01. प्राचीन भारत के इतिहास को जानने के साधन (पुरातात्विक साधन)
01. प्राचीन भारत के इतिहास को जानने के साधन (पुरातात्विक साधन)
★ प्राचीन भारतीय इतिहास के युगों को अंधकार का युग कहा जाता है।
★ क्योंकि सिकंदर सेपूर्व भारत के इतिहास की किसी महत्वपूर्ण घटना की तिथि निश्चित नहीं की जा सकती –एलफिंस्टन
प्राचीन भारतीय इतिहास को जानने के साधन
1. पुरातात्विक साधन
2. विदेशी यात्रियों की टिप्पणियां
3. धार्मिक साधन अर्थात धार्मिक साहित्य
पुरातात्विक साधन या सामग्री
पुरातत्व विज्ञान अर्थात आर्कियोलॉजी –> वह पढ़ती जिसमें प्राचीन काल के अवशेषों का अध्ययन किया जाता है पुरातत्व विज्ञान या आर्कियोलॉजी कहलाती है।
पुरातात्विक विरासत –> पुरातत्व उत्खनन से प्राप्त प्राचीन अवशेषों को पुरातात्विक विरासत कहते हैं। जैसे भवन, मूर्तियां, सिक्के, अभिलेख, स्तूप आदि
★ हमें दक्षिण भारत में पठारों के मंदिर तथा पूर्वी भारत में ईटों के विहार आज भी देखने को मिल जाते हैं । जो भवन निर्माण के किसी युग की याद दिलाते हैं। लेकिन, अधिकांश भवनों के अवशेष अनेकानेक टीलों के नीचे दबे हैं।
टीले –> भूमि के उस उभरे हुए भाग को कहते है जिसके नीचे पुरानी वृस्तियों के अवशेष ढक रहते है। ये कई प्रकार के होते है
1. एक सास्कृतिक टीले –> जिस टीले में सर्वत्र एक ही संस्कृति दिखाई देती है।
2. मुख्य संस्कृतिक टीले –> जिस टीले में एक मुख्य संस्कृति होती है जबकि अन्य गोण। यह गोण संस्कृति पूर्वकाल / उत्तर काल की हो सकती हैं। जो महत्व नहीं रखतीं।
3. बहु सांस्कृतिक टीले –> वे टीले जिसमें उत्तरोत्तर अनेक संस्कृतियों के अवशेष मिलते हैं।
टीलो की खुदाई (उत्खनन) दो प्रकार से होती है लम्बवत रूप में और क्षैतिज रूप में
लम्बवत रूप में उत्खनन –> इस उत्खनन में ऊपर से नीचे लंबी-लंबी खुदाई करके विभिन्न संस्कृति का रूप देखा जा सकता है।
क्षैतिज उत्खनन –> यह सारे टीले या वृहत (बहुत बड़े) भाग की खुदाई है। इसमें संस्कृति का पूर्ण आभास मिल जाता है। यह बहुत खर्चीली होती है।
टीलो के उत्खनन में पुरावशेष
टीलों में पुरावशेष विभिन्न अनुपातों मे सुरशित है।
1. सूखी जलवायु के कारण प० उ० प्रदेश, राजस्थान और पश्चिमोत्तर भारत के अवशेष अधिक सुरक्षित रहे।
2. आद्र जलवायु के कारण मध्य गंगा घाटी तथा डेलटाई क्षेत्रों में लोहे के ओजार भी संक्षारित हो जाते हैं, तथा कच्ची मिटटी या ईंटों के अवशेषों का नजर आना कठिन होता है। पश्चिमोत्तर भारत के उत्खननों से 250 ई.पू. के नगरों का पता चला है।
दक्षिण भारत के कुछ लोग मृत व्यक्ति के शव के साथ औजार, हथियार मिट्टी के वर्तन आदि चीजे भी कब्र में रख देते थे। और इसके ऊपर एक धेरे मे वडे-बडे पत्थरों को खड़ा कर देते थे ऐसे स्मारक महापाषाण मेगालिथ कहलाते थे।
पुराने टीलो का क्रमिक उत्खनन करके प्राचीन काल के भौतिक जीवन के बारे में जानकारी प्राप्त करना पुरातत्व कहलाता है।
उत्खनन व गवेषणा से प्राप्त अवशेषों का वैज्ञानिक परिक्षण.
