कार्तिक_मास_का_नक्षत्रज्ञान
#कार्तिक_मास_का_नक्षत्रज्ञान -
कार्तिक मास में कई महत्वपूर्ण तिथियां और उत्सव होते हैं। आप भी देखिये -
तुलसी विवाह उत्सव भी था अर्थात प्रकृति पूजा, प्रकृति प्रेम, प्रकृति रख रखाव का एक और उत्सव..
छठ पूजा: डूबते सूर्य की पूजा. जलाशय की साफ-सफाई.
आंवला नवमी: आंवले की पूजा. प्रकृति से जुड़ाव.
तुलसी विवाह(ग्यारस): प्रकृति पूजा.
मात्र 6 दिवस के भीतर तीन बार प्रकृति पूजा. प्रकृति प्रेम. पर्यावरण रख रखाव. प्रकृति सम्मान.
अब वामपंथी और "प्लास्टिक ट्री लगाकर उत्सव" बनाने वाले लिबरल्स हम सनातनियों को सिखाएंगे प्रकृति प्रेम, पर्यावरण प्रेम ??..
पहले खुद "प्लास्टिक ट्री" के बजाए दो पौधे लगाकर उत्सव बनाना सीखो..
✍🏻गुहा बेचैन...
अक्षय नवमी : एक युगारंभ तिथ्ाि
चार युग हैं और चारों ही युगों के आरंभ होने की तिथियां स्वीकारी गई हैं। त्रेतायुग के आरंभ होने की तिथि इसी को माना गया है :
कार्तिके शुक्लपक्षे तु त्रेयायां नवमेsहनि। (बृहद्दैवज्ञ रंजनम् 22, 29)
इसको अक्षय कहा गया है, वैशाख शुक्ला तीज भी अक्षय तृतीया के नाम से ख्यात है क्योंकि उस दिन कृतयुग की शुरूआत मानी गई है। मत्स्यपुराण में भी इस बात का संकेत है, हालांकि पुराणकार मनु आदि संवत्सरों के आरंभ होने की तिथियों पर अधिक विश्वस्त है लेकिन वसिष्ठ संहिता (12, 36) और नारदसंहिता में भी युगादि तिथियों की मान्यता निश्चित है और इन तिथियों में किए जाने वाले कार्यों की आेर संकेत किया गया है।
पूर्वकाल में इन तिथियों के निर्धारण के मूल में क्या प्रयोजन था, संभवत: यज्ञ कर्म ही रहा है। अन्य बातों के संबंध में ग्रंथ मौन ही अधिक साधे हैं। हां, इनको पुण्यप्रद मानकर इनके साथ दान करने की प्रवृत्तियों का लेखन अवश्य मध्यकाल से जुडा दिखाई देता है :
युगारंभे तु तिथयो युगाद्यास्तेन कीर्तिता:।
तासु दत्तं हुतं किंचित्सर्वं बहुफलं भवेत्।।
इसके 'अक्षय' होने के मूल में इनको मुहूर्त के रूप में स्वीकारा जाना था। यह मान्यता संभवत: उस समय से रही हो जबकि कृत्तिका से नक्षत्राें की गणना की जाती रही हो और तब देवसेनापति कार्तिकेय के प्रभाव का दौर रहा हो, इस मास में कार्तिकेय के साथ जुड़ी तिथ्ाियों में लाभ पंचमी से लेकर पूर्णिमा तक रही है... लेकिन यह तिथि शुभ कार्यों के आरंभ करने के लिए उपयुक्त रही है। बाद में देवोत्थान एकादशी को पुण्यदायी मानकर उस दिन से शुभ, मांगलिक कार्य करने की मान्यता का विकास हुआ हो, जैसा कि वैष्णव पुराणों का झुकाव रहा है...।
तुलसी विवाह का मुहूर्त बनी देवोत्थान एकादशी
कार्तिक शुक्ला एकादशी तुलसी के विवाह के दिवस के रूप में स्वीकार्य है। इसी दिन से मांगलिक कार्यों का श्रीगणेश माना जाता है। पद्मपुराण के प्रभाव के फलस्वरूप तुलसी का जो धाार्मिक महत्व समाज में स्थापित हुआ, तो यह तिथि 'तुलसी मंगल' के रूप में लोक में ख्यात हो गई। वैष्णव मंदिरों में इस दिन तुलसी विवाह होते हैं। कन्या धन का जो महत्व जानते हैं, वे इस दिन को इसलिए महत्व देते हैं कि यदि उनके आंगन में कन्या की किलकारी नहीं गूंजी तो वे तुलसी विवाह करके कन्या के दान काे पूरा करते हैं।
