योगप्रश्न संग्रह
योगप्रश्न संग्रह
विस्तार
Hatory
1 आचार्य हरिभद्र ने समिति और गुप्ति के साधारण धर्म ब्यापार को योग कहा है।
2 सिन्धु सभ्यता की खोज दयाराम सहानी ने की है।
3 सिन्धु सभ्यता में मंदिर के साक्ष्य नहीं मिले है।
4 सिन्धु सभ्यता का काल माना जाता है 3300 से 1300 ई० पूर्व।
5 'द पावर आफ नाऊ' पुस्तक के लेखक एक्हार्ट डाले है।
6 मैक्स मूलर रामकृष्ण परमहंस से बहुत अधिक प्रभावित है।
7 मैक्स मूलर का जन्म जर्मनी में हुआ था।
8 मैक्स मूलर की रचनाएं निम्न है- द सिक्स सिस्टम आफ हिन्दु फिलॉसफी, हिस्ट्री ऑफ एन्सेयन्ट संस्कृत लिटरेचर, इन्द्राडेक्सन टू द साईस ऑ रिलीजियन।
9 मैक्स मूलर को संसकृत भाषा का ज्ञान था, उसत्ते ऋग्वेद और उपनिषद का अनुवाद किया एवं उसने ब्रम्हा नामक कविता लिखी।
10 आचेर शोपेनहॉवर उपनिशदों, बौध दर्शन एवं प्लटो से प्रभावित थे।
11 आधेर शोपेनहॉवर ने मानव जीवन में इच्छाओं के दमन पर बल दिया।
12 श्री टी० कृष्णमाचार्य का जन्म कार्नाटका में हुआ था।
13 श्री टी० कृष्णमाचार्य का रचनाएं निम्न है- यौग मकरन्द, योगान्जलीशरम, योगरहस्य।
14 श्री टी० कृष्णमाचार्य का संबंध मुख्य रूप से हठ योग से है।
15 श्री टी० कृष्णमाचार्य एक आयुर्वेदिक चिकित्सक और योगी थे।
16 श्री टी० कृष्णमाचार्य ने पतंजली योगसूत्र और यज्ञवल्पक का अनुसरण किया।
17 श्री टी० कृष्णमाचार्य वैष्णव वाद के सर्मयक थे।
18 श्री टी० कृष्णमाचार्य ने कृष्णराज वडियार ४ के राज्य में योग अध्यापक के रूप में कार्य किया।
19 श्री टी० कृष्णमाचार्य के टी०के०वी० देसी काचर, के० पट्टामी जोइस और बी० के० एस० आयंगर शिष्य थे।
20 स्वामी शिवानन्द ने 'डिवाइन लाइफ सोसायटी' आश्रम की स्थापना की।
21 स्वामी शिवानन्द के गुरू स्वामी विश्वानंद थे।
22 स्वामी शिवानन्द चिकित्सक, योगी और लेखक थे।
23 स्वामी शिवानन्द के स्वामी चिन्मयानन्द, स्वामी ओमकारानन्द और स्वामी ज्यातिवमाया नन्द शिष्य थे।
24 स्वामी शिवानन्द सरस्वती स्वामी विश्वानन्द सरस्वती के शिष्य थे और इन्होंने अपना अधिकांश जीवन ऋषिकेश में व्यतीत किया और प्रायोगिक यो आवश्यकता पर बल दिया।
25 स्वामी राम हिमालयन इन्सटीट्यूट आफैं योगा साइंस एण्ड फिलासाफी के संस्थापक है।
26 स्वामी राम का जन्म सन 1625 को पौडी गढ़वाल में हुआ था।
27 परमहंस योगानन्द की आत्मकथा है 'आटोवायोग्राफी आफै द योगी'
28 श्री अरनिन्द ने सम्पुर्ण योग का प्रचार किया।
29 रिखियापीठ झारखण्ड में स्थित है।
30 स्वामी सत्यानन्द ने रिखियापीठ की स्थापना की।
31 नादानुसंधान का वर्णन हठ प्रदीपिका, हठ रत्नावली और नादविन्दु उपनिषद् में मिलता है।
32 श्री अरविन्द आश्रम पांडिचेरी में स्थित है।
33 श्री अरविन्द योगी, लेखक और कान्तिकारी थे।
34 श्री अरविन्द की आध्यात्मिक सहयोगी मीरा अल्फासा थी।
35 योग इतिहास एवं विकास की सबसे महत्वपूर्ण अवधि 500 से 800 ई० पूर्व है।
36 अभिलेखों का अध्ययन करना इपिग्राफी कहलाता है।
37 योग के पहले गुरू शिव माने जाते है।,
38 आचार्य सुभचन्द्रद्वारा रचित जैन ग्रन्थ 'ज्ञानावर्ण' में आसन, प्राणयाम और ध्यान आदि योगअंग का उल्लेख किया गया है।
39 राजा भृतहरि गौरक्षनाथ के शिष्य थे।
40 नगेश भट्ट योगसूत्र वृत्ति के रचयिता है।
41 अधिकांश मूर्तियों में महावीर स्वामी सुखासन की स्थिति में बैठे दिखाई देते है।
42 विशुद्धिमार्ग के तीसरे भाग में विपश्यना के अभ्यास का वर्णन मिलता है।
43 विशुद्धिमार्ग के रचयिता बुद्धघोष है।
44 'योग एण्ड इंडियन फिलॉसफी' योगी एडं द मिस्टिक, पापुलर डियज्ञनरी आफै हिन्दूइजम, लय डिवाइन के लेखक कार्ल येर्नर है।
45 बृहदारण्याकोपनिषद में प्राणयाम के अभ्यास का वर्णन किया गया है।
46 'टेन्सेन्डेन्टल मेडिटेशन' के प्रणेता महर्षि महेष योगी है।
47 महर्षि महेप योगी का जन्म जबलपुर में हुआ था।
48 महर्षि महेष योगी ने सन 1642 में अलहाबाद विश्वविद्यालय से भौतिक शास्त्र की डिग्री प्राप्त की।
49 महर्षि महेष योगी अद्भवैतवेदांत के सर्मथक थे, उन्होने सन् 1668 में महर्षि मुक्त विश्वविधालय की स्थापना की और सन् 2008 में नीदरलैण्ड में इनका देहान्त हुआ।
50. महर्षि महेप योगी के गुरू स्वामी ब्रम्हानन्द थे।
51. महर्षि रमन का जन्म सन् 1814 में तिरूचुली तमिलनाडु में हुआ था।
52. पशुपत्ति मोहर सिन्धु घाटी सभ्यता के मोहनजोदड़ो नामक स्थान से प्राप्त हुई है।
53. सिन्धु घाटी सभ्यता की खोज १६२१-२२ में हुई।
54. सिन्धु घाटी सभ्यता का संबंय कास्य युग से है।
56. सिन्धु घाटी सभ्यता के हडप्पा नामक स्थल से नटराज की आकृति प्राप्त हुई है।
57. सिन्धु घाटी सभ्यता के लोग मातृदेवी के उपासक थे।
58. सिन्धु घाटी सभ्यता का दक्षिणतम छोर दाईमाबाद है।
59. सिन्धु घाटी सभ्यता की त्रिकोणीय आकृति थी।
60. परमहंस योगानन्द ने लॉस एंजेल्स में 'सेल्फ रियलाइजेशन फेलोशिप' की स्थापना की।
60. महर्षि वेदव्यास के अनुसार मोक्ष शास्त्रों का अध्ययन, प्रणव जप, चिन्तन, मनन स्वाध्याय है।
61. 'प्रतिम में संयम करने से योगी को सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त होता है।
62. नाभी चक का ध्यान करने से सायक को सम्पूर्ण शरीर समुदाय का ज्ञान प्राप्त होता है।
63. निम्न अन्ध आचार्य हरिभद्र द्वारा रचित है-योग बिन्दू, योग दृष्टि, योग शतक
64. उदान वायु की सिद्धि की प्राप्ती होने पर साधक का प्राणमय कौशपर अधिपत्य बना रहता है और वह इच्छा मृत्यु को प्राप्त कर सकता है।
65. 'सांख्य योगो पृथगबाला प्रक्दन्ति न पंडिताः। पक्ति का अर्थ है- साख्य और योग दोनों एक ही है, दोनों को अलग-अलग मानना विद्वता नहीं है।
67. उबैग सिद्धान्त का संबंध साख्य दर्शन से है।
68. उबैग सिद्धान्त के अनुसार सब भावों का मूल कारण सत्व, रजस और तमस गुण है।
69. रावण वध से पहले भगवान श्री राम ने सूर्य ममरकार योग किया की थी
70. नारद भक्ति सूत्र के अनुसार भक्ति के लक्षण है इच्छा फामना आदि का त्याग करना, सभी कर्म ईश्वर को समर्पित कर देना, अन्नाश्रय का त्याग, ईश्वर के प्रति गहरा प्रेम।
71. कुटनम के अनुसार चेतना एक मानसीक प्रक्रिया है
72. शर्कराचार्य के अनुसार चेतना और आत्मा में कोई भेद नहीं है
73. महर्षि कपिल के अनुसार ईश्वर और अविधा, इन दो प्रेरक शक्तियों के बल पर चेतना को विकास होता है
74. डा० फाले के अनुसार चंतना सृष्टि की सबसे अद्भुद बस्तु है
75. मजमुउल बहरैन ने वेदान्त के विषयों का वर्णन किया है
76. शाहजहा के पुत्र दाराशिकोह मैं उपनिशदों का फारसी में अनुवाद करवाया
77. नचिकेता उदद्दालक ऋषि के पुत्र थे
78. अवचेतन को जब हम जान लेते है तो वह चेतन हो जाता है-ऐडलर
79. महर्षि याज्ञवल्क के ने सन्यास ग्रहण करने के पहले मैत्रेयी को अमृतत्व का उपदेश दिया
80. वैशेषिक दर्शन में कुल ३७० सुत्रों का उल्लख मिलता है
81. वैशेषिक दर्शन में कुल ६ पदार्थों की संख्या है
82. टी० एस० इलिआट कवि उपनिषदों से बहुत अधिक प्रभावित हुआ
83. शरीर की सुपुप्ति अवस्था में चेतना की सुक्ष्म मात्रा मीजुद होती है
84. अवचेतन को जब हम जान लेते है तो वह चेतन हो जाता है-ऐडलर
85. अवचेतन को जब हम जान लेते है तो यह चेतन हो जाता है-ऐडलर
86. योग के साथक तत्थों का उल्लेख भगवद्गीता के छठवें अध्याय में किया गया है।
87. भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय में मानव शरीर पर त्रिगुणों के प्रभाव का वर्णन किया गया है।
88. 'शुची देशे प्रतिष्ठाय स्थिरभासनमात्मनः 'में शुची देशे, का अर्थ है पविल स्थान यह पक्ति गीता में निहित है।
89. 'यशो दान तपश्येव पावनानि मनीपिणाम' पक्ति का अर्थ है यश, दान एवं तप बुद्धिमान मनुष्यो को पावन करने वाले है। यह पक्ति गीता में निहित है।
90. 'दंवर्षीणाम्यधनादरः पक्ति का उल्लेख श्रीमद्भगवङ्गीता के 10 वें अध्याय में है।
91. प्रस्थानत्रयी भगवदगीता, उपनिषद, ब्रम्हसुत्र तीन ग्रन्थो से मिलकर बना है
92. भागवत पुराण में भक्ति योग का वर्णन किया गया है
93. रामायण के रचयिता बाल्मिकी है।
94. महाभारत में निरोधयोग का उल्लेख मिलता है।
95. भागवत गीता के पाचवें अध्याय में निष्काम कर्मयोग को वर्णन किया गया है
96. भागवत गीता के अनुसार 'यह विषी जिससे दुखों से पुर्ण छुटकारा मिल जाए उसे प्राप्त करना ही योग कहलाता है
