मैं और मेरी दिल्ली | 01. मेरी दिल्ली

मैं और मेरी दिल्ली

प्राक्कथन

दिल्ली शब्द में न मालूम क्या आकर्षण भरा हुआ है कि जैसे ही यह सुनाई पड़ता है, कान एकदम खड़े हो जाते हैं और दिल उसकी बात सुनने को लालायित हो उठता है। शायद दिल्ली का असल नाम दिल्ली न होकर दिलही रहा हो और वास्तविकता भी यही है कि दिल्ली भारत का दिल कहलाने का गौरव रखती है। यों तो हिन्दुस्तान में अनेक ऐतिहासिक स्थान, तीर्थं एवं बाणिज्य केन्द्र हैं जो अपनी-अपनी जगह अपना गौरव रखते हैं, मगर दिल्ली की बात जुदा ही है। सबसे पहले इसे किसने और कहां आबाद किया, यह सदा ही इतिहासकारों की खोज का विषय रहेगा, मगर जो कुछ भी इतिहास के पन्नों से और रिवायात से पता चलता है, चंद नगरों को छोड़कर, जिनका जिक्र रामायण और महाभारत में आता है, दिल्ली से पुराना और कोई नगर नहीं है। यदि दिल्ली का प्रारम्भ महाभारत काल से मार्ने जब पांडवों ने खांडव वन दहन करके इंद्रप्रस्थ के नाम से इसे बसाया, तब भी इस बात को पांच हजार वर्ष व्यतीत हो गए। पांडवों ने भी न मालूम किस सायत में इसकी नींव रखी थी कि यहां की जमीन ने किसी को चैन से बैठने नहीं दिया। जो भी यहां का शासक बना, सुख की नींद सो न सका। यहां का तख्त सदा डगमगाता ही रहा । पुराने जमाने की बात को यदि जाने भी दें मगर अंग्रेजों जैसी शक्तिशाली सल्तनत भी, जिसमें सूरज कभी अस्त नहीं होता था, पूरे पैतीस वर्ष भी यहां टिक न सकी । इस धरती की सिफत ही यह है कि 
"जिनके महलों में हजारों रंग के फानूस थे
खाक उनकी कब्र पर है और निशां कुछ भी नहीं।"

बनना और बिगड़ जाना ही यहां का शेवा रहा है। क्या-क्या भयंकर जुल्म और गारतगरी के नजारे न देखे इस खत्ते जमीन ने जिनकी दास्तान सुनाने के लिए यहां के 11 मील लम्बे और 5 मील चौड़े क्षेत्र में फैले हुए खंडहर आज भी बेताब दिखाई देते हैं। न मालूम कितने लाख बेकस और बेजुबान लोगों के खून से यहां की जमीन तर हुई है और उनके सर घड़ से जुदा किए गए हैं।

इस दिल्ली की गुजरी दास्तान को जानने के लिए किसका दिल लालायित न होगा जिसमें एक बार नहीं सतरह बार उलट-फेर हुए और अब गणतंत्र राज्य की यह अठारहवीं दिल्ली है। तीन वार दिल्ली हिन्दू-काल में पलटी, बारह बार मुस्लिम काल में और दो बार ब्रिटिश काल में। दिल्ली की इस उलट-फेर पर अंग्रेजी भाषा में बहुत-सी पुस्तकें लिखी गई हैं; उर्दू में भी कई पुस्तकें मौजूद है, मगर हिन्दी में अभी तक कोई ऐसी पुस्तक देखने में नहीं आई जिससे यहां की यादगारों 

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का पता लग सके। इस कमी को पूरा करने के लिए 'दिल्ली की खोज' नाम की यह पुस्तक दिल्ली में रहने वालों और आाने वालों के हाथों में पेया की जा रही है ताकि इसके पन्नों पर एक निगाह डालकर यहां की गुजरी दास्तान की कुछ वाक-फियत हासिल की जा सके ।

इस पुस्तक को पांच भागों में बांटा गया है:

