धन्य है ऐसी माता और धन्य है एसा लाल।

🌹🌹बहुत ही ह्रदय स्पर्श करने वाला प्रसंग है🌹🌹

 यह प्रसंग उस समय का है जब प्रभु श्रीराम वनवास को जा रहे हैं, और ये समाचार लक्ष्मण जी को प्राप्त होता है, तो वह भी प्रभु श्रीराम से वनवास जाने हेतु आग्रह करते हैं। प्रभु श्रीराम नाना प्रकार से लक्ष्मण जी को समझाते हैं, लेकिन लक्ष्मण जी बहुत जिद करते हैं, प्रभु श्री राम के साथ चलने को प्रस्तुत श्री लक्ष्मण को अवध में ही रुकने के लिए समझाने पर जब प्रभु के तर्क काम नहीं आते, तो वे एक अनोखा खेल करते हुए लक्ष्मण जी से कहते हैं -

मागहुं बिदा मातु सन जाई। आवहु बेगि चलहु बन भाई॥
मुदित भए सुनि रघुबर बानी। भयउ लाभ बड़ गइ बड़ि हानी॥

प्रभु श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा हे भाई! जाकर माता से विदा माँग आओ और जल्दी वन को चलो! रघुकुल में श्रेष्ठ श्री रामजी की वाणी सुनकर लक्ष्मण जी आनंदित हो गए। बड़ी हानि दूर हो गई और बड़ा लाभ हुआ!॥

जाकर माता से विदा मांग आओ। जरा शब्दों को देखिए, प्रभु यह नहीं कहते कि जाकर माता से आज्ञा मांग लो। वे जानते थे कि लक्ष्मण फिर से नाहीं कर देंगे। आज्ञा माँगना और विदा माँगना इन दोनों में अन्तर है। आज्ञा माँगने में बंधन है, पर विदाई में मात्र शिष्टाचार की पूर्ति है। यदि आज्ञा ही लेनी होती, तो श्री लक्ष्मण को प्रभु माता के पास क्यों भेजते, तब तो पिता के पास भेजते, क्योंकि पिता राजा हैं और राजा से आज्ञा मांगना ही समीचीन होता। पर प्रभु तो खेल कर रहे हैं।

वह सोचते हैं कि लक्ष्मण सब कुछ त्याग कर मेरे साथ चल रहा है, वह एक बार सुमित्रा माता से मिल तो ले।

प्रभु कभी-कभी दो भक्तों को मिलाकर अनोखा रस लेते हैं। मिलाने का उद्देश्य यह होता है कि दोनों भक्त मिलकर एक दूसरे के से कुछ ले लें, कुछ पा लें, जिससे किसी के मन में यह भावना भूल से भी न उत्पन्न हो कि मेरी भक्ति और मेरा ज्ञान अनूठा है।

सुमित्रा माता और लक्ष्मण का मिलन इसी भूमिका को प्रस्तुत करता है।      
 
तो, अयोध्या में जब श्री लक्ष्मण भी प्रभु के साथ वन जाने का आग्रह करते हैं तो प्रभु सोचते हैं कि जाने के पहले जरा लक्ष्मण को सुमित्रा माता से मिला दें। और जब माता और पुत्र मिलते हैं, तो यह कहना कठिन हो जाता है कि महान कौन है। जब विदा लेने के लिए लक्ष्मण सुमित्रा माता के पास पहुंच कर उन्हें प्रणाम करते हैं, तो वे पूछती हैं -- बेटा, तुम्हारी आँखों में आँसू कैसे ? तब तक उन्हें श्री राम के वनगमन का समाचार नहीं प्राप्त हुआ था।

लक्ष्मणजी उन्हें वह समाचार सुनाते हैं। माँ व्याकुल हो जाती हैं, उनकी आँखों में आँसू भर जाते हैं। जब लक्ष्मणजी माता की आँखों में आँसू देखते हैं, तो उन्हें शंका होती है -- एहि सनेह बस करब अकाजू।*

कहीं माता स्नेहवश काम ना बिगाड़ दें। उन्हें लगता है कि मैं विदा लेने आया हूँ इसलिए माता ममता के वश हो आँसू बहा रही हैं। वे डरते हैं कि माँ शायद अब कहेगी कि बेटा शत्रुघ्न तो घर में है नहीं, अब यदि तुम भी चले जाओगे, तो मैं किसके आसरे रहूँगी ?