Jain and Bodh Darsan
97. जैन दर्शन का आध्यात्मिक विचार सांख्य दर्शन से प्रभावित है।
98. जैन दर्शन में मोक्ष प्राप्ति के लिए सम्यक् ज्ञान, सम्यक् चरित्र और सम्यक् दर्शन को महत्वपूर्ण माना गया है।
99. जैन दर्शन के श्रीरत्न है-सम्पकू दर्शन, सम्यक् ज्ञान, सम्यक् आवरण
100. जैन विद्वानों ने प्राणायाम को साधना मार्ग में आवश्यक नहीं माना है।
101. जैन आगम ग्रन्थो में मोक्ष प्राप्ती के लिए शुक्ल ध्यान को सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना गया है।
102. जैन आगम ग्रन्धो में योग के लिए सबसे अधिक संवर शब्द का प्रयोग हुआ है।
103. जैन ग्रन्थ समाधितंत्र एवं इष्टापदेश के रचयिता आचार्य पूज्यपाद है।
104. विपरीत अभिनिवेश का त्याग करणे, जैम-कथित तत्वों में जो अभिनिवेश को लगाता है, उसपर निज भाव योग कहलाता है। योग की यह परिभाषा आचार्य कुन्दकुन्द ने दी है।
105. जग्म ग्रहण करने से उत्पन्न क्लेशों गरे दूर करना ही योग है। यह कथन आचार्य शुभचन्द्र का है।
106. जैन आचार्य शुभचन्द्र ने थीरआसन, कजासन, भदआसन, क्योत्सर्गासन, पर्यकासन, दण्डासन, गोदौहिकासन, कमलासन, उत्कटाएन।
107. जैन दर्शन में प्राणायाम का विस्तृत विवेचन आचार्य शुभचन्द्र और आचार्य हेमचन्द्र के द्वारा किया गया है।
108. जैन दर्शन के अनुसार प्राणायामक के अभ्यास से वित्त स्थिर होता है, अविद्या का नाश होता है
109. जैन दर्शन में शुद्धोपयोग समाधि को कहा गया है।
110. निर्जरा प्राप्ती के लिए जैन दर्शन में तप को सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना गया है।
111. आचार्य हरिभद्र ने वृति संशय को 'असम्प्रज्ञात समायि' कहा है।
112. जैन दर्शन के अनुसार चित्त की अवस्था है विक्षिप्त, सलिष्ठ, यातायात, सुलीन।
113. जैन ग्रन्थों में योग की निम्न परिभाषा का उल्लेया मिलता है-'मुक्यखेन जोयणाओं जागों' 'यतः समितिगुप्तिनां प्रपंचो योंग उत्तमः' 'समिति गुप्तियारणां धर्मव्यापार त्वमेव योगत्यर्म'
114. जैन दर्शन में महावतों यम की संख्या ५ है।
115. क्योत्सर्ग ध्यान विधि का संबंध जैन धर्म से है।
116. क्योत्सर्ग एक ध्यान विधि है।
117. क्योत्सर्ग में 'ओत्सर्ग' का अर्थ त्यागना है।
118. क्योत्सर्ग मुद्रा में खड़े व्यक्ति की मोहर सिन्धु घाटी सभ्यता के मौहनजोदड़ो नामक स्थल से प्राप्त हुई है।
119. योगसार, योगबिन्दू और योग शतक आदि जैन धर्म के ग्रन्थ है।
120. महात्षी युद्ध का जन्म लुम्विनी में हुआ था।
121. महात्मा बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति ३५ वर्ष की आयु में फाल्गु नदी के किनारे हुई थी।
122. महात्मा बुद्ध के गृह त्याग के बाद गुरू आलार कलाम से सांख्य दर्शन की शिक्षा प्राप्त की।
123. बौध ग्रन्थ के 'नियमों का संग्रह' को विनय पिटक कहाँ जाता है।
124. बौध दर्शन में पिंगला नाही को ललना कहा गया है।
125. बीघ दर्शन में सुपुमना नाड़ी को अवधुति कहा गया है।
126. शील समाधि का उल्लेख विशुद्धि मार्ग के बीथ अन्धो में मिलता है।
127. महात्मा बुद्धकी शिक्षाओं, में चार आर्य सत्य, ध्यान और अष्टांगिक मार्ग को शामिल किया गया है।
128. बोध धर्म की महायान शाखा में मंत्र, ध्यान और श्वास कियाओं को शामिल किया गया है।
129. महात्मा बुद्ध अधिकांश मूर्तियों में पदभासन में बैठे दिखाई देते है।
130. महात्मा बुद्ध ने अपना उपदेश पाली भाषा में दिया है।
131. महात्मा बुद्ध ने मोक्ष, कर्म सिद्धान्त और पुर्नजन्म का समंथन किया है।
132. बौध धर्म के गुह्यसमाज तंत्र में पड़ग योग साधन के अंगो का वर्णन मिलता है।
133. गुह्यसमाज तंत्र में तंत्र साबना से पूर्व हठ योग साधना के अभ्यास को महत्व पूर्ण माना गया है।
134. गुह्यसमाज तंत्र में बौष धर्म में प्रचलित योग विधियों, बज्र चतुष्टाय एवं ज्ञान सुधा, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान का वर्णन मिलता है।
135. गुहूयसमाज तंत्र के अनुसार प्राणायाम प्राणवायु का निरोय है।
136. दान, अहिंसा और सदाचार सम्यक कर्म है।
137. यौध धर्म के ग्रन्थ 'अमरता सिद्धि' में योग मुद्राओ का वर्णन किया गया है।
138. 'मंत्रो लयो हटों राजयोगान्ता भूमिकाः क्रमात।' पक्ति मूण्डकोपनिषद् में निहित है।
139. 'सर्वम दुःखम' का सम्बध बौद्ध दर्शन से है।
140. बौद्ध दर्शन में वर्णित अप्टांग मार्ग के अन्तर्गत सम्यक् व्यापम का अर्थ है- दुर्गुणों को नष्ट कर अच्छे कर्मों के लिए प्रयासरत रहना।
141. सम्यक् स्मृति का अर्थ है- चित्त की शुद्धि, आत्मचिंतन करते रहना, काम, कोध, लोभ, मोह, एवं दुर्गुणों को नष्ट करना।
142. बौद्ध त्रिरत्न है- शील, समाधि, प्रज्ञा।
143. यौद्ध साधना में त्रिरत्न के अन्तर्गत वर्णित शील का अर्थ है-शारीरिक शुद्धि, मानसिक शुद्धि, विवार शुद्धि।
144. निकाय यौध धर्म का ग्रन्य है।
145. दूरदेशे तयाऽरण्ये राजधान्या जनांतिके। योगारम्भं न कुवीतं कृतरथेत्सिद्धहा भवेत्।। पक्ति घेरण्ड संहिता में निहित है।
146. हठयोग का सर्वाधिक विकास नौवी शताब्दी में हुआ।
Veda and purana
147. ऋग्येद के अनुसार योग है 'जुड़ना' ।
148. सर्वप्रथम योग शब्द का प्रयोग ऋग्वेद के ५०८१:१ अनुचाक्य में किया गया है।
149. ऋग्वेद में सिन्धु नदी का प्रयोग सर्वाधिक यार हुआ है।
150. ऋग्वेद में कुल १०२८, १०५६० सुत्र एवं रचनाए है।
151. ऋग्वेद का रचना काल १७०० से ११०० ई० पूर्व है।
152. ऋग्वेद में कुल ५ मंण्डल है।
153. ऋग्वेद का पहला शब्द अग्नि देवता को समर्पित है।
154. ऋग्वेद में सरस्वती नदी को महत्वपूर्ण माना गया है।
155 . ऋग्वेद मे कुल १० मंण्डल है।
156. वैदिक सभ्यता का काल माना जाता है १५०० से ६०० ई० पूर्व।
157. सबसे प्राचीन और प्रमाणिक पुराण मत्स्य पुराण को माना जाता है।
158. सामवेद में 'साम' शब्द का अर्थ 'गान' है।
159. सामवेद सवसे लघु वेद है।
1
160. सामवेद के अधिकांश पथ ऋग्वेद के आठवें एवं नौवें मंण्डल से लिए गये है।
161. यजुर्वेद की रचना गघ और पघ दोनों में की गयी है।
162. अचर्यवेद में कुल ७३० ऋचाएँ एवं ६००० श्लोक है।
163. अथर्ववेद को 'निकाय' वेद नहीं मानता।
164. अथर्ववेद कुल २० कांडों में विभाजित है।
165. अर्थववेद में 'अष्टयफ नवद्वारा देवानां पूरयोध्या निहित है।
166. वेदांग की संख्या ६ है।
167. गायत्री मंत्र का उल्लेख ऋग्वेद के तीसरे अध्याय में है।
168. गायत्री मंत्र सावित्री देवता को समर्पित है।
169. सामवेद को भारतीय संगीत का जनक कहाँ गया है।
170. स्मृतिग्रन्धों में सबसे प्रमाणीक ग्रन्थ मनुस्मृति को माना जाता है।
171. वेदव्यास के द्वारा योगसूत्र पर प्रथम भाष्य लिखा गया।
172. 'व्यासभाष्य' का रचना काल २०० से ४०० ई० पूर्व माना जाता है।
173. वरत्याकाण्ड में प्राणयाम की महत्ता का वर्णन किया गया है जो की अथर्ववेद का भाग है।
174. वर्तमान में अथर्ववेद की शीनक शाया सम्पूर्ण रूप से पायी जाती है।
175. चार वेदों में अथर्ववेद सबसे नवीन है।
176. 'आद चकों एवं नी द्वारो से युक्त यह शरीर का अपराजेय देवनगरी है, जिसमें एक हिरण्यमय कोश है जो कि आनन्द से पूर्ण है' इस पक्ति का संबंध अथर्ववेद से है।
177. ब्रम्हचर्य पालन का की महत्ता का वर्णन सभी ग्रन्थो में मिलता है।
178. वेदान्त में सार्थना मार्ग के लिए ध्यान, समाधि साधन धातुष्टाय उपयोगी साधन माना गया है।
179. वेदों के वर्गीकार महर्षि वेद व्यास माने जाते है
180. यजुर्वेदो के कुल उपनिपदों की संख्या ५२ है
181. सांख्य दंशन प्राचिनतम है
182. सांख्य र्दशन में अस्मिता क्लेश को मोह कहा है
183. सांख्य र्दशन में राग को महावेग कहा गया है
184. पदार्थ के वास्तविक स्वरूप को जानने के लिए वैशेषिक दर्शन है
185. वैशंपिक दर्शन में कुल १० अध्याय है
186. न्यायदर्शन में कुल अध्याय है
187. वैशेषिक दर्शन में सुत्रो का आरंभ धर्म की व्याख्या से होता है
188. महर्षि गौतम न्याय दर्शन के रचयिता है
189. महर्षि कपिल साख्य दर्शन के रचयिता है
190. ऋग्वेद में वनस्पति और जीवन को पुसा कहा गया है
191. सामवेद में वर्णित अधिकाशं श्लोक ऋग्वेद से लिए गये है
192. न्याय दर्शन के अनुसार कुल १६ पदार्थ है
193. मुख्य पुराणें की संख्या १८ है
194. साख्य दर्शन ६ अध्यायों में विभक्त है
195. वेदो को विषय-वस्तु के आधार पर दो भागों कर्मकाण्ड़ एवं ज्ञान काण्ड में बाटा गया है'