1. हिन्दू काल,

2. पठान काल,

3. मुगल काल,

4. ब्रिटिश काल,

5. स्वराज्य काल ।

कार स्टीफन के कथनानुसार अब से करीब पैतीस सौ वर्ष पूर्व महाराज युधिष्ठिर ने यमुना के पश्चिमी किनारे पर पांडव राज्य की नींव डाली थी और इंद्रप्रस्थ इसका नाम रखा था। महाराज युधिष्ठिर के तीस वंशजों ने इंद्रप्रस्थ पर राज्य किया। तत्पश्चात् राजद्रोही मंत्री विस्रवा ने राज्य पर कब्जा कर लिया। उसके वंशज पांच सौ वर्ष राज्य करते रहे। उसके बाद गौतम वंश ने राज्य किया जिनमें से सरूपदत्त ने, जो शायद कन्नौज राज्य का लेफ्टिनेंट था, एक शहर बसाया जिसे उसने अपने राजा डेलू के नाम पर दिल्ली नाम दिया। गौतम वंश के पश्चात धर्मघज या धरिधर के वंशजों ने राज्य किया जिसके अंतिम राजा को राजा कोल ही ने परास्त किया और वह उज्जैन के राजा से परास्त हुआ। उज्जैन के राजा से राज्य जोगियों के हाथ में चला गया जिसका राजा समुद्रपाल था। जोगियों के बाद अवध के राजा भैराइच भाए और उनके पश्चात फकीर वंश वाले। फकीर वंश से राज्य बेलावल सेन को मिला जिसे सिवालक के राजा देबसिह कोल ही ने परास्त किया। देवसिह को अनंग-पाल प्रथम ने परास्त करके दिल्ली पर कब्जा कर लिया और तोमर वंश की बुनि-याद डाली। अनंगपाल प्रथम ने 731 ई० में दिल्ली को फिर से बसाया। उसके वंशज अनंगपाल द्वितीय ने 1052 ई० में दिल्ली को फिर से आबाद किया। करीब 792 वर्ष तक दिल्ली उत्तरी भारत की राजधानी नहीं रही। यह काल उज्जैन के राजा विक्रमादित्य से लेकर, जिसने कहा जाता है कि दिल्ली पर कब्जा किया था, अनंगपाल द्वितीय के काल तक आता है।

चौहानों ने तोमर वंश के अंतिम राजा को 1151 ई० में परास्त किया और जब चौहानों का अंतिम राजा पृथ्वीराज, जिसे रायपिथौरा भी कहते हैं, उत्तर भारत का सर्वशक्तिशाली राजा बना तो उसने महरौली में रायपिचौरा का किला बनाया। अलिर 1191 ई० में दिल्ली को मुसलमानों ने कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा फतह कर लिया और हिन्दुओं का राज्य सदा के लिए समाप्त हो गया ।

कुतुबुद्दीन ऐबक के बाद खानदाने गुलामा के आठ बादशाह किला रायपिथौरा में हकूमत करते रहे। लेकिन बलवन के पोते कैकवाद ने, जो दसवां बादशाह था, किलोखड़ी को राजधानी बनाया जिसका नाम नया शहर पड़ा। जलालउद्दीन खिलजी के भतीजे अलाउद्दीन खिलजी ने, जो अपने चचा की जगह दिल्ली के तख्त पर बैठा,

प्राक्कवन

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कुछ असें किला रायपिवौरा में राज्य करके सीरी में एक किला बनाया और सीरी राजधानी बन गई। गयासुद्दीन तुगलक राजधानी को सीरी से हटा कर तुगलकाबाद ले गया। उसके लड़के ने आदिलाबाद आवाद किया और किला रायपिचौरा तथा सीरी को एक करके शहर का नाम जहांपनाह रखा। उसके बाद फीरोजशाह तुगलक ने फीरोजाबाद आबाद किया और उसे राजधानी बनाया। उसके बाद खानदाने सैयद आया। इसके पहले बादशाह ने खिजराबाद आबाद किया और उसके लड़के ने मुवारकाबाद। इसके बाद लोदी खानदान आया । बहलोल लोदी ने सीरी में हकूमत की मगर उसका लड़का सिकन्दर लोदी राजधानी को दिल्ली से आगरे ले गया। बाबर ने इसे परास्त किया और हुमायूं ने पुराने किले को दीनपनाह नाम देकर अपनी राजधानी बनाया। हुमायूं को शेरशाह सूरी ने परास्त किया और 14 वर्ष तक उसे हिन्दुस्तान में आने नहीं दिया। शेरशाह ने शेरगढ़ बनाया और दिल्ली का नाम शेरशाही रखा। 1546 ई० में उसके लड़के सलीम शाह ने यमुना के टापू पर सलीमगढ़ का किला बनाया और इसी नाम से राजधानी बनाई ।

