहुँचा और पूजा-पाठ समाप्त करके एक स्तंभ  के पीछे जा छिपा। तिण्ण की पूजा का यह छठा दिन था। और दिनों से आज उसे कुछ देर हो गयी थी। क्योंकि रास्ते में उसे अपशकुन हुये थे और उनके अर्थों के अनुसार आज  कहीं खून गिरना था। 

"कहीं देवता को कुछ हुआ तो नहीं?" और वह दौड़ा।

इसकी आशंका सत्य सिद्ध हुई। देवता की एक आँख से खून बह रहा था। 

अपने अपशगुन को पूरा होते देखकर उसके शोक का पार न रहा। हाय! देवता को कितना कष्ट हो रहा था;  
तिण्ण यह दुःखद दृश्य नहीं देख सका। वह रोने, विलाप करने लगा। जमीन पर लोटने लगा। फिर उठा। उठकर भगवान् की आँख से खून पोंछ दिया, परन्तु तो भी खून का बहना रुका नहीं। वह फिर दुःखातुर होकर गिर पड़ा!
    
तिण्ण बिलकुल ही घबरा गया। उसका चित्त अत्यन्त दुःखी हो गया। वह समझता नहीं था कि क्या करना चाहिये। थोड़ी देर बाद वह उठा और तीर-धनुष लेकर उस आदमी या जानवर को मारने निकला, जिसने देवता की यह दुर्दशा की हो। परन्तु उसे कहीं कोई प्राणी नहीं दिखलायी पड़ा। वह लौट आया और विग्रह को छाती से लगा करके विलाप करने लगा।

 उसे कुछ जड़ी-बूटियों की याद आयी, जिन्हें उसकी जाति के लोग घावों पर लगाते थे। वह दौड़ा और जब लौटा तो जड़ी-बूटियों का एक गट्ठर लेकर। उन्हें उसने देवता की आँख में एक-एककर निचोड़ दिया, पर इससे कुछ लाभ नहीं हुआ। 

फिर उसे सहसा  शिकारियों की कहावत याद आयी,  ‘मांस का घाव मांस से ही अच्छा होता है।’ 

यह खयाल आते ही उसके मन में आनन्द की नयी उमंग खेलने लगी। उसने देर न की। एक तेज बाण की नोक से अपनी दाहिनी आँख निकाली और भगवान की आँख पर धीरे से धरकर उसे दबाया।

 खून का बहना रुक गया!
    
वह आनन्द से नाच उठा। उसकी असीम प्रसन्नतापूर्ण हँसी और आनन्दध्वनि से मन्दिर गूँज उठा।

 पर यह क्या? बाँयीं आँख से भी खून बहने लगा। 
 
पर तिण्ण इस बार निश्चिंत रहा। उसे पता था कि उसे क्या करना है। 

उसने देवता की बाँयीं आँख पर अपना बांयाँ पैर रखा  जिससे उसे पता चले कि कहाँ आँख लगनी है,  क्योंकि आँख निकालने के बाद उसे कुछ दिखाई नहीं देगा। 

उसने अब आँख के कोने में तीर की नोक लगायी। 

समस्त ब्रह्मांड उसके इस निश्छल और भीषण संकल्प पर कांप गया। देवाधिदेव प्रकट हुये और  तिण्ण का हाथ पकड़कर रोक लिया।  

‘'#ठहरो_मेरे_कण्णप्प!  #ठहर_जाओ।" 

कण्णप्प का हाथ पकड़कर उसे अपने पास खींच लिया और कहा, ‘ प्रेम की मूर्ति कण्णप्प! तुझे कुछ मैं दे सकूँ यह मेरी सामर्थ्य नहीं क्योंकि मैं स्वयं ही तेरे प्रेम में वशीभूत हो चुका हूँ। परन्तु फिर भी मेरे संतोष के लिये कुछ स्वीकार कर।" 

"मुझे सेवक के रूप में स्वीकार करें।" गद्गगद वाणी में तिण्ण बोला। 

प्रकाश का वर्तुल उठा और भक्त व भगवान एकरूप हो गये। 

पीछे बचे अश्रु बहाते वृद्ध पुजारी,  कण्णप्पेश्वर का पुनीत स्थल और दक्षिण भारत के 63 महान नयनार संतों में से एक #नायनार_संत_कण्णप्प की भक्ति गाथा।
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