लोकमाता देवी श्री अहिल्याबाई होल्कर
लोकमाता देवी श्री अहिल्याबाई होल्कर
(गडरिया समाज) जन्म 31 मई 1725 ई-निर्वाण 15 अगस्त 1795 ई.
प्रातः स्मरणिया लोकमाता देवी श्री अहिल्याबाई होल्कर का जन्म 31 मई 1725 ई. को नहर के औरंगाबाद जिले के चौड़ी गांव के पटेल (चौधरी) मणकोजी शिन्दै धनगर (गड़रिया) के घर हुआ था। उनकी माता का नाम सुशीलाबाई था। उनके पिता एक धर्मपरायण व्यक्ति थे ।
देवी श्री अहिल्याबाई का विवाह इन्दौर के धनगर मराठेशाही होल्कर राजवंश के श्रीमंत महाराज मल्हारराव होल्कर के एकमात्र पुत्र युवराज खण्डेराव होल्कर के साथ सन् 1735 ई. को हुआ।
होल्करों के पूर्वज गोकुल (मथुरा) के रहने वाले थे। जाति धनगर (गड़रिया) थी। मल्हारराव होल्कर ने 52 युद्धों में विजय प्राप्त कर मराठों का मस्तक ऊँचा किया।
17 मार्च 1754 को भरतपुर के राजा सूरजमल जाट से हुए युद्ध में युवराज खण्डेराव होल्कर का कुम्हेर में देहान्त हुआ।
20 मई 1786 के को ससुर श्रीमंत मल्हारराव होल्कर के देहान्त के पश्चात राज्य की सारी बागडोर देवी श्री अहिल्याबाई होल्कर के हाथों में आ गई।
उन्होंने राज्य सिंहासन पर तुलसीदल, रखकर राज्य भगवान शिव के चरणों में अर्पित कर दिया और शिव की सेविका बनकर उनके आदेश से शासन चलाने लगीं।
उन्होंने अपने राज्य की जनता की घोर, डाकुओं से मुक्ति दिलाई।
उन्होंने अपनी योग्यता व बुद्धिमत्ता से कई बार युद्धों को टाला भी और उन्होंने 1771, 1783 व 1787 ई में विद्रोहियों को पराजित भी किया।
उसके पास स्त्रियों की सेना भी थी। वे अनेक रियासतों जयपुर, उदयपुर, चितौड, कोटा, बंदी इत्यादि से कर बसूला करती थीं।
उनके खजाने में 18 करोड़ रुपये थे। उन्होंने सारा धन जन कल्याणकारी कार्यों में खर्च किया। उन्होंने लोगों को आर्थिक सहायता दी। खेतीवाड़ी, उद्योग धन्दे दिये। अनेकों को राजकीय सेवाओं में रखा। उनके राज्य में लूटपाट बन्द हो गई और लोग निर्भय होकर विचरने लगे तथा चारों और शान्ति का माहौल हो गया।
उन्होंने हजारों कुँओ, बावड़ियों, धर्मशालाओं व मंदिरों का निर्माण व जीर्णोद्वार करवाया। उनमें से हरिद्वार, केदारनाथ, बद्रीनाथ, मथुरा, पुष्कर, सोमनाथ, गया, अमरकंटक, चित्रकूट उज्जैन, काशी, प्रभाग, अयोध्या, शुक्रताल, इन्दौर व महेश्वर इत्यादि हैं।
वे शिवरात्रि पर गंगा जल बटवातीं, पक्षियों, पशुओं, चिटियों, मछलियों के लिए चारा, दाना का प्रबंध करती थे। अपनी जनतों की खुशहाली के लिए प्रतिदिन कोटिलिंगार्चन करवाती थी और हजारों बाह्मणों व गरीबों को भोजन करवाती थी। इसीलिए एक कहावत मशहूर है
"मालव धरती गहन गंभीर
मग मग रोटी पग पग नीर"
उनका युग मालवा का सत्युग कहलाता था। उत्तके राज्य की सीमाएँ हिन्दु धर्म की चौकियाँ कहलाती थीं। हजारों जनकल्याणकारी प्रजाहित धार्मिक कार्य करने के कारण वह एक महारानी से देवी हो गई और लोगों द्वारा उन्हे श्रद्धा में लोकमाता, प्रांतः स्मर्णिया गंगा जल निर्मल मातेश्वरी, माँ आहिव, मातुश्री, देवीश्री इत्यादि देवत्वं उपाधियों से अलंकृत किया गया।
29 वर्ष कुशल शासन करके 70 वर्ष की आयु में महेश्वर के किले में शिव चरणों में समाधी लगाकर 13 अगस्त 1795 ई. को देवी अहिल्याबाई होल्कर का नश्वर शरीर ब्रह्मशक्ति में लीन हो गया ।
होल्कर राजवंश के चौदहें शासकों ने इतिहास में विशेष स्थान प्राप्त किया और 220 वर्षों तक राज्य करके 16 जून 1948 को आजाद भारत में सम्मिलित कर दिया ।
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