196. वेदान्त दर्शन में प्रारव्धकर्म, संचित कर्म, क्रियमान कर्म का वर्णन किया गया है
197. वैशंपिक दर्शन में कुल १२ प्रमेय है
198. 'अर्थातो धर्म जिज्ञासा' सुत्र का संबंध मिमांसा दर्शन से है
199. वेद संहिता, ब्राम्हण, आरण्यक, उपनिषद से मिलकर बना है
200. आयुर्वेद वेद नहीं है
201. 'विद' शब्द का अर्थ है जानना
202. 'वेद' शब्द का अर्थ है ज्ञान
203. वेद को श्रुति ग्रन्थ भी कहा जाता है
Yoga Sutra
204. योग वर्तिका के रचयिता है- विज्ञान भिक्षु
205. वरूण पुराण एक पुराण नहीं है
206. भारतीय पड़इर्शनों की निम्न विशेषता है-व्यवहारीक सिद्धान्त, अशावादी सिद्धान्त, नैतिकतावादी सिद्धान्त
Upnesada
207. 'पुराण'शब्द को' अर्थ है- प्राचीन
208. 'पुराणों' को संग्रहित करने का श्रेय महर्षि वेदव्यास को दिया जाता है
209. 'पुराण 'शब्द को अर्थ सबसे पहले छान्दोग्योपनिशद में किया गया है
210. ईशावास्योपनिशद् में आत्मज्ञरन, जीवात्मा, परमात्मा का वर्णन किया गया है
211. ईशावास्योपनिशद् में कूल १८ मंत्र है
212. ईशावास्योपनिशद् शुक्लयजुर्वेदीय का ४० वाँ अध्याय है
213. ईशावास्योपनिशद् के अंतिम मंत्र मे ईश्वर-शरणागति का वर्णन किया गया है
214. ईशावास्योपनिशद् में असूर्य लोक के विषय में चर्चा की गयी है
215. ध्यान की विधि 'शाडिल्य विधा' का वर्णर्न छान्दोग्योपनिशद में किया गया है
216. केनोपनिशद को 'तलवकरोपनिशद' भी कहते है
217. ब्रम्हज्ञान का उपदेश जो महपिं याज्ञवल्क्य ने अननी पत्नि मैत्रेयी को दी वह श्वेतरोपनिषद् में वर्णित है
218. पश्चिमी जगत में चेतना का सीमित क्षेत्र है
219. उपनिशद में उप का अर्थ है समीप
220. उपनिशद में सद का अर्थ है नीचे बैठना
221. चर्वाक दर्शन मोक्ष को नही मानता है
222. अमृतनादोपनिशद शुक्लयजुर्वेदीय नहीं है
223. मिमांसा र्दर्शन चेतना आत्मा की ज्ञान किया है
224. अमृतविन्दोपनिशद उपनिशद कृष्णयजुर्वेदीय है
225. मुक्तिकोपनिषद यजुर्वेद से संबंधित है
226. मुक्तिकोपनिषद के अनुसार मुख्य उपनिशदों की संख्या है १३
227. मुक्तिकोपनिषद के अनुसार उपनिशदों की संख्या है २०
228. अमृतदिन्दोपनिशद उपनिशद कृष्णयजुर्वेदीय है
229. छन्दोग्य, बृहदारण्यक ये दो सबसे प्राचीन उपनिपद माने जाते है
230. श्वेताश्वतरोपनिषद् में योग मुद्रा का वर्णन नहीं किया गया है।
231. श्वेताश्वतरोपनिषद् में कुल ६ अध्याय और ११३ मंत्र है।
232. श्वेताश्वतरोपनिपद् के दुसरे अध्याय में ध्यान योग प्रक्रिया का वर्णन किया गया है
233. कठोपनिशद के अनुसार इन्द्रिय, बुद्धि आक्र मन की स्थिर धारणा का नाम ही योग है
234. ऐतरयोपनिशद में जन्म-मृत्यु, सृष्टि कर्म, आत्मा का स्वरूप आदि का उल्लेख मिलता है
235. ईशावास्योपनिशद् में कर्म की महत्ता, परमात्मा के स्वरूप का वर्णन है और यह एक पघयात्मक उपनिशद है
236. महर्षि आरूणि के पुत्र श्वेतकेतु से पाचाल नरेश जयवली प्रवाहण द्वारा पाच प्रश्न पुछने का प्रसंग छान्दोग्योपनिषद में निहित है
237. पंचकोशो का विस्तार पुर्वक पर्णन तैतरीयोपनिशद में मिलता है
238. याज्ञवल्क-मैत्रेयी का प्रसिद्ध संवाद बृहदारण्यकोपनिशद में नीहित है
239. ईशावास्योपनिशद् पद्यात्मक उपनिशद है
240. अतिथि सेवा का महत्व तैतरीयोपनिशद् में किया गया है
241. न्याय दर्शन के अनुसार कुल ४ प्रमाण है
242. बृहदारण्यकोपनिशद में गायत्री विधा, मधु विधा एवं अश्वगंध या निहित है
243. पूर्व मिमांसा के रचयिता है महर्षि जैमिनी
244. उत्तर मिमासा के रचयिता है महर्षि वेद व्यास
245. ओंकार की महत्ता का वर्णन तैमरीयोपनिशद में किया गया है
256. मुक्तिकोपनिषद यजुर्वेद से संबंधित है
247. मुण्डकोपनिषद में ब्रम्हाद्वारा अपने पुत्र अथर्वा को दिये गये अध्यात्म ज्ञान का वर्णन है
248. दान पुण्य के कार्य को पूर्व मिमाया में यज्ञ कहा गया है
249. ये सभी यज्ञ है देव यज्ञ, ब्रम्ह यज्ञ, अतिथि यज्ञ
250. तैतरीयोपनिपद में ब्रम्हान्नदवल्ली, शीक्षावल्ली और भूगुवल्ली निहित है
251. तैतरीयोपनिपद में आचार्य द्वारा स्नातक को गृहस्त जीवन के विषय में शिक्षा दी गया है
252. छनदोग्योपनिशद में महर्षि चक्रायण द्वारा महावत से भोजन ग्रहण करने का प्रसंग है
253. तैगरीयोपनिपद में भृगु वरूण संवाद वर्णित है
254. छन्दोग्यापनिशद में सनद कुमार और नारद संवाद सातवे अध्याय में वर्णित है
255. श्वेतारोपनिशद् के पांचवे अध्याय में विधा और अविधा का वर्णन है
256. श्वेताश्वरोपनिषद में साख्य के सिद्धान्त का वर्णन किया गया है
257. मुण्डकोपनिषद अथर्ववेद की शौनक शाखा से संबंधित है।
258. मुण्डकोपनिषद में महषि अंगिरा द्वारा शौनक ऋषि को परा-अपरा विया के विषय में दिया गया उपदेश निहित है
259. मुण्डकोपनिषद में ग्रम्हविधा की महत्ता का उल्लेख मिलता है।
260. मुक्तिकोपनिपद यजुर्वेद से संबंधित है
261. एतरयोपनिशद के अनुसार सृस्टी के आरंभ में आत्मा द्वारा विभिन्न लोको १० सृजन किया गया
262. एतरयोपनिशद के प्रथम अध्याय में मानव शरीर की रचना का उल्लेख मिलता है
263. बृहदारण्यकोपनिशद में वर्णित देवासुर संग्राम में देवो नं प्राण को उद्गीत गान का कार्य सौपा था
264. दालम्स, सिल्क, प्रवाहक आदि उदगीत विधा के विद्वान थे
265. ब्रम्हाद्वारा सृस्टी की रचना और मनुष्य की उत्पत्ति के बाद देवों द्वारा अपान वायु क्की सहायता से अन्न ग्रहण करने का उल्लेख ऐतरयोपनिशद में मिलता है
266. केनोपनिशद् सामवेदीय है
267. बृहदारण्यकोपनिशद में 'दकार' उपदेश का वर्णन नीहित है
268. ब्राम्हण ग्रन्थो में वेदों के कर्मकाण्ड के अन्तर्गत आते है
269. भूत-यज्ञ को बलिदेव यज्ञ भी कहा जाता है
270. श्री कृष्ण ने महर्षि कपिल को सर्वश्रेष्ठ महर्षि बताया
271. छान्दोग्योपनिशद में सत्यकाम द्वारा वृषभ, अग्नि, हंस और मद्भूत से ज्ञान प्राप्ति की कथा निहित है
272. चर्चाक दर्शन के अनुसार चेतना शरीर का आगन्तुक गुण है
273. आरण्यक वनों में लिखे गये ग्रन्थ कहलाते है
274. कटोपनिशद में यमराज के द्वारा सगुण र्निगुण ओंकार की उपासना का वर्णन निहित है
275. छान्दोग्योपनिशय में आचार्य हरिप्रभत द्वारा सत्यकाम शिक्षा देने से पहले उसके गौत्र पुछने की प्रसंग निहित है
276. 'सत्यमेव जयते' वाक्य मुण्डकोपनिशद से लिया गया है
277. इन्द्रदेव द्वारा आऋविदग्धवर्ण से ब्रम्हविधा का उपदेश लेना किसी और को नहीं देनं की कपि को चेतावनी देने का प्ररंग बृहदारण्यकोपनिशद में निहित है
278. शुक्देव को श्रेष्ठयीतराग पुरूप कहा गया है
279. योग दर्शन के अनुसार चित्त की ५ अवस्थाए है
280. कुल उपनिषत्रों की संख्या १०८ है
281. बृहदारण्यक उपनिशय को पुराणें ने पांचवां वेद बतलाया है
282. गीता में सांख्य को ज्ञान योग नाम से जाना जाता है
283. न्याय दर्शन निद्रा को युक्ति नहीं मानता है
284. ' साख्य दर्शन के अनुसार पुरूप अकर्ता है, पुरुष' अनेक है, पुरूष साक्षी है
285. प्रत्याहार, धारण और ध्यान का वर्णन वायु पुराण में मिलता है
286. गैन दर्शन के अनुसार बुद्धि और शरीर को आत्मा की तरफ मोड़ना ही योग है
287. गीता में कुल १८ अध्याय है
288. श्री घर के अनुसार चेतना की उत्पत्ति आत्मा, विपयों और इन्द्रियों के योग से होता है
289. ऋग्वेद मे प्रकृति को अदिती कहा गया है
290. आर्थर शोपन हावर जर्मनी के निवासी थे इन्होने वेदों का गहन अध्ययन किया था
291. गीता में ७०० श्लोक है
292. चेतना कभी खंड़ित नही होती आचार्य शंकर
293. योग, साध्य, मीमांसा दर्शन के अनुसार 'चेतना शाश्वत है और पुरूषा अखण्ड है'
294. चर्वाक दर्शन आकाश को तत्व नहीं मानता है
295. यांग साधना के अंगों का वर्णन श्वेताश्वतर उपनिषद में किया गया है
296. ईशावास्योपनिपद में विधा-अविधा, ब्रम्हस्वरूप, कर्म निष्ठा आदि विषय का वर्णन किया है
297. 'समत्वं योग उच्चतें' की परीभाषा गीता में है
298. आचार्य रामानुजाचार्य के अनुसार चुतना आत्मा गुण धर्म है
299. एतरेयोपनिशद ब्रम्ह एवं प्रकृति का उल्लेख मिलता है
300. यजुर्वेद में 'जु' का अर्थ है ब्रम्हा
301. मीमांसा दर्शन चेतना को ज्ञाता, ज्ञेय और ज्ञान का रूप दर्शता है
302. चांक पदार्थवाद का प्रतिनिधित्व करतं है
303. योग वशिष्ठ में भोग-विलास से विमुखत्ता की महत्ता का वर्णन किया गया है
304.