रेडियो कार्बन डेटिंग –> जीवित वस्तुओं में कार्बन-12 तथा कार्बन-14 लेते रहते हैं। जीवित जीवो में दोनों कार्बन निश्चित अनुपात में होते है। कार्बन-12 एक सामान्य कार्बन है जबकि कार्बन 14 एक रेडियो एक्टिव कार्बन है, जो एक निश्चित समय के बाद क्षय होता रहता है। पदार्थ के क्षय होने की इस प्रक्रिया को रेडियोएक्टिविटी कहते हैं।
मगर निष्प्राण जीव दोनों ही प्रकार के कार्बन लेना बन्द कर देता है। कार्बन 12 एक सामान्य कार्बन होने के कारण ज्यों का त्यों बना रहता है, मगर कार्बन-14 का क्षय शुरू हो जाता है ।
कार्बन-14 की माप के आधार पर समय निर्धारण की गणना की जाती है। क्योंकि कार्बन-14 लगभग 5568 वर्ष से आधा क्षीण हो जाता है । रेडियो एक्टिव पदार्थ के इस काल को अर्थ-जीवन काल कहते हैं। लकड़ी के कोयले को उपयुक्त माना जाता है।
★ इसी आधार पर पराग-कणों का विश्लेषण करके जल-वायु व वनस्पति के इतिहास का अध्ययन किया जाता है। इसी आधार पर कहा जाता है कि राजस्थान व कश्मीर में 7000 से 6000 ई. पू. में कृषि का प्रचलन था।
★ धातु की शिल्प वस्तुओं की प्रकृति तथा घटकों का विश्लेषण करके धातुविज्ञान के विकास की अवस्थाओं का पता लगाया जाता है।
★ पशुओं की हड्डियों का अध्ययन करके हम यह पता लगा सकते हैं। वे कौन से पशु पालते थे तथा उनसे क्या-क्या काम लेते थे।
विभिन्न पुरातात्विक सामग्री
1- अभिलेख –> पाषाणशिलाओं, स्तंभों, ताम्रपात्रों, दीवारो, मुद्राओं एवं प्रतिमाओं पर उत्खनित या लिखित लेखों को अभिलेख कहते है।
इनके अध्ययन को पुरालेखाशास्त्र तथा दस्तावेजो या अभिलेखों की लिपि के अध्ययन का पुरालिपिशास्त्र कहते है।
★ सर्वाधिक प्राचीन अभिलेख 2500ई.पू. की हड़प्पा कालीन मुहरों पर है। ये भावचित्रातमक लिपि में तथा अपठनीय है।
★ सबसे अधिक अभिलेख मैसूर के मुख्य पुरालेखाशास्त्री के कार्यालय में संग्रहीत हैं।
★ प्राचीन पठनीय अभिलेख अशोक के हैं जो "प्राकृत" भाषा में हैं। और सबसे प्राचीन है। अधिकांश प्रकृत अभिलेख बृह्मीलिपि में है। जो बाएं से दाएं लिखी जाती थी, और ये ई.पू. तीसरी शदी के है।
★ मास्की तथा गुज्जरी (म.प्र.) से प्राप्त अभिलेख में अशोक को स्पष्ट रूप में देवताओं का प्रिय या ' प्रियदर्शी " कहा है।
★ पश्चिमोत्तर भारत के अभिलेख खरोष्ठी लिपि में है जो दायें से बाये लिख लिखी जाती थी।
★ पाकिस्तानी व अफगानिस्तानी अभिलेख यूनानी व आमराईक लिपि में है।
★ अभिलेखों में संस्कृत भाषा ई. दूसरी शदी में मिलती है। प्रादेशिक भाषाओं का प्रयोग नौवीं-दसवीं शदी में प्रयुक्त होने लगी तथा शैलियों में भी अन्तर आ गया।
★ सबसे प्राचीन पठनीय अभिलेख ईयू तीसरी सदी के अशोक के है जिन्हे 1837 में सर्वप्रथम जेम्स प्रिशेप ने पढ़ा था जो बंगाल में ईस्ट इण्डिया कम्पनी में सेवारत थे।