पद्मपुराण का कार्तिक माहात्म्य ही वह साक्ष्य है जो तुलसी के इस देश में आगमन और प्रभाव का परिचय देता है, हालांकि इसमें आयुर्वेदिक औषधि के रूप में इसका जिक्र नहीं है -
देवैस्त्वं निर्मिता पूर्वमर्चितासि मुनीश्वरै:।
नमो नमस्ते तुलसि पापं हर हरिप्रिये।।
(पद्म. कार्तिक. 6, 29)
पुराणकार के सम्मुख ये उहायें थी कि तुलसी आखिर कहां और कैसे उत्पन्न हई। पृथु के प्रश्न के रूप में यह चर्चा है जिस पर नारद उत्तर देते हैं और कथा कई अध्यायों में आगे बढ़ती है मगर मूल प्रश्न वहीं का वहीं रहता है, तुलसी का वृंदा के रूप में पौराणिकीकरण हो जाता है...। भारतीय संस्कृति की यही अदभुत विशेषता अलबिरूनी के भी उहामूलक रही कि यहां हर बात का जवाब पुराणकथा के रूप में क्याें है।"
तुलसी के लिए यह भी कहा गया है :
तुलसी श्रीर्महालक्ष्मीर्विद्याविद्या यशस्विनी
धर्म्या धर्मानना देवी देवीदेवमनः प्रिया।।
लभते सुतरां भक्तिमन्ते विष्णुपदं लभेत्
तुलसी भूर्महालक्ष्मीः पद्मिनी श्रीर्हरप्रिया।।
महाप्रसाद जननी, सर्व सौभाग्यवर्धिनी
आधि व्याधि हरा नित्यं, तुलसी त्वं नमोस्तुते।।
बहरहाल यह दिवस ज्योतिष के महत्व का था और आज भी उसी रूप में है किंतु एक मंगलोत्सव के तौर पर यह वनस्पति-विवाह का अनूठा अवसर बना हुआ है। बड़ा सच ये भी है कि यह पर्व वनस्पति और कृषि के साथ स्त्री समुदाय के सनातन संबंध को भी पुष्ट करता है, जो घर-घर में तुलसी रोपण और सींचन की प्रेरणा लिए है-
कार्तिकोद्यापने विष्णोस्तस्मात् पूजा विधीयते।
तुलसी मूलदेशे तु प्रीतिदा सा तत: स्मृता।।
तुलसी काननं राजन् गृहे यस्यावतिष्ठति।
तद्गृहं तीर्थरूपं तु नायान्ति यमकिंकरा:।।
(पद्म. कार्तिक. 18, 8-9)
.... यह पर्व हर अांगन में कन्या की किलकारी की आवश्यकता की प्रेरणा भी देता है।
घर - घर उठ गए देव
देव उठाना यानी कि गोवर्धन उठाना!
इसे देवोत्थान भी कहा जाता है।
इसको अबूझ मुहूर्त कहा गया है।
मंगल यहीं से शुरू होते हैं। क्यों?
कार्तिक की प्रतिपदा को गोबर धन से जो गिरि आकार का पिंड घर के द्वार पर बनाया गया था, उस सूखे पिंड को ग्यारस (एकादशी) पर उठाया और उस स्थान पर
गेहूं - जौ का स्वस्तिक बनाया गया।
क्यों, महिलाएं जानती हैं कि अब जो फसल होगी,
वह यव और गोधूम की होगी। फसल ही क्या,
लोकजीवन में फिर नई हलचल होगी।
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✍🏻डॉ श्रीकृष्ण जुगनू की पोस्टों से संग्रहित
हन्नी हन्ना उई आयें, कचपचिया गई दूर।
का सास हांड़ी ढगढोरू, कांछ-पोंछ गयें घूर।
(रात में बहुत देर हो गयी है। देर से उगने वाले तारे हन्नी हन्ना उग आये हैं और कचपचिया तारामण्डल बहुत ऊपर चढ़ चुका है। सास जी क्या मुझे देने के लिये हांड़ी टटोल रही हो। उसको तो कांछ-पोंछ कर मैं घूरे पर डाल आयी हों।) बहुत ही मार्मिक है सासों द्वारा पतोहू को सताये जाने और भोजन तक ठीक से न देने का दृश्य! :-(
चलो, ढ़ूंढ़ निकालो हन्नी-हन्ना-कचपचिया को!...