305. न्याय दर्शन और वेशेषिक दर्शन के अनुसार 'धतना का मूल आत्मा ही है'
306. चर्याक दर्शन के संस्थापक आचार्य बृहस्पति थे
307. साख्य दर्शन के अनुसार युद्धि सतोगुण प्रथान है
308. साख्य दर्शन के अनुसार अहंकार रजोगुण प्रथान है
309. साख्य दर्शन में मनुष्य के कर्मेन्द्रियों की संख्या ५ बतलायी गयी है
310. साख्य दर्शन में मनुष्य के ज्ञानेन्द्रियों की संख्या ५ चतलायी गयी है
311. गुहाय शब्द का अर्थ इन्द्रियों के विषय है
312. जैन दर्शन में अनुप्रेक्षा की महत्ता का उल्लेख मिलता है
313. 'अभयास वैराग्याभ्या तन्निरोधः
314. साख्य दर्शन के अनुसार प्रकृति स्वतंत्र है, प्रकृति अलिग है, प्रकृति अनंत है यं प्रकृति की विशेषता है
315. 'ज्ञानी त्वात्मैवमें मतम' पक्ति गीता से लिया गया है
316. हिरण्यगर्भ को योग का आदिवक्ता माना गया है
न्याय एवं वेपैषिक दर्शन के अनुसार मनुष्यों के दुखों का कारण अज्ञानता के कारण किया गया गलत कार्य है
317. तुर्यगा है-योग की सातवी' भूमिका, मन की निरोधावस्था, समाधि की एक अवस्था
318. गीता के अनुसार विकर्म है निषिद्ध कर्म
319. जिस सायक ने समाधि की पदार्या भावना अवस्था को प्राप्तकर लिया है उसे ब्रम्हविद्वरीयान कहते है
320. जैन दर्शन के अनुसार वृत्ति के २ भेद है
321. गौतम, ऋषि के अनुसार पदार्था की कुल संख्या १६ जयकी कणादि के अनुसार ६ है
322. माधवाचार्य द्ववैतवाद के समर्थक थें
323. निम्बकाचार्य द्वताद्ववैतवाद के समर्थक थें
324. उत्तर मिमासा को वेदान्त कहा गया है
325. ब्रम्ह, देव, पितर आदि यज्ञों का वर्णन पूर्व मिमांसा दर्शन में किया है
326. त्रियाद समुह में अधर्ववेद सम्मिलित नहीं है
Patanjali Yog
327. पतंजली योंग सुत्र में किय प्रकार के कर्म का वर्णन है-शुक्ल कर्म, क्षण कर्म, शुक्ल-कृष्ण कर्म
328. ऐसे कर्म जिनसे नरक की प्राप्ति होती है कृष्ण कर्म कहलाते है
329. पूर्ववत, शेपवत एवं सामान्यदृष्टि एक अनुमान प्रमाण है
330. समाधिपाद में कुल कितने सूत्र है-५१
331. साधनपाद में कुल कितने सूत्र है-५५
332. विभूतिपाद में कुल कितने सूत्र है-५५
333. कैवल्यपाद में कुल कितने सूत्र है-३४
334. साथनपाद में क्लेशो के दूर करने का उपायों का वर्णन है
335. गुणतीत अवस्था कैवल्य अवस्था कहलाती है
336. राग के कारण देश उत्पन्न होता है
337. पुरूप एवं प्रकृति के संयोग से महतत्व की उत्तपत्ति होती है
338. सम्प्रज्ञात समाधि के ४ भेद है
339. आन्नदानुगत समाधि में विचार भी शुन्य हो जाता है
340. अस्मितानुगत समाधि में आन्नद भी नष्ट हो जाता है सभी भाव मिट जाम है केवल अपनेपन की भावनाएं ही रह जाती
341. 'प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि पक्ति समायिपाद में वर्णित है
342. मूढ़ावस्था में व्यक्ति आलस्य, प्रमाद, निद्रा आदि के भाव में रहता है
343. स्मृति चित्त की पांचचि वृत्ति है
344. अष्टांगयोग और ब्रम्हविधा का वर्णन शाडिल्य उपनिपद में किया गया है
345. घेरण्ड संहिता में किस प्रकार के ध्यान का वर्णन है स्थूल, ज्योति, सूक्ष्म
346. 'विवेक ख्याति अविप्लवा हानोपायः'
347. भोग सन्यास परंपरा का प्रचार स्वामी शिवानन्द ने किया
348. आत्मा एवं चित्त का संयोग जीवात्मा कहलाता है
349. योग अन्तराय योग का बायक तत्व है
350. गीता के अनुसार उचित सोना, उचित मनोरंजन, उचित कार्य करना योग के सायक तत्व है
351. गीता के अनुसार अहंकार, अधिकथन, तनाव, असमंजस, लापरवाही, शंका योग के बाधक तत्व है
352. हठयोग प्रदीपिका के अनुसार अधिक खाना, अधिक बोलना, अर्थिक काम, कठोर नियम, साधारण व्यक्ति का साथ योग के यायक तत्व है
353. हठयोग प्रदीपिका के अनुसार उत्साह, हठ, विश्वास, साहस, साधारण व्यक्तियों से दूरी योग के साधक तत्व है
354. योग साधना में धारण की अवधि ५ नाड़ी बतलायी गयी है
355. १ नाड़ी बराबर २४, मिनट
356. योग साधना में ध्यान की अवधि ६० नाड़ी बतलायी गयी है
357. तत्त्व वैशारदी के रचयिता वाचस्पतिक मिश्र है
358. महर्षि पतंजली ने सबसे पहले सूत्रबंध किया
359. वादलों को देखकर वर्षा का अनुमान करना अनुमान-प्रमाण वृत्ति है
360. मूर्तिरूप इष्ट का ध्यान करना स्थूल ध्यान कहलाता है
361. ज्योतिरूप ब्रम्ह का ध्यान करना ज्याति ध्यान कहलाता है
362. पूर्वजन्म के संस्कार अचेतन मन से जुडा है
363. पतंजली योंग सुत्र के अनुसार कुल ५ चित्तवृत्तिया है
364. महर्षि पतंजली को अहिपति, शेपावतार, नागनाथ आदि नामों से जाना जाता है
365. 'नारित मायासमः पाशी'
366. महर्षि घेरण्ड ने ३ प्रकार के ध्यान का वर्णन किया है
367. व्याधि का अर्थ है रोग
368. अवृत्ति अन्तराय का अर्थ है इच्छा
369. अविधा, अस्मिता, अभिनिवेश क्लेश है
370. आवश्यक सामग्री का संघय न करना अपरिग्रह कहलाता है
371. कृष्ण कर्म होता है बुरा कर्म
372. शुक्ल कर्म होता है अच्छा कर्म
373. योगीयों द्वारा किया जाने वाला कर्म कहलाता है अशुक्ल-अकृष्ण कर्म
374. समाधि अवस्था में चित्त का अपना स्वरूप शून्य सा हो जाता है
375. योग अन्तरा की संख्या बतलायी है
376. प्रत्यक्ष, अनुमान, आगम प्रमाण वृत्ति है
377. सम्प्रज्ञात समाधि में आत्मा अपने स्वरूप को पहचान लेती है
378. सम्प्रज्ञात समाधि में ध्येय विषय का स्पस्ट ज्ञान रहता है
379. भक्ति योग में 'भक्ति' शब्द भज से लिया गया है
380. जो भक्त धन की कामना से व्रत करता है उसे अर्थाथी कहते है
381. जो भक्त सेसारिक दुखोः से मृक्ति के लिए भक्ति करता है उसे आर्त कहते है
382. मैत्री चित्त प्रसादन का उपाय है
383. आदि शंकराचार्य द्वारा रचित योग-तरावली में हठयोग का बर्णन है
384. 'भूवज्ञानं सर्वे सेयमात' पक्ति पतंजलि योगसूत्र के विभूतिपाद में वर्णित है
385. विवेक ख्याति अवस्था में सत्वगुण पूर्णरूप से प्रधान हो जाता है
386. चित्त को ब्रम्ह में एकाग्र करना समाधान कहलाता है
387. चित्त की स्वप्नावस्था में सतोगुण, जाग्रतावस्था में सतोगुण, सुपुप्तावस्था में सोगूण गौणतूम रूप से दया रहता है
388. राग द्वैश आदि के कारण होने वाली चित्त की अवस्था है क्षिप्तावस्था
389. क्षिप्तावस्था में रजोगुण की प्रधानता हांती है
390. विक्षिप्तावस्था में सत्वगुण की पंधानता हांती है
391. मूढ़ावस्था में तमोगुण की प्रधानता हांती है
392. स्तम्मनवृत्ति कुम्भक है
393. सुपुप्त अवस्था में रजोगुण शुन्य हो जाता है
394. अस्मितानुगत समाधि एकानुगत समाधि है
395. विचारानुगत समाधि त्रियानुगत है
396. निम्न कोटी के व्यक्तियों को अष्टांग योग साधना करना चाहिए
397. वस्तुज्ञान से शून्यवृत्ति कहलाती है विकल्प वृत्ति
398. जो वृत्तियां कष्ट पैदा करे, कहलाती है कलिष्ट वृत्तियां
399. वृत्तियां निम्न है-निद्रावृत्ति, समृतिवृत्ति, विकल्पवृत्ति
400. इन्द्रियों द्वारा बाहरी विषयों से जुड़ कर वस्तु का ज्ञान करवाना प्रत्यक्ष प्रमाण वृत्ति है
401. रस्सी को सर्प समझ लेना विपर्य वृत्ति है
402. दिपर्य वृत्ति से होने वाला ज्ञान अस्थिर होता है
403. अहं वृत्ति विकल्प वृत्ति है
404. निद्रावृत्ति में रजांगुण, तमोगुण शुन्य हो जाता है, अहंवृत्ति के दौरान अभाव की प्रतीति होती है
405. यांगीयों के चित्त की अवस्था एकाग्र अवस्था कहलाती है
406. जिज्ञासुओं के चित्त की अवस्था विक्षिप्त अवस्था कहलाती है
407. निम्न कोटी के मनुष्यों के चित्त की अवस्था निरूद्धावस्था कहलाती है
408. निरूद्धावस्था निर्वीज समाधि की अवस्था कहलाती है
409. योग का अर्थ समाधि है-महर्षि वेदव्यास
410. डिल्य, सूत्र के अनुसार 'ईश्वर के प्रति परम श्रद्धा रखना ही भक्ति है'
411. सबकुछ परमात्मा को सर्मपित करके उसके साथ एक हो जाना ही आत्मनिवेदन कहलाता है
412. आचार्य रामानुजाचार्य के अनुसार भक्ति के ५ प्रकार है
413. चाहरी साधनों का सहारा लेकर अपने इष्टदेव की भक्ति करना वैदीक भक्ति है
414. जय साधक निर्गुण निराकार ब्रम्ह की उपासना करता है वह भक्ति परा भक्ति कहलाती है
415. इन्द्रियों को विषयों से हटाकर ब्रम्ह के साक्षातकार के लिए मनन चिन्तन में लगाना ही दम कहलाता है
416. फल की इच्छा को त्यागकर संसारिक विषयों के प्रति आसक्त न होना और सभी कर्म ईश्वर 'को सर्मपित करना ही उपरति है
417. ग्रम्ह भाव की स्थिति प्राप्त करना ही ज्ञान योग का लक्ष्य है
418. यम्ह में अपने चित्त को एकाग्र करना तथा गुरू संवा करना समाधान कहलाता है
419. सम, दम, श्रद्धा समाधान, तितिक्ष्सा पटसम्पत्ति के अंग है
420. अशुद्ध को शुद्ध समझना अविधा है
421. सभी जीवों कां सुख देना, उसकी सेवा करना भोजन जल आदि देना भूत-यज्ञ कहलाता है
422. ज्ञान योग की साधना में जगत को मिध्या तत्त्व माना जाता है
423. श्रुति वाक्यों को सुनने के बाद इसका अर्थ समझकर, ब्रम्ह का चिन्तन करना मन्न कहलाता है
424. किसी सुक्ष्म विषय में चित्त की एकाग्रता बनाए रखना विचार समाधि का रूप है
425. सभी प्रकार के क्लेशों का मूल कारण अविधा है
426. हेच दुःख मनागुतम, हेय का अर्थ है दुःख का स्वरूप क्या है?