★ फिरोज शाह तुगलक को अशोक् के दो अभिलेख क्रमशः मेरठ (उ.प्र.) व टोपरा (हरियाणा) मे मिले थे। जिन्हें वह दिल्ली ले आया था।
विषय के आधार पर अभिलेखो के प्रकार
प्रथम –> प्रकार के सामाजिक, आर्थिक व प्रशासनिक राज्योदेश और निर्णयों की सूची - अशोक अभिलेब
द्वितीय –> प्रकार के अनुष्ठानिक अभिलेख है। जिन्हें विभिन्न मतानुयायियों ने स्तम्भों, प्रस्तर फलको, मंदिरों व प्रतिमाओं पर उत्कीर्ण कराया – बौद्ध, जैन, शेव अभिलेख आदि
तृतीय –> वे लेख जिनमें राजाओं की कीर्तियों का वर्णन हे परंतु दोषों का नहीं।
निमर्माण के आधार पर अभिलेखों के प्रकार
1. स्तम्भलेख
अशोक - स्तम्भलेख
जैनियों - दीपस्तम्भलेख
वैष्णव – गरुड ध्वज स्तम्भ
राजपूतों - कीर्ति स्तम्भ
चंद्रगुप्त--महरौली स्तंभ
2. गुह्य लेख
अशोक - वराहगुह्यलेख (बरार)
दशरथ - नागार्जुनी लेख
सातवाहनों – नासिक, नानाघाट, व कार्ली के लेख
3. प्रकार अभिलेख
मंदिरों या स्तूपों के चारों ओर बने प्राचीरों के लेख, जैसे भारहुतस्तूप पर शगुनराज राज लिखा है अतः शुंग राजाओं ने बनवाए।
4. प्रशस्ति अभिलेख
खारवेल - हाथी गुम्फा
शक क्षत्रप रूद्रदामन – गिरनार
सातवाहननरेश पुलगावी – नासिक गुह्यलेख
समुंद्र गुप्त - प्रयाग स्तम्भलेख (हरिषेण)
मालवा राज यशोवमन - मन्दसौर
चालुक्य पुलकेश्नन द्वितीय - ऐहोल अभिलेख (रविकीर्ति)
प्रतिहार नरेश भोज - ग्वालियर
स्कन्द गुप्त - भीतरी तथा जूनागढ़ अभिलेख
बंगाल शासक विजया सेन - देववाड़ा
गैर राजकीय अभिलेख
हेलियोडोरस (यत्वनराजदूत) – वेशनगर विदिसा के गरूड़ स्तम्भ ई.पू. II भागवत प्रमाण विकास के
हुणराज तोरम्ण का लेख एरण (मध्य प्रदेश में मिली वाराह प्रतिमा पर अंकित है।
भूमि अनुदान पत्र/ ताम्र पत्र
ये तांबे की चादरों पर लिखे हैं। इनमे राजाओं और सामन्तों द्वारा भिक्षुओं, ब्राहमणों, मंदिरों, विहार जगीर दारो तथा जमींदारों को दी गई भूमि, गांव व राजस्व दान का विवरण मिलता है। जो प्रकृत, संस्कृत, तमिल, तेलुगु आदि भाषाओं में मिलते हो
भारी मात्रा में भूमि अनुदान पत्र पूर्व मध्यकालीन भारत (600-1200 ई.) के है। जो इस काल में सामन्तीय व्यवस्था स्थापना के प्रमाण है।
विदेशो से प्राप्त अभिलेखों में ऐशिया माईनर में वेग जकोई स्थान पर ई. पू. 1400 का संधिपत्र अभिलेख द्वन्दात्मक समास में लिखा मिला है। जिसमे मित्र-वरूण, इंद्र व नासत्य नामक वैदिक देवताओं के नाम उत्कीर्ण है।
मिस के तेलुअल-अमीनों में की तख्त्तियों में बेबिलोनियों के कुछ शासको के नाम उत्कीर्ण है। जो ईरान व भारत के आर्य शासकों के समान है।
पार्सिपोलिस के बेहिस्तून अभिलेख से ज्ञात होता है कि ईरानी सम्राट दारा प्रथम ने सिंधु नदी की घाटी पर अधिकार कर लिया था।
विशेष => मौर्य, मौयोत्तर के गुप्त काल के अधिकांश अभिलेख " कार्पस इन्सक्रिप्श ओनम इंडिकारम " नामक ग्रन्थ माला में संकलित है।