1555 ई० में हुमायूं ने पठानों को पराजित किया मगर छः मास बाद दीनपनाह में उसकी मृत्यु हो गई। हुमायूं के बाद अकबर प्रथम आया। उसने आगरे को राजवानी बनाया। उसके लड़के जहांगीर ने भी आगरे को राजधानी रखा । उसकी मृत्यु के बाद शाहजहां तख्त पर बैठा। उसने दिल्ली को राजधानी बनाया जो अंग्रेजों के आने तक मुगलों की राजधानी रही। 11 सितम्बर, 1803 को अंग्रेजों ने दिल्ली फतह कर ली। अंग्रेजों ने पहले कलकत्ता को राजधानी बनाया मगर 1911 ई० से दिल्ली फिर से राजधानी बनी जहां अंग्रेज 15 अगस्त, 1947 तक राज्य करते रहे। 15 अगस्त से दिल्ली स्वतंत्र भारत की राजधानी बन गई ।

अभी हाल में कांगड़ी भाषा में लिखित एक राजावली नामक हस्तलिखित पुस्तक मिली है जिसमें महाभारत काल के पश्चात दिल्ली पर जितने राज्य-वंशों ने राज्य किया, उनका वर्णन दिया है। उसके अनुसार महाराज युधिष्ठिर के पश्चात उनके तीस वंशजों ने 1,745 वर्ष 2 मास और 2 दिन राज्य किया। इसके पश्चात मंत्री विस्रवा के चौदह वंशजों ने पांच सौ वर्ष पांच मास छः दिन राज्य किया। इसके पश्चात वीरबाहू के 16 वंशजों ने 420 वर्ष 10 मास 14 दिन राज्य किया । इसके पश्चात गुंडाहराय के नौ वंशजों ने 360 वर्ष 11 मास 13 दिन राज्य किया । इसके पश्चात समुद्रपाल राजा हुआ। इसके 16 वंशजों ने 405 वर्ष 5 मास 19 दिन राज्य किया। इसके पश्चात तलोकचंद राजा बना। इसके दस वंशजों ने 29 दिन राज्य किया। फिर हरतप्रेम राजा बना जिसके 11 मास 10 दिन राज्य किया । 119 वर्ष 10 मास चार वंशजों ने 49 वर्ष

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दिल्ली की खोज

हरतप्रेम वंश के अन्त पर बहीसेन राजा बना जिसके 12 वंशजों ने 158 वर्ष 9 मास 7 दिन राज्य किया। इसके पश्चात दीपसिंह भाया जिसके छः वंशजों ने 104 वर्ष 6 मास 24 दिन राज्य किया ।

दिल्ली पर अंतिम हिंदू राजपरिवार रायपिचौरा का था जिसे पृथ्वीराज कहते थे। वह अपने खानदान का अंतिम राजा था। पिथौरा वंश के पांच राजाओं ने 85 वर्ष 8 मास 23 दिन राज्य किया। इसके पीछे दिल्ली में मुसलमानों का राज्य आ गया जिनके 51 राजाओं ने 778 वर्ष 2 मास 11 दिन राज्य किया । 11 सितम्बर, 1803 से 14 अगस्त, 1947 तक अंग्रेजों ने राज्य किया ।