427. भव प्रत्यय समाधि में 'भव' का मतलब है अविया
428. पुर्ण धारण से प्रभावित होकर जब मनुष्य किसी वस्तु का अनुमान करता है तो यह विकल्प वृत्ति कहलाती है
429. विद्वान, दोषरहित, वेद वाक्यों और सिद्ध पुरूष के वचनों से जो प्रमाण उत्तपन्न होता है वह आगम प्रमाण कहलाता है
430. किसी प्रसिद्ध दृष्य या वस्तु से प्रभावित होकर जय मनुष्य किसी वस्तु का अनुमान करता है तो वह उपमान प्रमाण कहलाता है
431. विक्षिप्तावस्था में सात्विक वृत्तियां, राजसिक वृत्तियों से प्रभावित होती है
432. मनुष्यों द्वारा निरंन्तर निष्काम कर्म करते रहने से चित्त में विक्षिप्तावस्या उत्पन्न होती है
433. जय आत्मा की वृत्ति यहिमुर्खि होती है तव स्वप्नावस्था जीव की नहीं होती
434. 'अभिनिवेश' शब्द का अर्थ है मौत से डर
435. भक्ति योग का काल है १२ से १६ वी शताब्दि है
436. पतंजलि योगसूत्र में संस्कार दुःख, परिणाम दुःख, ताप दुःख का उल्लेख मिलता है
437. क्षिप्तावस्था में चित्त चंचल हो जाता है
438. पतंजलि के अनुसार योग के सायक तत्व है, कमजोर लोगो की सहायता, बुरे लोगो की उपेक्षा, अच्छ लोगो से मित्रता
439. पतंजलि के अनुसार योग के वाधक तत्व है, बीमारी, शंका, लापरवाही
440. पुरूष के प्रभाव से प्रकृति के गुणों परिर्वतन होने लगता है
441. एकाग्रवस्था में सत्व गुण प्रधान होता है
442. लिंग तथा लिंगी पर आधारीत प्रमाण अनुमान प्रमाण है
443. चित्त को शुद्ध करकें षट्चकों से हाते हुए ब्रम्ह रख्ध में मन को एकाग्र करना पिण्डस्थ ध्यान के अन्तर्गत आता है
444. 'वितराग विषम वा चितंम' पक्ति योग दर्शन में उल्लेखित है
445. प्राणायाम अष्टांग योग का ४ अंग है
446. पतंजलि योगसूत्र में योग अन्तराय ६ है
447. 'नाभी चकं कायव्युहज्ञानम पक्ति पतजलि योगसूत्र के विभूतिपाद में है
448. महर्षि पतंजलि के अनुसार शुक्ल कर्म श्रेष्ठ कर्म है
449. साधक द्वारा अपने शरीर कों वज्ज के समान भारी करना गरिमा सिद्धि है
450. किसी स्थूल वस्तु या प्रकृक्तिक पंचभूतों की अर्चना करते हुए मन को एसी में लिन कर लेना वितर्कानुगत समाधि कहते है
451. राग लगाव से उत्पन्न होता है, इससे सभी दुःखों की उत्पत्ति होती है यह मव योग वशिष्ट ग्रन्थ का है
452. पतंजलि योग के साधन पाद में अष्टांग योग एवं क्रिया योग का वर्णन है
453. योग भ्रष्ट व्यक्ति भी मृत्यु के बाद भी पुण्य आत्माओं के घर में जन्म लेता है श्री कृष्ण
454. साधक द्वारा अपने शरीर को तिनेके के समान हल्का करना लधिमा सिद्धि है
455. साधक द्वारा अपने शरीर को बड़ा कर लेना महिमा सिद्धि है
456. भावना प्रधान व्यक्ति के लिए भक्ति योग की साधना सबसे उपयुक्त है
457. मध्यम कोटी के सायको में तमोगुण एवं रजोगुण प्रधान होता है
458. 'तपो द्वन्द्व सहनम् पक्ति का संबंध किया योग से है
459. 'ता एवं सबीज समाधिः
460. अमनी दशा संप्रज्ञात समाधि के दौरान होती है
461. 'योगः चित्तवृत्ति निराधाः परिभाषा पतंजली योगसूत्र के समायिपाद में वर्णित है,
462. पंचक्लेशों का वर्णन 'पतंजली योगसूत्र के सायनपाद में किया गया है
463. वेदान्त के अनुसार कुल प्रमाण ६ है
464. निद्रावृत्ति का मूल कारण है तमसगुण
465. वैदिक मंत्रों द्वारा ईश्वर की भक्ति करना अर्चन भक्ति कहलाता है
466. 'चतुर्युहवाद' का वर्णन योगसूत्र के साधनपाद में किया गया है
467. विपर्य वृत्ति मिथ्याज्ञान है
468. मध्यम कोटी के साथको के लिए कियायोग साधना बतलायी गयी है
469. रागात्मिक भक्ति की उच्च अवस्था परा भक्ति कहलाती है
470. कष्टों को प्रसन्नता पूर्वक सहन करते हुए लक्ष्य की प्राप्ति करना तितिक्ष साथना है
471. पतंजलि योगसूत्र का दूसरा अध्याय साधनपाद है
472. उत्तम कोटी के साधक अभ्यास एवं वैराग्य और ईश्वर प्रणियान के द्वारा समाधि की प्राप्ति कर सकते है
473. मध्यम कोटी के साधक तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणियान के द्वारा समाधि की प्राप्ति कर सकते है
474. निम्न कोटी के साधक अष्टोग योग के द्वारा समाधि की प्राप्ति कर सकते है
475. 'देश वन्धरचित्त्य धारणा' का अर्थ है चित्त को किसी एक विशेष विन्दु पर बाधना धारणा है
476. पतंजलि योगसूत्र के कैवल्यपाद में कर्म का वर्णन किया गया है
477. महर्षि पतंजलि ने फर्म के ४ भेद बतलाये है
478. पतंजलि योगसूत्र में कुल १६५ सूत्र है
479. शैव मार्ग में समाधि के ६ भेद बतलाये गए है
480. ज्ञानी भक्तों को श्रेष्ठ बतलाया गया है
481 'हठयोग बिना पृथ्वी राज योग बिना निशा'
482. पतंजलि योगसूत्र का अंतिम अध्याय कैवल्यपाद है
483. श्रवण योग साधना का अंन्तरंग साधन है
484. चैतन्यमहाप्रभु भक्तियोग के प्रणेता रहे है
485. मनन पडसम्पत्ति का नियम नहीं है
486. मंत्र योग की साधना द्वारा मन की एकाग्रता बढती है, अन्तः करण शुद्ध होता है, नकारात्मक विचार नष्ट होते है
487. वैदिक ऋचाओं के द्वारा भगवान की स्तुति करना वंदन भक्ति कहलाता है
Shiv Sanhita
488. कलिष्ट चित्तवृत्तियां होती है तमसप्रधान
489. अकलिष्ट चित्तवृत्तियां होती है, सत्वप्रधान
490. मूलाधार चक्क मस्तिष्क के चेतन भाग से संबंधित है
491. मूलाधार चक्र के सुप्त होने पर होमोराइड, अरुचि, मलावरोध आदि विकार उत्पन्न होता है
492. स्वाधिष्ठान चक्र मस्तिक के अवचेतन भाग से संबंधित है
493. शिव संहिता ५ अध्यायों में विभक्त है
494. शिव संहिता के प्रथम अध्याय में कर्म, मोक्ष का उपाय, माया का वर्णन मिलता है
495. शिव संहिता के अनुसार जल तत्व की उत्पत्ति वायु और अग्नि तत्वां के संयोग से हुई है
496. शिव संहिता में चित्रा नाड़ी को अधिक महत्वपूर्ण माना गया है
497. शिव संहिता के अनुसार अज्ञानता को दुर करने को उत्तम साघन स्वाध्याय है
498. शिव संहिता के अनुसार चित्रा नाड़ी शुद्ध, चमकदार, रंगीन आदि गुणो का वर्णन है
499. शिव 'संहिता के अनुसार शरीर में ३५०००० नाड़िया है
500. संकोज, निश्र्शकम, निराश आदि विषार मणिपुर चक के सुप्त होने पर उत्तपन्न होता है
501. शिव संहिता के अनुसार मोक्ष प्राप्ति के लिए याग शारत्र को बतलाया गया है
502. शिव संहिता के अनुसार सुपुम्ना नाड़ी में ६ उर्जा केन्द्र है
503. उग्रासन पश्चिमोत्तान आसन के समान है
504. गुरु की महिमा का वर्णन शिव सहिंता के तीसरे अध्याय में किया गया है
505. शिय संहिता के अनुसार योग के वाधक तत्व है गुरू के प्रति वृद्धा का ना होना
506. शिष संहिता में ११ प्रकार की मुद्रओं का वर्णन मिलता है
507. पुचरी, वज्रोली, योनी मुद्रा का वर्णन शिव संहिता में मिलता है
508. आज्ञा चक का संबंध आत्मा से है
509. शिव संहिता में लययोग, मंत्रयोग, राजयोग का वर्णन मिलता है
510. मुलाधार चक पर स्वयाम्बुलिंग पर ध्यान करना वर्दुरी सिद्ध में सहायक है
511. शिव संहिता में स्वास्तिकासन, पदमासन, सिद्धआसन का वर्णन किया गया है
512. मैदक की भातिं शरीर को हवा में उछाल लेना दर्दुरी सिद्ध है
513. शक्ति चालिनी मुद्रा के निरंन्तर अभ्यास कुण्डलिनी जागरण में सहायक ह, मृत्यु के भय को दुर करता है, शारीरिक शक्ति को बनाये रखता है
514. शिव संहिता में २ वज्रोली मुद्राओं का वर्णन किया गया है
515. मूलबंध के अभ्यास द्वारा अपान वायु एवं प्राणवायु को मिलना यौनीमुद्रा सिद्धि में सहायक है
516. शिव सेहिता के अनुसार योग के सायक तत्व है गुरू के प्रति आदर रखना एवं इन्द्रियों पर नियंत्रण रखना
517. अनाहत चक में वहालिग पर ध्यान करना भुवारी सिद्धि प्राप्ति में सहायक है
518. सिद्ध-सिद्धान्त पद्धति के अनुसार गुरू वह है जो अपने शिष्यों के सभी संदेह और भ्रम दुर कर सके
519. सिद्ध-सिद्धान्त पद्धति में अवधूत योगी के गुणों का उल्लेख छठवे अध्याय में मिलता है
520. सिद्ध-सिद्धान्त पद्धति के अनुसार योग सायना के आठवें वर्ष में साधक को अष्टसिद्धयों की प्राप्ति होती है
521. सिख-सिद्धान्त पद्धति के अनुसार योग साधना के चौथे वर्ष में सायक का मुख एवं प्यास पर नियंत्रण हो जाता है
522. सिद्ध-सिद्धान्त पद्धति के अनुसार गुरू कृपा के द्वारा परमपद की प्राप्ति की जा सकती है
523. अवधूत योगी के गुण है पुच क्लेशों से मुक्ति, प्रत्येक स्थिति में स्थिर रहना, इच्छाओं से मुक्ति
524. अष्टांगयोग का वर्णन सिद्ध-सिद्धान्त पद्धति के दूसरे अध्याय में किया गया है
525. 'सिद्ध-सिद्धान्त पद्धति के अनुसार यम है चित्त की शान्ति, इन्द्रियों पर नियंत्रण, विपरीत स्थिति को सहन करना
526. सिद्ध-सिद्धान्त पद्धति के अनुसार नियम है चित्तवृत्तियों पर नियंत्रण, राग और द्वप का शमन, इच्छाओ से मुक्ति
527 . सिद्ध-सिद्धान्त पद्धति के अनुसार प्राणायाम है प्राणों को स्थिर करना
528. अनाहत चक्र में हंसकला पर ध्यान करना प्रत्याहार के अभ्यास में सहायक है
529. सिद्ध-सिद्धान्त पद्धति के अनुसार मानव शरीर में चक है
530. सिद्ध-सिद्धान्त पद्धति के अनुसार मानव शरीर में छइवां चक है- तालुचक
531. सिद्ध-सिद्धान्त पद्धति के अनुसार मानव शरीर का पहला आधार है- पैर का अंगुठा
532. ग्यारहवें आधार को जीहवा द्वारा स्पर्श करने का निरंतर अभ्यास रोग को दूर करने में सहायक है
533. शुन्य आकाश आकाश का प्रकार नही है
534. राजदंत का संबंध शखिनी नाड़ी से है
535. तीना लोक के देवता इन्द्र माने जाते है.