3. शिलालेख
पत्थरों या चरटानों पर लिखे लेख
अशोक के शिलालेख
पुष्यमित्र शुग का अयोध्या लेख
खारवेल का हाथी गुम्फा
रूद्रदामन - जूनागढ
2. मुद्राएं / सिक्के
★ प्रचलन 6-5वी ई.पू.में अनेक सिक्के जमीन पर मिले हैं और अधिकांश खुदाई से प्राप्त हुए हैं । सिक्कों के अध्ययन को मुद्रा शास्त्र कहते हैं । इनके अध्ययन से ही हम 206 ई.पू. से 300 ई. तक का इतिहास जान पाते हैं। इससे पूर्व के सिक्को पर लेख नहीं है। उनपर चिन्ह बने हैं जिनका ठीक-ठीक ज्ञान नहीं है।
★ सिक्के धातुधन या धातु मुद्रा के रूप में चलते थे। दान-दक्षिणा, क्रय-विक्रय तथा वेतन मजदूरी के भुगतान में इनका उपयोग किया जाता था।
★ भारत के प्राचीनतम सिक्के "आहत सिक्के" हैं । इनके चिन्हों का अभी तक ठीक ठीक ज्ञान नहीं है।
★ वैकिंग प्रणाली न होने के कारण लोग पैसा मिट्टी के बर्तनों में निधि के रूप में जमा रखते थे। इन निधियों के सिक्के भी हमोर इतिहास ज्ञान में सहायक बनते हैं।
★ उन हिन्द-यवन शासको का इतिहास निर्माण जो ई. पू. 2 शदी से प्रथम शदी तक में भारत में शासनरत रहे।
★ सवार्धिक सिक्के मौर्योत्तर काल के हैं । जो सीसा, पोटीन, ताँवा, काँसे, चाँदी व सोने के हैं।
★ सर्वाधिक शुद्ध सोने के सिक्के कुषाण शासकों के थे।
★ सर्वाधिक मात्रा में स्वर्ण सिक्के गुप्त सम्राटों ने जारी किये थे।
★ राजाओं से अनुमति लेकर व्यापारियों तथा स्वर्णकारों की श्रेणियों (व्यापारिक संघों) ने अपने कुछ सिक्के चलाये थे।
★ मोर्योत्तर काल में प्रचुर मात्रा में सिक्के मिलना तथा गुप्तोत्तर काल में कम मात्रा में सिक्के मिलना वाणिज्य व्यापार के उत्थान व पतन का संकेत है।
★ धातु के दुकड़ो पर ठप्पा मारकर बनी बुद्ध कालीन आहत (पंच मार्कड) मुद्राओं पर पेड, मछली, साँड हाथी व अर्धचन्द्र बने है।
★ कनिष्क के सिक्के कनिष्क के बौद्ध होने का प्रमाण देते हैं । क्योंकि उस पर बुद्ध आकृति बनी या बुद्ध (बुड्डो) लिखा है।
★ समुद्रगुप्त के सिक्कों पर यूप बना है। तथा कुछ पर "अश्वमेध पराक्रम "उत्कीर्ण है। साथ ही उसे वीणा बजाते दिखाया गया है। समुद्रगुप्त की उपाधि परम-भट्टारक-महाराजाधीराज थी
★ सातवाहन राज शातकर्णी के सिक्कों पर जलपोत उत्कीर्ण है। जिससे उसकी समुद्र विजय का अनुमान होता है।
★ चन्द्रगुप्त द्वितीय की व्याघ्र शैली (चाँदी) की मुद्राओं से उसके भारत के प. भारत के शको पर विजय प्रमाणित होती है।
इस्मारक व भवनों की शैली
प्राचीन काल के महलों व मंदिरों से वास्तुकला के विकास तथा शैली का ज्ञान होता है।
उत्तर भारत के मंदिरो की शैली – नागर
दक्षिण भारत की शैली – द्रविड़
दोनो शैलियों का मिश्रण – वेसरशैली
मंदिरों, स्तूपों व विहारों से तत्कालीन दक्षिण पूर्वी एशिया तथा मध्य ऐशिया की संस्कृति के प्रसार पर प्रकाश पड़ता है।