इतिहास की दृष्टि से दिल्ली में अट्ठारह बार परिवर्तन हुए जो निम्न प्रकार है:-

हिन्दू काल की तीन विल्ली

(1) पांडवों की दिल्ली - इंद्रप्रस्थ ।

(2) राजा अनंगपाल की दिल्ली - अनंगपुर अथवा अड़गपुर ।

(3) रायपियौरा की दिल्ली- महरौली ।

मुस्लिम काल की बारह दिल्ली

(1) किला रायपियौरा (महरौली) - गुलाम बादशाहों की दिल्ली ।

(2) किलोखड़ी या नया शहर-कैकवाद की दिल्ली ।

(3) सीरी- अलाउद्दीन खिलजी की दिल्ली ।

(4) तुगलकाबाद-गयासुद्दीन तुगलक की दिल्ली ।

(5) जहांपनाह-मोहम्मद आदिलशाह की दिल्ली ।

(6) फीरोजाबाद फीरोजशाह तुगलक की दिल्ली ।

(7) खिजराबाद-खिजरखां की दिल्ली।

(8) मुवारकाबाद अथवा कोटला मुबारकपुर मुबारकशाह की दिल्ली ।

(9) दीनपनाह - मुगल बादशाह हुमायूं की दिल्ली ।

(10) शेरगढ़-शेरशाह सूरी की दिल्ली।

(11) सलीमगढ़ सलीमशाह सूरी की दिल्ली ।

(12) शाहजहांबाद अथवा दिल्ली- मुगल सम्राट शाहजहां की दिल्ली ।

ब्रिटिश काल की वो दिल्ली

(1) सिविल लाइन्स कश्मीरी गेट से निकल कर जो इलाका आजादपुर तक चला गया है।

(2) नई दिल्ली ।

प्राक्कयत

स्वराज्य काल को दिल्ली

अंग्रेजों की बसाई नई दिल्ली ।

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हिन्दू काल की दिल्ली की बाकफियत कम-से-कम है। जो कुछ भी बाकफियत इतिहास और रिवायात से प्राप्त है, उसके अनुसार सबसे पहली दिल्ली यह है जिसे पांडवों ने सांडव बन जला कर इंद्रप्रस्थ नाम से बसाई ।

एक जमाना ऐसा भी आया कि हजार या आठ सौ वर्ष तक दिल्ली का नाम इतिहास के पन्नों से ही उड़ गया। इंद्रप्रस्थ के बाद दिल्ली की बाबत जब सुनने में आया तो वह राजपूतों की दूसरी दिल्ली थी। दिल्ली का असल इतिहास शुरू होता है पृथ्वीराज चौहान के काल से जब हिन्दुओं की तीसरी और आखरी दिल्ली बनी। यह बात 1200 ई० के करीब की है।

इसके बाद जब पृथ्वीराज को मोहम्मद गोरी ने परास्त कर दिया तो पठान काल शुरू हो जाता है। पठानों ने सवा तीन सौ वर्ष दिल्ली पर राज्य किया और आाठ बार दिल्ली बसाई। ये सदा एक दिल्ली को तोड़कर दूसरी बसाते रहे। इसलिए इन्होंने जो इमारतें बनाईं, उनमें अधिक सामग्री एक दिल्ली की दूसरी में लगती रही।

सोलहवीं सदी के शुरू में हिन्दुस्तान में मुगल आए। हुमायूं ने लोदियों को शिकस्त देकर दिल्ली अपने कब्जे में कर ली और एक नई दिल्ली की बुनियाद डाली जो मुगलों की पहली दिल्ली थी, मगर पठानों के सूरी खानदान ने फिर जोर पकड़ा और कुछ असें के लिए हुमायूं को हिन्दुस्तान से बाहर निकालकर पठानों की दो और दिल्लियों का इजाफा कर दिया। मगर ये बहुत असें टिक न सके और हुमायूं ने इन्हें शिकस्त देकर फिर से दिल्ली पर अपना कब्जा कर लिया ।

हुमायूं के बाद अकबर और जहांगीर दो बड़े मुगल सम्राट हुए जिन्होंने मुगलिय सल्तनत को हिन्दुस्तान में फैलाया। ये आगरे में राज्य करते रहे, लेकिन जहांगीर के बाद जब शाहजहां गद्दी पर बैठा तो उसने दिल्ली को फिर से राजधानी बना लिया और मौजूदा पुरानी दिल्ली को बसाया जो मुगलों की दूसरी दिल्ली थी। इसे सवा तीन सौ वर्ष हो गए ।

मुगलों की हकूमत 1857 ई० के गदर तक चली। चली तो वह असल में औरंग-जेब के लड़के बहादुरशाह प्रथम के जमाने तक; क्योंकि उसके बाद तो मुगलों का जवाल ही शुरू हो गया और मोहम्मदशाह के जमाने में नादिरशाह के आक्रमण से तो ऐसा कड़ा धक्का लगा कि फिर मुगल पनप न पाए। 1757 ई० और 1857 ई० के बीच मुगलों की सल्तनत नाममात्र की ही रह गई थी। ईस्ट इंडिया कम्पनी ने अपना पूरा अधिकार कायम कर लिया था। मसल मशहूर थी- "सल्तनत शाहआलम, अज दिल्ली ता पालम" अर्थात् आठ दस मील के घेरे में शाहआलम की सल्तनत