536. सिद्ध-सिद्धान्त पद्धति में कुल ६ अध्याय है
537. सिद्ध-सिद्धान्त पद्धति के चतुर्थ अध्याय में शक्ति, प्रत्याभिजना, परमशिव का वर्णन किया गया है
538. संकल्प और घृति बुद्धि का गुण नहीं है
539. घृति चित्त का गुण नहीं है
540. गोरक्ष नाथ ने सूक्ष्म शरीर के गुणों को व्यक्ति कहा है
541. प्रश्न व्यक्ति का प्रकार नहीं है
542. मित्या और तृष्णा प्रकृतिक व्यक्ति के गुण है
543 प्रवाहा अग्निी की कला नहीं है
544 रजिका सूर्य की कला नहीं है
545. समरा चन्द्रमा की कला नहीं है
546. गौरक्ष नाथ ने मानव शरीर में १० नाडियों को महत्वपूर्ण माना है
547. कामपीठ मूलाधार चक से संबंधित है
548. सिद्ध-सिद्धान्त पद्धति में ५ प्रकार के अन्तर्लक्ष्यों का उल्लेख मिलता है
549. सिद्ध-सिद्धान्त पद्धति में ७ प्रकार के वर्हिलक्ष्यों का उल्लेख मिलता है
550 lसिद्ध-सिद्धान्त पद्धति के पंचम अध्याय में पाचं चरणों का वर्णन मिलता है
551. सिद्ध-सिद्धान्त पद्धति के अनुसार योग सायना का चतुर्थ चरण तुर्या है
552. सिद्ध-सिद्धान्त पद्धति के अनुसार योग सायना का पंचम चरण तुर्यातीत है
553. साधक सिद्ध योगी कहलाता है जब वह सायना की तुर्यातीत अवस्था को प्राप्तकर लेता है
554 . हठयोग प्रदीपिका कुल ४ अध्यायों में विभक्त है
555. हठयोग प्रदीपिका कुल ३८६ सूत्र है
556. हठयोग प्रदीपिका के तृतीय अध्याय में मुद्राओ के भेदों एवं उपयागिता का वर्णन किया गया है
557 Hathratnawali हठ रत्नावली में घटरथ योग का विवरण मिलता है
558. केवली प्राणयाम का विवरण हठयोग प्रदीपिका में नहीं किया गया है।
559. प्लाविनी प्राणयाम का वर्णन घेरण्ड संहिता में नही किया गया है
560. प्लाविनी, शीतकारी प्राणयाम का वर्णन घेरण्ड संहिता में किया गया है पर हठयोग प्रदीहपका में नही किया गया है
561. कैवली और सहीत प्राणयाम का वर्णन घेरण्ड संहिता में किया गया है पर हठयोग प्रदीहपका में नहीं किया गया है
562. हठयोग प्रदीपिका के पहले अध्याय में स्वामी स्वरात्माराम ने योगी के आहार, आसन, योगी के साथक तत्व का वर्णन किया है
563. वज्ञासन और मण्डुकासन प्राणयाम का वर्णन घेरण्ड संहिता में किया गया है पर हठयोग प्रदीरुपका में नहीं किया गया है
564. हठयोग प्रदीपिका में कुल १५ प्रकार के आसनों का वर्णन मिलता है
565. शीपासन प्राणयाम का वर्णन घेरण्ड संहिता में किया गया ओर हदयोग प्रदीहपका में भी किया गया है
566. हठयोग प्रदीपिका में ६ प्रकार की शुद्धि कियाओं का वर्णन किया गया है
567. 'पंचकोश सिद्धान्त' का वर्णन तैतरीयोपनिशद में मिलता है
568. Sanh खेचरी मुद्रा का वर्णन घेरण्ड सहिता तथा हठयोग प्रदीहपका में भी किया गया है
569. हठयोग प्रदीहपका में शामभवी मुद्रा का वर्णन नहीं मिलता है
570. भस्तिका प्राणयाम का प्रयोग शक्तिचालिनी मुद्रा के दौरान किया जाता है
571. हठयोग प्रदीपिका में वर्णित नादानुसंधान की पहली अवस्था आरम्भावस्था है
572. नादानुसंधान की परिच्यावस्था में बुद्धि और शरीर एक हो जाते है
573. नादानुसंधान की दुसरी अवस्था परिच्यावस्था कहलाती है
574. नादानुसंधान की निष्पत्तिअवस्था सर्वोच्च अवस्या कहलाती है
575. घेरण्ड संहिता ७ अध्यायो में विभक्त है
576. घेरण्ड संहिता का चौथा अध्याय प्रत्याहार है
577. धारणा योग अंग का उल्लेख घेरण्ड संहिता में नहीं मिलता है
578. ध्यान अन्तरंग योग का अंग है
579. पटकर्म का वर्णन घेरण्ड संहिता के प्रथम अध्याय में मिलता है
580. घेरण्ड संहिता में प्रत्याहार की ३ अवस्थाओं का वर्णन किया गया है
581. प्रत्याहार की दुसरी अवस्था है इन्द्रिय अवलोकन
582. प्रत्याहार की पहली अवस्था में आत्मविश्लेषण प्रवधि का प्रयोग किया जाता है
583. मानस प्रस्तुति की अवस्था प्रत्याहार की नही है
584. प्राणायाम का वर्णन घेरण्ड संहीता के पंचम अध्याय में किया गया है।
585. घेरण्ड संहिता में ३ प्रकार के त्राटकं का वर्णन किया गया है
586. हठ रत्नावली ४ भागों में विभक्त है
587. हठ रत्नावली में ६ प्रकार के कुम्मक का वर्णन मिलता है
588. हठ रत्नावली में ८४ प्रकार के आसनों का वर्णन मिलता है
589. हठ रत्नावली में ८ प्रकार की शुद्धि कियाओं का वर्णन मिलता है
590. हठ रत्नावली में आसनों का वर्णन २ अध्याय में मिलता है
591. हठ रत्नावली में उल्लेखित भक्ति योग महायोग का अंग नहीं है
592. गौरक्ष शतक में नियम योग अंग का वर्णन किया गया है
593. गौरक्ष शतक में ५ प्रकार की धारणाओं का वर्णन किया गया है
594. गौरंक्ष पछिति में १० नाड़ियों को महत्वपूर्ण माना गया है
595. गौरंक्ष पद्धिति के अनुसारं एक योगी को सर्वप्रथम प्राण एवं अपान दोनों प्राणों का मिलान करना चाहिए है
596. गौरंक्ष पछिति में ६ प्रकार के चको का वर्णन मिलता है।
597. गौरंक्ष पद्धिति में २ प्रकार के लक्ष्यों का वर्णन मिलता है
598. गौरंक्ष पद्धिति में १६ प्रकार के आधार बतलाए गये है
599. गौरंक्ष पछिति के अनुसार छठवां आधार नाभीमंण्डल धार है
600. गौरंक्ष पछिति के अनुसार दसवा आधार जिह्वामूलाधार है
601. गौरंक्ष पद्धिति के अनुसार चौदहवा आधार नासीकामूलाधार है
602. पाशिनी मुद्रा का वर्णन गौरंक्ष पद्धिति में नहीं किया है
603. गौरंक्ष संहित के अनुसार सिद्धासन और पदमासन का अभ्यास करने के पूर्व इच्छाओं का त्याग करना आवश्यक है
604. गौरंक्ष पद्धिति के अनुसार पहला आधार है पादागुष्ठ
605. नाद की उत्पत्ति होती है, जब प्रणव जप और ज्याति 'पर ध्यान किया जाता है-छठवें आधार में
606. गौरंक्ष संहित के अनुसार पड़चकों सहीत पृथ्वी के कुल तत्व २६ है
607. विवेक चूड़ामणि में शंकराचार्य जी ने वैराग्य को नित्य समाधि प्राप्ति में सहायक साधन माना है
608. शंकराचार्य ने शतश्लोकी, दशश्लोकी, पंचीकरण, आत्मबोध, प्रयोयसुधाकर, गीता भाष्य, विवक चूडामणी, आनन्दलहरी, ब्रम्हासूत्र की रचना की है
609. घेरण्ड संहिता में वर्णित सूक्ष्मध्यान में सूक्ष्म का अर्थ है-वास्तविक
610. स्थूल ध्यान के दौरान सांकेतिक कमल चित्र के मध्य में हंसों का जोड़ा गुरू का चरण दर्शाता है
611. घेरण्ड संहिता में ज्योर्तिध्यान के दौरान आत्मा की स्थिति का उल्लेख किया गया है
Scance
612. रक्त में मौजूद हिमोग्लोविन है- प्रोटीन
613. लैगर हैंस की द्वीपिकाएँ अग्नाशय ग्रंथी में होती है
614. मानव शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथी यकृत है
615. मानव शरीर में कुल ६ अन्तः स्त्रावी ग्रंथियां है
616. मानव शरीर का सबसे बड़ा अंग-यकृत है
617. कोशिका में प्रोटीन संश्लेपण राइबोसोम करता है
618. मानव शरीर का सामान्य तापमान ६८.५ फा० है
619. मानव शरीर की सबसे बड़ी अन्तः स्त्रावी ग्रन्थि थायराइड है
620. आकस्मिक ग्रंथि एड्रिनल ग्रंथि कहते है
621. मानव शरीर की सबसे छोटी अन्तः स्त्रावी ग्रन्थि पिनीयल है
622. हार्मोन्स एक प्रकार का प्रोटीन है
623. मानव शरीर में ६५ प्रतिशत पानी होता है
624. पिट्युटरी ग्रन्थि हार्मोन स्त्रावित करता है
625. रक्त में प्लाज्मा ५० से ६० प्रतिशत होता है
626. प्लाज्मा में पानी ६१ प्रतिशत होता है
627. १ मि० लि० रक्त में ५० से ६० लाख रक्त कणिकाएँ होती है
628. १ मि० लि० रक्त में ५००० से १०००० श्वेत रक्त कणिकाएँ होती है
629. १ मि० लि० रक्त में १.५० से ५ लाख प्लैट्लेट्स होती है
630. लाल रक्त कणिकाओं का निर्माण अस्थिमज्जा में होता है
631. लाल रक्त कणिकाओ को इरीधेसाइट भी कहा जाता है
632. लाल रक्त कणिकाओं की मृत्यु यकृत और प्लीहा में होती है
633. श्वेत रक्त कणिकाओं का र्निमाण मानव शरीर में अस्थि मज्जा, लिम्फ नोट, प्लीहा में होता है
634. रक्त में लाल रक्त कण और श्वेत रक्त कण का अनुपात ६००:१ का होता है'
635. श्वेत रक्त फण का प्रमुख कार्य है रोगाणुओं को खत्म करना
636. अग्नाशय अन्तःस्त्रावी और वहिः स्त्राव दोनों है
637. पिनियल ग्रंथि का यौवनारम्भ के समय तक अपक्षय हो जाता है