... अंग्रेजों ने प्राचीन भारत की तमाम सम्पदाओं और उपलब्धियों को ढूँढ़ निकाला। अंग्रेज/यूरोपीय विद्वानों और धर्मांतरण एजेंटों ने वह काम कर दिखाया जो सदियों से नहीं हुआ था। मैक्समूलर, कनिंघम, जेम्स प्रिंसेप, विलियम जोंस आदि में से कई ने तो अपार कष्ट झेलते हुये अपना जीवन तक होम कर दिया। इस अवधी कहावत में वर्णित तारों और नक्षत्रमंडलों की पहचान के लिये बाइबिल के अवधी अनुवाद से स्पष्ट और लगभग पूर्ण सूत्र मिल जाते हैं। हालाँकि स्वयं प्राचीन हिब्रू भाषा और उसमें वर्णित शब्दों की आधुनिक पहचान के लिये किये जा रहे कर्म अपने आप में वृहद शोध की सामग्री प्रस्तुत करते हैं जो बहुत ही रोचक है लेकिन अपनी आदत के विपरीत मैं अबकी अपने काम से काम रखूँगा J (फिलहाल)।
कचपचिया का वर्णन ओल्ड टेस्टामेंट के प्रकरण जॉब 9:9, अमोस 5:8, अय्यूब 38:31 में मिलता है। पुरानी हिब्रू भाषा में इस तारासमूह का नाम किमा: है। उल्लेखनीय है कि गुच्छे में दिखते इस समूह के लिये बहुवचन विसर्ग (:) का प्रयोग संस्कृत की तरह ही हुआ है। अंग्रेजी अनुवाद करते एक अनुवादक ने seven stars और बाकियों ने Pleiades यानि कृत्तिका (सप्तमातृका) का प्रयोग किया है। वास्तव में इस समूह में अनेकों तारे हैं जिनमें नौ तो थोड़े प्रयास के साथ पहचाने जा सकते हैं और छ:/सात तो एकदम साफ दिखते हैं। इन्हीं संख्याओं को लेकर सात बहनों या छ: मातृकाओं के मिथक गढ़े गये।
पुरानी हिब्रू के सात तारों को लेकर समस्या यह रही कि सप्तर्षि यानि Great Bear और व्याध यानि Hunter तारामंडलों में भी सात सात तारे ही होते हैं लेकिन अन्य सन्दर्भों से यह समस्या सुलझा ली गई। पहले के आलेख में मैं ऋचाओं के दर्शन के समय सप्तमातृका [या छ: कृत्तिकाओं सहित शिवपुत्र कार्तिकेय] के महत्त्व का संकेत दे चुका हूँ।
ईसा से लगभग 2300 वर्षों पहले वर्ष प्रारम्भ का संकेत देता महाविषुव कृत्तिका नक्षत्र के निकट था। नक्षत्र और तारे कृत्तिका की परिक्रमा करते थे। इस कारण उस समूह की सात ललनायें बहुत ही प्रिय थीं और उनकी प्रशंसा में ही ऋषि दीर्घतमा ने ऋचायें गढ़ीं। इस नक्षत्र को लेकर गढ़े गये मिथक पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ते रहे। गाँवों के स्वच्छ और शुद्ध अन्धकार वाले खुले आकाश में कृत्तिकायें बहुत ही सुन्दर और स्पष्ट दिखती थीं – सुन्दर स्त्रियों के समूह जैसी।
उनकी साम्यता किसी भोजपुरी ग्रामबाला ने अपनी झुलनी (नाक का आभूषण) से कर प्यारा सा नाम दिया – झुलनिया।
कृत्तिका शब्द कर्तन यानि काटे जाने वाले अस्त्र की साम्यता से आया है। आकाश में इसका आकार ऐसा ही दिखता है। भोजपुरी में कहते हैं – काटि देहलसि कच्च से! कदाचित ‘कचपचिया’ कृत्तिका और लोकवाणी में काटने की ध्वनि ‘कच्च’ से विकसित हुआ है। विचित्र ही है कि तमिल परम्परा में सात ऋषियों की पत्नियों की प्रतीक कर्तिगइ या वेदों की सात ललनाओं या कार्तिकेय की पालनहारी ममतामयी छ: कृत्तिकाओं की पहचान काट देने वाले यंत्र से की जाय! मिथक और कथायें ऐसे ही गड्डमगड्ड होती हैं।
अंतरिक्ष में कृत्तिका नक्षत्र वृषभ और मेष राशि के बीच में दिखता है।
कृत्तिकाओं का स्वामी देव अग्नि है। ध्यातव्य है कि शिव के तेज को पहले अग्नि ने धारण किया और उसके बाद कृत्तिकाओं ने उसे स्कन्द रूप में पाला पोषा, बड़ा किया। वही स्कन्द अन्धकार प्रतीक असुरों का नाश करने वाला कार्तिकेय हुआ। यह किसी खगोलीय घटना का संकेत है, ठीक वैसे ही जैसे एक खास दिन उगते सूर्य के ठीक पहले वहीं भोर में प्राची दिशा में क्षितिज पर चन्द्र दिखाई देता है। शिव उस सूर्य के प्रतीक हैं जो अपने मस्तक पर चन्द्र को धारण करता है। वह दिन एक पर्व होता है। आप बता सकते हैं कौन सा?