जावा के बोरोबुदुर मंदिर से नवी शताब्दी में महायान बौद्ध धर्म की लोकप्रियता प्रमाणित होती है।
4. मूर्तिकालाय
कुषाण कालीन कला पर विदेशी प्रभाव है । लेकिन कुषाण, गुप्त व सुप्तोत्तर काल की मूर्तियों से जन-साधारण की धार्मिक आस्था व मूर्तिकला का ज्ञान होता है।
गुप्तकालीन से स्वभाविकता परिलक्षित होती है ।
गुप्तोत्तर कालीन या सांकेतिकता अधिक है।
भारहुत, बोध गया, साँची व अमरावती की मूर्तियों से जन-सामान्य के यर्थाथ जीवन की झाँकी मिलती है।
खजुराहो और कौशाम्बी की मुर्तियां कामपक्ष से सम्बंधित हैं ।कई मूर्तियों के पीछे लेख खुदे हैं। जिन पर तिथियां भी अंकित हैं। कनिष्क कालीन बौद्ध मूर्तियां।
स्तूप –> एक गेला जिसमें बुद्ध के अधि अवशेष सुरक्षित होते हैं।
चेत्य –> बोद्ध मंदिर तथा बोद्ध भिक्षुओं के पूजा पाठ का स्थान।
बिहार –> बोद्ध भिक्षुओं के रहने का स्थान।
5. चित्रकला
अजन्ता गुफा में उत्कीर्ण "माता व शिशु" तथा मरणासन्न रानकुमारी के चित्र साश्वता, कलात्मकता तथा तत्कालीन जीवन को दर्शाते है।
6. अवशेष
पाकिस्तान में सोहन नदीघाटी उत्खनन से प्राप्त पुरापाषाण कालीन प्रात्तर ओजारों से ज्ञात होता है कि ई.पू. 4 लाख से 2 लाख वर्ष पूर्व यहां मानव रहता था।
10,000 से 6000 ई.पू. में वह कृषि, पशुपालन, कपडा बुनना, मिट्टी के वर्तन बनाने तथा चिकने ओजार बनाना सीखा लिया था।
गंगा यमुना के दोआब में काले और लाल मृदभाण्ड फिर चित्रित भूरे रंग के मृदभाण्ड प्राप्त हुए थे।
मोहन जोदड़ो (मृतका का टीला) में 500 से अधिक मुहरें प्राप्त हुई। बासढ़ (प.) वैशाली में मिट्टी की 274 मुहरे मिली हैं।
तक्षशिला के खण्डहर - कुषाण वंश के तथा पाटलीपुत्र की खुदाई मोर्यो के बारे में ज्ञान दिलाती है।
पिपरहवा (कपिलवस्तु) में खुदाई के दौरान, मिट्टी के बर्तनों और सेलखड़ी पान के ढक्कनों पर शिलालेख मिले हैं। इन शिलालेखों में बुद्ध के अवशेषों को उनके संबंधियों द्वारा समर्पित करने का उल्लेख है।
कोशाम्बी में उत्खनन से उदयन का राजप्रसाद तथा घोषिता राम नामक एक विहार मिला है।
अन्तरनी खेडा आदि खुदाई से ई. पू. 1000 के लगभग देश में लोहे के प्रयोग के प्रमाण मिलते हैं।
द. भारत में अरिकयेडु नामक स्थान की खुदाई में रोमन सिक्के, दीप का टुकड़ा, बर्तन आदि से ज्ञात हुआ कि ईशा की आरम्भ शताब्दी में रोम तथा द. भारत में व्यापारिक सम्बंध थे।
अशोक के अभिलेखो का वर्णन
अशोक के लेबो में 14 शिलालेख, 13 लघु शिलालेख, 6 स्तम्भलेख तथा 6 लघुस्तम्भ मिले हैं।
a) 14 शिलालेख
1. शहबाजगढ़ी – पेशावर
2. मनसेरा –हजारा
3. गिरनार (राज.) - जूनागढ (कठियावाड)
4. धौली- पुरी (उडीसा) इस राज्य के दीवान का राज्य स्थल तोसली के रूप में दिया।
5. कालसी - देहरादून (उ.प्र.)
6. जोगड़ – गंजाम (आ. प्र.