638. यकृत अन्तःस्त्रावी ग्रंन्धि नही है
639. पिट्युटरी ग्रन्थि मास्टर ग्रन्थि कहलाती है
640. मनुष्य १ मिनट में १४ से १८ बार सांस लेता है
641. वृक्क की कार्यात्मक इकाई नेफान है
642. मस्तिष्क का सबसे यड़ा भाग सेरेब्रम है
643. लाल रक्त कण का जीवन काल १२० दिन का होता है
644. श्वत रक्त कण का जीनव २ से ५ दिन का होता है
645. मानव शरीर कर सामान्य रूधिर दाब १२०/८० एच० जी० होता है
646. इन्सुलिन हार्मोन बीटा कोशिकाओं से स्त्रावित होती है
647. मस्तिष्क का मेडूला ऑब्लांगेटा श्वसन तंत्र को नियंत्रित करता है
648. सेरेटोनिन, ऐंड्रॉफिन, डोपामाइन हार्मोन 'हैप्पी हार्मोन' के नाम से जाना जाता
649. आकस्मिक हार्मोन एड्रिनेलिन हार्मोन को कहते है
650. मेडिटेशन का आरम्भ कर्कोटिसोल हार्मोन का स्त्राव कम कर देता है
651. मेडिटेशन का आरम्भ डी.एच.ई.ए, जी.ए.वी.ए. ऐंड्रोफिन का स्त्राव बढ़ा देता है
652. ऐंडॉफिन हार्मोन 'हैप्पी हार्मोन' के नाम से जाना जाता है
653. मानव शरीर में सबसे बड़ी कोशिका न्युरान है
654. मानव शरीर में एड्रीनल ग्रन्यि कीडनी के ऊपर स्थित होती है
655. एड्रीनेलिन ग्रंथि को 'फाइट और फलाईट' प्रन्धि के नाम से जाना जाता है
656. मानव शरीर की सबसे बड़ी धमनी ओरटा है
657. मानव शरीर का सबसे बड़ा शिरा वेना-फेवा है
658. कालन छोरी आत का भाग नहीं है
659. रक्त में मौजूद प्लेटलेट्स का मुख्य काम है रक्तस्त्राव को रोकना
660. माइटोकॉन्ड्रिया को कोशिका का 'ऊर्जा गृह' कहा जाता है
661. आर० एन० ए० म्यूक्लिक एसिड है
662. डी० एन० ए० कोशीका के केन्द्रक में पाये जाते है
663. कोटेक्स और मेहूला किडनी के भाग है
664. लाइसोसोम को कोशिका का 'पाचन-उपकरण' कहा जाता है
665. ऐल्वीअलस श्वसन तंत्र का भाग है
666. तंत्रीकातंत्र के विकारों का अध्ययन करने वाला विज्ञान न्यूरापैथोलॉजी कहा जाता है
667. जीवकोशिका का अध्ययन करने वाला विज्ञान साइटोलॉजी कहलाता है
668. विश्राम एवे पाचन अनुक्रिया का सेवेय तंत्रिका तंत्र के परानुकम्पी तंत्रिका तंत्र से है
669. मनुष्य में बड़ी आत की लम्बाई १.५ मी० है
670. मानव में कुल गुण सूत्र ४६ होत है
671. मधुमेह रोग में अग्नाशय, गुर्दे, आँखे प्रभावित होती है
672. पोलियो रोग मानव शरीर के तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है
673. राइयोसोम को कोशिका की भ्राटीन फैक्ट्री कहा जाता है
674. मनुष्य में पीनियल ग्रन्धि धर्ष की आयु में घटनी शुरू हो जाती है
675. थाइमोसिन हार्मोन बाइमस ग्रन्थि के द्वारा स्त्रायित होता है
676. हार्मोन्स एक प्रकार का प्रोटीन है, कार्बनिक पदार्थ है, यह शरीर की फियाओं को बढ़ा देता है, इसका उत्पादन बहुत ही सूक्ष्म मात्रा में होता है
677. हृदय से विभीन्न अंगों में शुद्ध रक्त ओर्टा ले जाता है
678. सोमोटोट्रोपिन वृद्धि हार्मोन है
679. लाल रक्त कणिका का कार्य है आक्सीजन का संचार करना है
679. मानव का पी०एच० ७.४ होता है
680. एन्जाइम सहायक होते है भोजन पचाने में
681. सभी एप्जााइम प्रोटीन होते है
682. कार्टीलेज एक प्रकार का कनेक्टीव टिसु है
683. एड्रिनल ग्रन्धि जोड़ों के रूप में पायी जाती है
684. म्युरान तंत्रिका तंत्र की इकाई है
685. पिट्यूटरी ग्रधि मस्तिस्क के हाइपोथैलमस से जुड़ी होती है
686. ग्लुकोज मानव शरीर के लिवर में संग्रहीत होता है
687. रक्तबाप और हृदय स्पर्दन की मस्तिस्क का मेंडूला नियंत्रित करता है
688. स्टीराइड, अमीन्स, प्रोटीन हार्मोन्स है
689. व्ययस्क व्यक्ति में नष्ज की गति ७० प्रति मिनट होती है
690. जन्म के समय बच्चे के नब्ज की गति १४० प्रति मिनट होती है
691. व्यायाम करने पर थकान होने का कारण शरीर में लैक्टिक एसिड का संग्रहित हाना है
692. शरीर में हार्मोन्स की वृद्धि प्रजनन किया को नियंत्रित करती है, शारीरिक क्रिया में वृद्धि, हार्मोन और मिनरल को संग्रहित करता है
693. ग्लुकॉज को लिवर में संग्रहीत करने में इन्यूलिन सहायक होता है
694. वृद्धि हार्मान थाइमस ग्रथि द्वारा स्त्रावित होता है
695. भोजन पाचन किया मुँह में आंरम्भ हो जाती है
696. ओ रक्त वाता समूह 'सर्वदाता' कहलाता है
697. हड्डी जो मस्तिष्क की रक्षा करती है केनियम कहलाती है।
698. विटामिन के रक्त का चक्का जमाने में सहायता करता है
699. प्लीहा, लिम्फ, टान्सिल आदि लंसीका तंत्र के अंग है
700. मानव खोपड़ी की हड्डीयों के बीच स्यूचर्स नामक जोड़ा पाया जाता है
701. मानव शरीर में हिमाग्लोबीन का कार्य है ऑक्सिजन का संचरण करना
702.
703. छोटी आंत में मौजूद अंगुलीनुमा आकृतियां जो पचे हुए भोजन के रस को सोखती है विलयी कहलाती है
704. एक व्ययस्क मनुष्य में ५-६ ली० रक्त होता है
705. रिव्स हड्डियां फेफड़े की रक्षा करती है
706. लक्रिमल ग्रन्थियों से आंसू उत्पन्न होते है
707. लसिका तंत्र मानव शरीर में रोगाणुओं को नष्ट करता है
708. नवजात शिशु में ३०० हड्डियां होती है
709. कार्टीलेज एक ऊतक है
710. अग्नाशयं रक्त में ग्लुकोज के स्तर को सामान्य बनाये रखने में सहायकें है
711. मानव 'शरीर में सबसे छोटी हड्डी कान में पायी जाती है
712. मलेरिया में यकृत, प्लीहा अंग प्रभावित होता है
713. शरीर में रक्त को शुद्ध करने एवं छानने का कार्य गुर्दा करता है
714. प्लैटलेट्स रक्त का थक्का जमाने में सहायक है
715. मानव शरीर में नाखुन कैरेटिन से बने होते है
716. मानव हृदय ४ कोष्ठों में बंटा होता है
717. जैविक घड़ी को सरकेडियन ताल, बायोलॉजीकल क्लाक, बॉडी क्लॉक आदि नाम से जाना जाता है
718. घुटनों में हिन्ज हड्डी का जोड पाया जाता है
719. पेप्सिन,' ट्रेप्सिन, हिपेरिन एन्जाइम है
720. वृक्क का प्रमुख कार्य शरीर से अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालना है
721. यकृत में विटामिन ए, के, डी संग्रहित हातो है
722. मनुष्य में श्वसन किया के दौरान वायु का आदान प्रदान अल्वियलइ अंग के द्वारा होता है
723. टीबिया हड्डी मानव शरीर के पैरों में पायी जाती है
724. हिमाग्लोबीन का मुख्य घटक है लोहा
725. मनुष्य के कान में कुल ६ हड्डीयां पायी जाती है
726. मनुष्य के कपाल में कुल ८ हड्डीयां पायी जाती है
727. मनुष्य के मेटाफार्पलस में कुल १० हड्डीयां पायी जाती है
728. मनुष्य के मेटाकार्पलस हड्डीयां हाथों में पायी जाती है
729. साकेडियन ताल के अध्ययन को कोनोबायोलाजी कहा जाता है
730. लासीका तंत्र श्वेत रक्त कोशिकाओं का परिवहन करता है, ऊतकों सक ताज्यपदार्थ दूर करता है. पाचन किया के दौरान वसा अम्लों का निर्माण करता है
731. यकृत वसा, लौहतत्व, विटामिन को संग्रहित करता है
732. स्कर्वी रोग एस्कार्टीक अम्ल की कमी से होता है
733. मानव शरीर में छोटी आत की लम्बाई ६-७ मीटर होता है
734. रिब्स हड्डियों, पसलियों में कुल २४ हड्डीया पायी जाती है
735. मानव शरीर की सबसे वही हड्डी है फिमर
736. शरीर के भुख प्यास आर तापमान को मस्तिष्क का हाइपोथैलेमस नियंत्रित करता है
737. शरीर मे कोशिकाओं या ऊतकों की मृत्यु कहलाती है नेकोसिस
738. शरीर में जल की कमी से र्निजलीकरण या डिहाईड्रेसन होता है
739. प्रजनन तंत्र में काउपर ग्रन्थियाँ पायी जाती है
740. दृष्टिी, श्रवण, अधिगम एवं मनोभावों को मस्तिष्क का सेरिब्रम भाग नियंत्रित करता है
741. कशेल्का दण्ड कुल ३३ हड्डियों से जुडकर यना होता है
742. काक्सिीकस में कुल ४ कशेरूकाऐं होती है
743. स्टर्नम हड्डी छाती में पायी जाती है
744. गुर्दे का कार्य सोडियम को उचितमात्रा में बनाये रखना, पानी को उचित मात्रा में बनाए रखना एवं शरीर में रकाचाप का नियंत्रण
745. हड्डीयां कैल्सियम, फॉस्फोरस, कोलेजन से यनी होती है
746. इरायचापाइटिन हार्मोन लाल रक्त कोशिकाओं के निर्माण में सहायता करता है
747. टिप्सिन एन्जाइम पोटीन पाचन में सहायता करता है
748. शरीर का सबसे कठोर भाग इनूमल होता है
749. पलाग्रा रोग नियासिन बी-३ की कमी से होता है
