त्रिदेवों की एक रूपता तथा सृष्टि क्रम
। 👾हर हर महादेव शम्भो काशी विश्वनाथ वन्दे ।।👾
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|||||| 👉त्रिदेवों की एक रूपता तथा सृष्टि क्रम--
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👉कल्प भेद से रुद्राष्टाध्यायी - नीललोहितरुद्रोपनिषद् - श्वेताश्वतरोपनिषद् - अथर्वशीर्षरुद्रोपनिषद् - शिवपुराण - लिङ्गपुराण - स्कन्दपुराण - शिवधर्मोत्तरपुराण - महाभारत तथा अनेक आगम ग्रन्थों में जिसे परम शिव कहा है ; उसी को नारायणोपिषद् - त्रिपादविभूतिमहानारायणोपनिषद् - महोपनिषद् - नृसिंहोपनिषद् - विष्णुपुराण - श्रीमद्भागवत्पुराण - विष्णुधर्मोत्तर तथा महाभारत आदि ग्रन्थों में "महाविष्णु" कहा गया है ।
👉उसी महाविष्णु को व्यास जी ने ब्रह्मवैवर्त पुराण में महाविराट् और विष्णु को (चतुर्भुजी रूप) क्षुद्र विराट् कहा है ।
👉उसी परम तत्त्व को अध्यात्म रामायण - महारामायण - अद्भुत रामायण - आनन्द रामायण - वाल्मीकीय रामायण तथा रामचरितमानस में राम कहा गया है ।
👉उसी परम तत्त्व को ब्रह्माण्ड पुराण तथा गर्ग संहिता आदि ग्रन्थों में गोलोकवासी श्रीकृष्ण कहा गया है ।
👉यह तत्त्व एक ही है, किन्तु तत्ववेत्ता एक ही तत्त्व के अनेक नाम - रूप तथा लीला में होने से अनेक रूपों में वर्णन करते हैं ~~ "एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति"
एक ही ब्रह्म को सद्ब्राह्मण बहुत प्रकार से वर्णन करते हैं ।
👉विष्णु शब्द "विश् प्रशेवने" धातु से बना है अर्थात् जो जगत् की सृष्टि करके उसके अणु-अणु में व्याप्त है, उसे विष्णु कहते हैं ।
👉उपनिषदों में आया है कि परमात्मा ने सृष्टि के आरम्भ में एक से अनेक होने का संकल्प किया ~~~
"एकोऽहं बहुस्यां प्रजायेय""""
"स: तपोऽतप्यत् स: तपस्तप्त्वा इदं सर्वमसृजत् यस्य ज्ञानमयं तप:, यदिदं, किञ्च तद् सृष्ट्वा तदेवानु प्राविशत्।"
👉उस सोपाधिक ब्रह्म ने सत्व प्रधान माया को अपने अधीन करके इच्छा की कि मैं एक से अनेक हो जाऊं ।
👉निराकार-निर्गुण शुद्ध ब्रह्म में इच्छा नहीं हो सकती, किन्तु उसने सद्-असद् से विलक्षण अनिर्वचनीय माया को अपने अधीन करके निष्काम होने पर भी सकाम के समान कार्य किया ।
"किसने इच्छा की ?"
इस शंका का समाधान करते हुए कहते हैं कि जिससे आकाशादि पंच-महाभूत उत्पन्न हुये हैं ।
" 👉एक से अनेक कैसे हुआ ?"
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इसपर कहते हैं---- जैसे जीव सोने से पूर्व जाग्रत अवस्था में एक होता है किंतु स्वप्न में अनेक हो जाता है ।
तब उसने ज्ञानमय तप किया, शरीर-इंद्रियों को तपाने वाला तप परमात्मा का तप नहीं ; किन्तु सृष्टि रचने से पूर्व पिछले कल्प के प्राणियों के शुभाशुभ मिश्रित कर्मों को ज्ञानरूप समाधि से प्रत्यक्ष किया कि किस प्राणी का पूर्व जन्म का कैसा कर्म है ।
नई सृष्टि रचने से पूर्व विचार किया कि किस प्राणी को मुझे देव - मनुष्य - तिर्यक् तथा स्थावर योनियों में जन्म देना है, यही परमात्मा का ज्ञानरूपी तप है ।
ऐसा तप करके उसने इन सब की रचना की और उसमें प्रवेश किया ।
ईश्वर ने जगत् में ऐसे प्रवेश नहीं किया जैसे हम एक कमरे से दूसरे कमरे में प्रवेश करते हैं, परन्तु जैसे कुम्हार मिट्टी का घड़ा बनाता है, घट की दीवारों की उपाधि से महाकाश घटाकाश में प्रवेश करता है ; इसी प्रकार उस सर्वव्यापी परमात्मा का सृष्टि में प्रवेश होता है ; क्योंकि ब्रह्म देश-काल-वस्तु तीनों परिच्छेद से रहित है ।
अणु-परमाणु में व्याप्त परम तत्त्व को ही विष्णु कहा गया है ।
जैसे आकाश उपाधि भेद से भिन्न होने पर भी उपाधि रहित होने पर एक ही रह जाता है , वैसे ही सर्वव्यापी विष्णु भी एक होने पर भी उपाधि भेद से अनेक प्रतीत होते हैं ।
उसी विष्णु को समष्टि - स्थूल - सूक्ष्म - कारण शरीरों की उपाधि से प्रागभिन्न चैतन्य कहते हैं अर्थात् समस्त जड़-चैतन्य पदार्थों के बाहर अखण्डमण्डलाकार चैतन्य को प्रागभिन्न चैतन्य कहते हैं , वही जब माया को अधीन करके अष्टभुजी महाविष्णु के रूप में अपनी सच्चिदानन्दस्वरूपा महालक्ष्मी के साथ महावैकुण्ठ में भक्तों को दिखाई देता है , वह कारण ब्रह्म कहा जाता है ।
👉कभी भक्तों की भावना के अनुरूप वैकुण्ठ में चतुर्भुजी विष्णु के रूप में , कभी लक्ष्मी के रूप में , कभी श्वेत द्वीप में , कभी क्षीर सागर में और कभी धरातल पर अपनी लीलाओं से मोहित करते हुए राम-कृष्ण आदि के रूप में अवतरित होता है ।
👉वही ब्रह्म जब जीव के अंतःकरण में पूर्व संस्कार , कर्म वासना एवं पूर्वप्रज्ञा के अधीन होकर जीव या चिदाभास के रूप में भासता है , उसे प्रत्यगभिन्न चैतन्य कहते हैं ।
👉जीव को प्रत्यक्-चैतन्य कहते हैं , क्योंकि ब्रह्मस्वरूप होने पर भी यह ईश्वर के प्रतिकूल स्वभाव वाला है ।
👉ब्रह्म के दो रूपों में निरूपाधिक ब्रह्म माया से रहित तथा सोपाधिक ब्रह्म माया-विशिष्ट है । यह रूप रहित होने पर भी रूपवान् जैसा दिखता है।
👉वही ब्रह्म काल की दृष्टि से नाना रूपों में अवतार लेते हैं ।
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