7. सापारा – थाना (महाराष्ट्र) - 8वे शिलालेख का खंडित भाग मिला
8. एरागुडी – कुर्नूल (तमिलनाडु)
b) 13. लघुशिलेखिका -
1. एरागुडी – कुर्नूल (तमिलनाडु)
2. ब्रहमगिरी – ब्रहमगिरी (कर्नाटक)
3. सिद्धपुर – कर्नाटक
4. जातिगा रामेश्वर – कर्नाटक
5. गोमिठ – मैसूर (कर्नाटक)
6. राजुलमंडगिरी – कुर्नूल (तमिलनाडु)
7. मास्की – रायपुर (आ.प्र.) - अशोक का व्यक्तिगत नाम
8. गुजरा – दतिया (म.प्र.) अशोक का व्यक्तिगत नाम
9. रुपनाथ – जबलपुर (म.प्र.)
10. भाबू (बैराट) – जपपुर (राजस्थान)
11. अहरार – मिर्जापुर (उ. प्र.)
12- सासाराम – सासाराम् (बिहार)
13. पालकिर्निंगंडु – मैसूर (कर्नाटक)
14- सारो मारो – सिहोर (म. प्र.)
c) 6. स्तम्भलेख
1 प्रयागस्तम्भ –> कौशाम्बी स्थित इस लेख को अकबर ने इलाहबाद में स्थापित कराया।
2. दिल्ली-टोपरा –> फिरोजशाह तुगलक द्वारा टोपरा से लाकर दिल्ली मे स्थापित कराया। इस पर सात अभिलेख उत्कीर्ण है।
3. दिल्ली-मेरठ –> फिरोज द्वारा मेरठ से दिल्ली लाया गया
4. रामपुरवा ·> चम्पारण विहार में स्थित
5. लोरिया - अरराज –> चम्पारण में
6 लोरिया - नन्दगढ –> चम्पारण में
d) 6. लघुस्तम्भलेख (अशोक की राजकीय घोषणाए)
1. सारनाथ –> वाराणसी (उ.प्र.)
2. सांची –> रायसेन (म.प्र.)
3. कौशाम्बी –> इलाहवाद
4. रूम्मनदेई –> नेपाल तराई
5. निग्लीवा –> बिग्लीसार (नेपाल)
6- रानी –> - इलाहबाद के किले में स्थित
शिलालेख मे उल्लेखित नरेश
नरेश समीकरण
1- अंतियोक 1 आखभनी ऐटियोकस - II
2. तुरमाय 2. टालेमी- फिलाडेल्फस (मिस्र)
3. आंतिकिनि 3. ऐंटीगोनस गोनाटस (लेसीडोनिया)
4. मक 4. मग (उ. अफ्रीका में सेरीन)
5. अलिक सुन्दर 5. एलेक्जेन्डर (एपीरस का यवन नरेश)
या एलेक्जेन्डर (कोरेन्थ का)
विशेष ज्ञान ज्ञात ऐतिहासिक तथ्य
प्रश्न
1. सेडोंक्रोटस का समीकरण चन्द्रमुप्त से
2. कलिंग विजय
3. नेपाल अशोक साम्राज्य का अंग था
4. सात जातियों का उल्लेख
5. राज्य कोष्टगार का विवरण
6. अटवी जातियों का उल्लेख
7. धम्म की व्याख्या
8. अशोक को बुद्ध शाक्य कहा
9. तृतीय बोद्ध संगीति का उल्लेख
10. अशोक का संघभेद के विरुद्ध आवेश
11. चन्द्रगुप्त प्रासाद विवेचन
12. स्फिटिक मजूषा
13. चमर ग्राहणी यक्षी
14. यवन आक्रमण का उल्लेख
15. सर्वज्ञयवन
16 सबसे प्राचीन अभिलेख
17. सबसे प्राचीन पठनीय अभिलेखो की भाषा
18. अशोक के अभिलेखों को पढ़ा था
उत्तर
1. विलियम जोन्स ने
2. 13वाँ शिलालेख
3. सारनाथ लेख व नेपाल की वंशावली
4. मैगस्थनीज
5. सोह गौरा, महास्थान अभिलेख
6. 13 वां शिलालेख
7. दूसरा व सातवां स्तंभ लेख
8. यास्की के लघु शिलालेख
9. दीपवंश, महावंश में
10 - सारनाथ व सांची के लघु स्तम्भ
11. एरियन
12. पिपरहवा स्तूप
13. दीदारगंज
14. गार्गी संहिता
15 महाभारत
16. हडापा कालीन है
17- प्राकृत
18 जेम्मत प्रिक्षेप 1837 में
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