750. ए०वी० रक्त समूह सर्वाग्राही होता है
751. लंची हड्डीया पायी जाती है हार्यों एवं पैरी में
752 . मानव शरीर में सबसे छोटी श्वेत रक्त कोशिका है लिम्फोसाइड
753. मानव शरीर में सबसे बड़ी श्वेत रक्त कोशिका है मोनोसाइड
754 . मानव शरीर में रक्त कोशिकाओं की कमी होना कहलाता है ल्यूकोसाइटोसीस
755 . श्वेत रक्त कोशिकाएं लाल रक्त कोशिकाओं से बड़ी होती है
756 . श्वेत रक्त कोशिकाएं रक्त और लसीका प्रणाली में पायी जाती है
757 . श्वेत रक्त कोशिकाओं का जीवन काल कुछ दिनों का होता है
758 . एल्यूमिन, ग्लोवूलिन, फिवरीनोजिन आदि प्लाज्मा प्रोटीन है
759 . कैरेटिन है एक प्रकार का ऊतक
760 . विटामिन डी० कहलाता है केल्सीफेराल
761 . मोतियाबिंद का कारण है विटामिन ए० की कमी, परार्बगनी विकिरण, अनुवाशिकला
762 . टिविया, फियुला, फीमर हड्डिया पैरों में पायी जाती है
763 . चेहरे में कुल १४ हड्डियां पायी जाती है
764 . अनुवांशिकता का उत्परिर्वतन सिद्धान्त ह्यूगो डी ग्रीज ने दिया था
765 . हैजा, रेवीज, निमोनिया आदि रोग जिवाणु के है
766 . प्लेग रोग का कारण जिवाणु नहीं है
767 . मेनिन्जाइटिस रोग का कारण विषाणु नहीं है
768 . सिफिल्स रोग का कारण प्रोटोजोअन नहीं है
769 . मेनिन्जाइटिस रोग मस्तिष्क को प्रभावित करता है
770 . हैजा रोग आंत को प्रभावित करता है
771 . अमीबियेसीस रोग शरीर में बड़ी आत को प्रभावित करता है
772. चपटी हड्डीयाँ पसलियों में कपाल में अंसफलक में पायी जाती है
773 . थाइमोसिन हार्मोन थाइराइड ग्रन्धि के द्वारा स्त्रावित नहीं होता है
774 . रिकेंट्स हड्डियों का रोग है
775 . एक हड्डि से दुसरी हड्डि लिगामेण्ट द्वारा जुड़ा होती है
776 . मांसपेशियां परस्पर टेण्डन के माध्यम से जुड़ी होती है
777 . चल संधि एक प्रकार का थॉल एवं साकेट, धुरीय, फब्जा संधि का प्रकार है
778. अचल संधि के चीच में कार्टिलेज नही हाते, इसमें किसी प्रकार की गति नहीं होती है, खोपड़ी और जबड़े के जोड अचल संधि है
779. मानव शरीर में लगभग ६०० मांसपेशियां होती है
780. अनैच्छिक पेशियां पाई जाती है आहारनाल में, मुत्राशय में, रक्तवाहिनियों में
781 . मानव शरीर की सबसे बडी मांसपेशी है स्टेपिडियम
782 . मानव शरीर की सबसे छोटी मांसपेशी कान में पायी जाती है
783. कंकाल संचियों एवं स्नायुवों का अध्ययन सिन्डरमालाजी कहलाता है
784 . रेखित मांसपेशिया कंकाल पेशिया कहलाती है यह हड्डियों से जुड़ी होती है ये बेलनाकार होती है
785 . अरेखित मांसपेशिया चिकनी पुशिया कहलाती है, इनमें थकान का अनुभव नहीं होता, इनफी कोशिकाओं में एक ही केन्द्रक होता है
786 . सर्वांगासन, नीला रंग उपचार, फलों के रस का संवन विशुद्धि चक को पुष्ट करने में सहायक है
787 . अश्विनी किया अपान वायु को स्थिर करने में सहायक है
788 . व्यान प्राण वायु मानव शरीर के सभी अंगों में व्याप्त है
789 . नाग उप प्राण मानव शरीर के सभी अगों में व्याप्त है
790 . नाग उप प्राण मानव शरीर के सभी अगों की कार्यशीलता यनाए रखता है
791 . पित्त दोप से पिडित व्यक्ति को सूर्यभेदी प्राणयाम नहीं करना चाहिए
792 . धातु सेबंधित विकार उञ्जायी प्राणधाम के अभ्यास से दूर होने लगते ह
793 . शीतली प्राणायाम का अभ्यास मानसीक उत्तूजना, अम्लता, उच्च रक्तचाप को मिटाता है
794 . शीतली प्राणायाम के अभ्यास से कफ, पित्त जनित रोग दूर होते है
795. उज्जायी प्राणायाम का अभ्यास कफ, धातु, तंत्रीका तंत्र के विकारों को दूर करने में सहायक है
796 . भ्रामरी प्राणयाम अनिद्रा, चिन्ता, तनाव, कोथ को दूर करने में सहायक है
797 . विपरीत करणी मुद्रा जठराग्नि को उदिप्त करता है
798 . दीर्घ प्राणायाम के द्वारा आग्या धक को पुष्ट किया जा सकता है
799 . तनाव जनित रोग कहलात है अधिज व्याधि
800 . बिदोप-भोजन की प्रकृति से हमारे शरीर में दापों की प्रकृति बदलती रहती है, हमारे विचार और भावनाएं दोष की मात्रा को प्रभावित करते है
801. बात दोष, कफ और पित्त को गति प्रदान करता है
802. वात दोष का गुण है र्याकश, सुखा, हत्का
803. पित्त दोष का गुण है गर्म, तीखा, अम्लीय
804 . कफ दोष का गुण है-भारी, मंद, नर्म
805 . मानव शरीर में त्रिदोष है- रोग जनित दोष
806. शरीर में कफ की उपस्थिति वसा, उतक, कंठ, संयोजी उत्तक, कपाल, अस्थिबंद, लसीका सभी जगह होती है
807. शरीर में कफ के असंतुलन का कारण है अधिक खाना, ठढ़े एवं आई सीीन में रहना, शरीरिक क्रियाओं में कमी
808 . मेडिटेशन शरीर में त्रिदोषो का संतुलन बनाए रखने में सहायक है
809 . सृजनशीलता, इच्छा शक्ति पित्त दोप का गुण है
810 . वात प्रधान व्यक्ति का गुण है उर्जावान, शीघ्रकापित, सृजनशीज, लचिला, उत्सुक, अभिव्यक्तिशील, चुस्त सभी
811 . पित्त प्रधान व्यक्ति का गुण है बौचिक, तार्किक, साहसी
812 . कफ प्रधान व्यक्ति का गुण है लगाव, सुस्त, धर्म
813 . उष्ट्रासन, उज्जायी, कपालभाति किया शरीर में कफ का संतुलन बनाए रखती है
814 . पित्त की स्थिति शरीर में उंदर, आत, रक्त में होती है
815 . कफ दोष मस्तिष्क और शरीर को स्थिरता प्रदान करता है
816 . उड्डियान बंध और अग्निसार किया शरीर में कफ का संतुलन बनाए रखने में सहायक है
817 . कफ का संतुलन बनाए रखने में नौकासन, मयूरासन, कागासन सहायक है
818. शरीर में वात दोप के असंतुलन का लक्षण है वायु प्रकोप, अतिसक्रियता, चक्कराना, चिन्ता, कब्ज, रूखापन
819. महामुद्रा, पादहस्तासन, पवनमुक्तासन आदि यौगिक क्रियाए वात दोषों का संतुलन बनाए रखने में सहायक है
820. शरीर में पित्त दोष के असंतुलन का लक्षण है तीक्ष्णता, शुष्क त्वचा, घृणा, कोथ, नकसीर, पिलामुत्र
821. नाड़िशोधन, भ्रामरी, शीतली प्राणयाम शरीर में पित्त का संतुलन बनाए रखने में सहायक है
822. कर्णपिडासन, पश्चिमोत्तानासन, बनुरासन शरीर में पित्त का संतुलन बनाए रखने में सहायक है
823. आयुर्वेद के अनुसार पित्त दोप के ५ भेद है
824. साथक, पाचक, भाजक पित्त का प्रकार है
825. साथक पित्त हृदय में स्थित होता है
826. नेत्रों में आलोचक पित्त स्थित होता है
827. भाजक पित्त त्वचा में स्थित होता है
828. पीलिया रोग पाचक पित्त के असंतुलन से उत्पन्न होता है
829. आयुर्वेद के अनुसार कफ दोष के ५ मेद है
830. हड्डी जोड़ों में श्लेपक कफ पाया जाता है
831. अवलम्बक कफ के असंतुलन से मंदता एवं आलस्य उत्पन्न होता है
832. आयुर्वेद में वर्णीत त्रयोस्तम्भ का अंग आहार, निद्रा, ब्रम्हचर्य है
833. आयुर्वेद शब्द का अर्थ है जीवन का ज्ञान
834. महर्षि सुश्रुत के अनुसार भोजन २१ प्रकार का होता है
835. आयुर्वेद अथवर्वेद का उपवेद है
836. महर्षि कश्यप के अनुसारं भोजन ५ प्रकार का होता है
837. आहार विधि के ८ सिद्धान्तो का उल्लेख चरक संहिता में किया गया है
838. धन्वतरि, चवन्य, दिवोदास आदि आयुर्वेद के आचार्य थे
839. आहार विधि का पहला सिद्धान्त है प्रकृति
840. महर्षि चरक के अनुसार भोजन १२ प्रकार का होता है
841. आयुर्वेद के देवता है धन्वतरि
842. आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति की विशेषता है-जिर्ण रागों के उपचार में सहायक है, चिकित्सा पद्धति प्रकृति के समीप है
843. आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति शारीरिक एवं मानसीक विकारों के उपचार में सहायक है
844. मानव शारीर में कुल ७ धातुए होती है
845. प्रकृति के सभी पदार्थों में कुल २० प्रकार के गुण पाये जाते है
846. केन्द्रीय औषधि अनुसंधान संस्थान लखनऊ में स्थित है
847. संग्रधरा ग्रन्थ का संबंध मुख्य रूप से राजस्थान से है
848. सुश्रुत संहिता में रोग, औपधि, सर्जरी विषय का वर्णन मिलता है
849. अधिज व्याधि का अर्थ है मानसीक स्तर पर होने वाले विकार
850. अधिज व्याधि संबंध है मनोमय कोश से
851. अनाधिज व्याधि का अर्थ है शारीरिक रोग
852. अनाधिज व्याधि का संबंध मुख्य रूप से अन्नमय कोश से है
Comments
Post a Comment