अब जब कि कचपचिया की पहचान कृत्तिका नक्षत्र या छ: कृत्तिकाओं या देहाती झुलनिया या सात बहनों या सप्तमातृकाओं से हो चुकी है तो पता करते हैं कि उस दुखियारी बहू ने या उससे सहानुभूति रखने वाले देवर ने कब उन दो पंक्तियों को रचा होगा?
गाँवों में शारीरिक श्रम जीवन लय को तय करता है। किसान और उनकी घरनियाँ दिन भर या तो बाहर खेत में खटती हैं या डाँड़ गोयँड़ें। दिन भर की थकी शरीर किसी विशेष अवसर के अतिरिक्त रातों में बहुत देर तक नहीं जग सकती। बिजली के प्रकाश की अनुपस्थिति में रातें अधिक करिखही यानि काली और जल्दी गहन हो जाने वाली होती हैं। मवेशियों का डिनर भी साँझ के झुटपुटे के आसपास ही सम्पन्न हो जाता है। उसके बाद बस भोजन कर सो जाना होता है। ऐसे में भोजन मिलने में यदि रात के आठ, नौ बज जायँ तो बहुत बड़ी बात हो जाती है। कुआर(आश्विन, लगभग अक्टूबर) माह से कचपचिया पूरब दिशा में साँझ की बेर अधिक हो जाने पर दिखती है और उसके बाद चढ़ती जाती है। ऐसा दिसम्बर यानि लगभग अगहन मास तक होता रहता है। पूस जाड़ तन थर थर काँपा की स्थिति में आकाश निहारने की सुध नहीं होती। वैसे भी रात में धुन्ध रहती है। कउड़ा (अलाव) के धुयें मारे ठंड के आसमान में लटके रह जाते हैं, तारे साफ नहीं दिखते।
गीत रचने वाली बहू कोठा अमारी में तो रहती नहीं! लेकिन पूरब या पूरब उत्तर के शुभ कोने की ओर मुखातिब अपने फुसौला घर से वृक्षों के ऊपर चढ़ आई कचपचिया को आसमान में देख सकती है। मानुख आँख की ऊँचाई देखने की स्वाभाविक पराश क्षैतिज के ऊपर नीचे मिला 100 अंश के आस पास होती है। उसके बाद देखने के लिये सिर ऊपर उठाना पड़ता है। ‘कचपचिया गई दूर’ तब कहा जायेगा जब कृत्तिका यानि कचपचिया क्षितिज से 50 अंश ऊपर हो।
कातिक या अगहन का महीना है। घर के सभी जन खा पी चुके हैं। रात के आठ नौ बजे बजे तक भी भोजन न मिलने पर कुछ नवेली सी दुल्हन रसोई के बर्तन निहारने गई है। उनमें कुछ न पा मारे क्रोध के छूटा जूठा पोंछ पाछ घूरे पर फेंक आई है। बुजुर्ग सास की पहली नींद टूटी है तो बहू को भोजन देने की सुध आई है लेकिन उसे पता है कि कुछ बचा नहीं, फिर भी रसोई में जा खटर पटर करती है तो बहू मारे झुँझलाहट में कहती है:
हन्नी हन्ना उई आयें, कचपचिया गई दूर।
का सास हांड़ी ढगढोरू, कांछ-पोंछ गयें घूर।
ऐसा संयोग बनता है आज कल के दिनांक 30 नवम्बर को रात में लगभग 8:30 बजे। अपने अपने गाँव के खा पी सुत्ता पर जाने के समय को देखते हुये आप इसे एकाध महीने इधर उधर कर सकते हैं।
देखिये, इस समय अवध क्षेत्र में लखनऊ के आस पास नभ में आकाशगंगा के किनारे कचपचिया की स्थिति। उसके नीचे हैं देवगुरु वृहस्पति। यह दृश्य आज कल भी आकाश में दिखता है। प्रकाश प्रदूषण के बाद भी कल मैं वृहस्पति से साक्षात हुआ। आप भी प्रयास कीजिये।
सप्तमातृकाओं के विपरीत आचरण करने वाली, भावी कृत्तिका के क्षुधा की आग को शांत न करने वाली सास और कचपचिया के दूर जाने के साथ हन्नी हन्ना के उग आने की त्रासदी भी है। हन्नी हन्ना कौन हैं?
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