 लेकिन जब लक्ष्मणजी सुमित्रा अम्बा का कथन सुनते हैं तो उन्हें लगता है कि शायद प्रभु ने विदा लेने नहीं, शिक्षा लेने भेजा है। सुमित्रा अम्बा कहती हैं -- लक्ष्मण, तुम वैदेही के पुत्र होकर भी देह को माता समझते हो ? तुम्हें तो देह से ऊपर उठ जाना चाहिए था --

#तात_तुम्हारि_मातु_वैदेही। 
#पिता_रामु_सब_भांति_स्नेही।।

-बेटा, जान लो, जानकी तुम्हारी माता हैं और सब प्रकार से स्नेह करने वाले राम तुम्हारे पिता हैं। यदि राम ने माता से विदा मांग आने को कहा, तो तुम्हें सीता के चरणों में गिरकर विदा मांग लेनी थी। यदि तुम ऐसा करते, तो मैं समझती कि तुमने ठीक किया है। तुम कहते हो कि वन जा रहे हो। पर तुम वन कहाँ जा रहे हो ? तुम तो अयोध्या जा रहे हो। वन तो यह होने जा रहा है, क्योंकि - 
 
#अयोध्या_वहीं_है_जहाँ_राम_हैं --

#अवध_तहाँ_जहँ_रामनिवासू।
#तहंइं_दिवसु_जहँ_भानु_प्रकासू।

तुम कहते हो कि तुम गुरु, पिता, माता किसी को नहीं मानते। तुम्हें तो राम से यह कहना चाहिए था कि तुम्हीं मेरे गुरु, पिता, माता हो और गुरु, पिता, माता की सेवा प्राण के समान करनी चाहिए इसलिए मुझे वन साथ ले चलो --

गुर पितु मातु बंधु सुर साईं। सेइअहिं सकल प्रान की नाईं।

-- फिर राम के साथ जाने में तुम्हें क्या दुःख ? तुम तो अपने माता-पिता के साथ घूमने जा रहे हो। वास्तव में त्याग तो राम कर रहे हैं, जो तुम्हारे लिए राज्य, माता-पिता, सबकुछ छोड़कर वन जा रहे हैं --

तुम्ह कहुं बन सब भांति सुपासू। 
संग पितु मातु रामु सिय जासू।।

तुम्हें वन में सब प्रकार से आराम रहेगा। तुम ऐसा मत सोचना कि मैं तुम्हारी माता हूँ, तुम्हारी माता तो सीता हैं। यदि राम के चरणों के पास बैठकर तुम सोचने लगे कि मेरी माता तो अयोध्या में है, तो तुम्हारा शरीर भले ही राम के पास रहे, पर तुम्हारा मन मेरे पास अयोध्या आ जाएगा। इसलिए बिल्कुल भूल जाओ कि मैं तुम्हारी माता हूँ। पर मैं याद रखूंगी तुम मेरे बेटे हो, मैं अपने आपको तुम्हारी माँ मानूँगी, क्योंकि --

पुत्रवती  जुबती  जग  सोई। 
रघुपति भगतु जासु सुतु होई।।
नतरु बांझ भलि बादि बिआनी। 
राम बिमुख सुत तें हित जानी।।

-- संसार में वही युवती स्त्री पुत्रवती है, जिसका पुत्र रघुनाथ का भक्त हो। नहीं तो जो राम से विमुख पुत्र से अपना हित जानती है, वह तो बांझ ही अच्छी। पशु की भांति उसका ब्याना व्यर्थ ही है। फिर, जब तुम राम के चरणों में रहोगे, तो तुम्हारे नाम के साथ मेरा नाम भी राम के चरणों में रहेगा -- सुमित्रा का पुत्र राम के चरणों में रहने से मेरा भी रहना हो ही जायगा।

माता सुमित्रा लक्ष्मण से एक और मीठी बात कहती हैं। जब सीता तुम्हारी माता हैं, तो मेरा फिर क्या स्थान है ? मेरा स्थान वही है, जो दूध के सन्दर्भ में पात्र का होता है।

भगवान् को जब दूध का भोग लगाया जाता है, तब किसी पात्र में उसे रखकर ही ऐसा किया जाता है। बिना पात्र का स्पर्श किए व्यक्ति दूध नहीं पी सकता। तो सुमित्रा माता अपने को वही पात्र मानती हैं --

भूरि भाग भाजनु भयहु मोहि समेत बलि जाउं।
जौं तुम्हरें मन छाड़ि छलु कीन्ह राम पद ठाउं।।

मैं बलिहारी जाती हूँ, मेरे समेत तुम बड़े ही सौभाग्य के पात्र हुए, जो तुम्हारे चित्त ने छल छोड़कर राम के चरणों में स्थान प्राप्त किया है।

और लक्ष्मणजी माँ का उत्तर सुनकर समझ गए कि प्रभु ने मुझे माता के पास क्यों भेजा था। उन्होंने कहा माँ, मैं तुम्हारी पात्रता से धन्य हो गया। यदि दूध अच्छा हो और पात्र ठीक ना हो, तो दूध फट जाता है। तुम्हारी पात्रता ने मुझे कृतार्थ कर दिया है।

धन्य है ऐसी माता और धन्य है एसा लाल।।


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