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दिल्ली की खोज

रह गई थी। आखिर 1857 ई० के गदर में मुगल सल्तनत का खात्मा हुआ और ईस्ट इंडिया कम्पनी की जगह अंग्रेजों की हकमत कायम हो गई।

1803 ई० से 1947 ई० तक करीब एक सौ चवालीस वर्ष अंग्रेजों ने हिन्दुस्तान पर पूरे जोर-शोर के साथ हकूमत की, मगर 1911 ई० में दिल्ली को राजधानी बना कर वह भी सुख की नींद सो न सके और दो दिल्लियों को बना कर वह भी हिंद से सदा के लिए बिदा हो गए।

1947 ई० से स्वराज्य काल शुरू होता है। गणतंत्र राज्य की दिल्ली अंग्रेजों की बसाई नई दिल्ली में ही कायम हुई है, मगर यह कहलाएगी अठारहवीं दिल्ली ।

1911 ई० से, जब अंग्रेजों ने दिल्ली को राजधानी बनाया, अब तक इन बावन वर्षों में दिल्ली में क्या-क्या तबदीलियां हुई, इस पर एक निगाह डाल लेना दिलचस्पी से कुछ खाली न होगा ।

दिल्ली का जिला सबसे पहले 1819 ई० में बना था। इसमें उत्तर और दक्षिण के दो परगने थे। उस वक्त तहसील सोनीपत जिला पानीपत का भाग थी और वल्लभगढ़ का बेशतर हिस्सा एक खुद मुखतार रियासत थी। गदर के कोई दस वर्ष पूर्व यमुना के पश्चिमी किनारे के करीब 160 गांवों को दिल्ली जिले में शामिल करके उसे पश्चिमी परगना बनाया गया था। लेकिन गदर के बाद उन्हें फिर से उत्तर प्रदेश में मिला दिया गया जिसका नाम उस वक्त उत्तर पश्चिम सूबा था। 1861 ई० के बाद इसमें दो तहसीलें रहीं- वल्लभगढ़ और सोनीपत, लेकिन 1912 ई० में जब दिल्ली का अलहदा सूबा बनाया गया तो सोनीपत को रोहतक जिले में मिला दिया गया और बल्लभगढ़ तहसील का बड़ा भाग गुड़गांव जिले में मिला दिया गया। 1915 ई० में गाजियाबाद तहसील के 65 गांव दिल्ली में शामिल किए गए।

इस जिले की सबसे मुख्य वस्तु यहां की पहाड़ी है जो अरावली पर्वत का अंतिम सिलसिला है। यह सिलसिला वजीराबाद में जाकर समाप्त होता है जो यमुना नदी के किनारे है। यह दरिया के साथ-साथ शाहजहांवाद को घेरता हुआ चला गया है और नई दिल्ली के पश्चिमी छोर तक पहुंच गया है जिसके एक ओर सरकारी दफ्तर और राष्ट्रपति भवन बने हुए हैं। यहां से यह सिलसिला महरौली तक चला गया है जहां जाकर उसकी अनेक शाखाएं हो गई हैं जिनमें से कुछ गुड़गांव को चली गई हैं और कुछ दरिया के पश्चिम तक पहुंच जाती हैं। उनमें से एक पर तुगलकाबाद का किला बना हुआ है। इस प्रकार दरिया और पहाड़ी के बीच एक त्रिकोण बना हुआ है जिसका एक कोण वजीराबाद, दूसरा तुगलकाबाद और तीसरा महरौली है। इत्ती त्रिकोण के बीच के क्षेत्र में विभिन्न दिल्लियों के बेशुमार भग्ना-वशेष दिखाई देते हैं जिन्हें खंडहात कहा जाता है। महरौली और तुगलकाबाद के

प्राक्कयन

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इलाके को कोही, यमुना के साथ वाले इलाके को खादर, नहरी इलाके को बांगर और नजफगढ़ झील के इलाके को डाबर कहकर पुकारते हैं। नजफगढ़ झील का पानी एक नाले के द्वारा यमुना नदी में जाकर मिल जाता है।

दिल्ली भारत के सबसे छोटे सूबों में से है जिसकी अधिक-से-अधिक लम्बाई 33 मील और अधिक-से-अधिक चौड़ाई 30 मील है। इसका कुल क्षेत्रफल केवल 573 वर्गमील है।

गदर के बाद से 1912 ई० तक, जब दिल्ली का एक अलग सूबा बना, और उसके भी बहुत असें बाद तक इसका न तो कोई खाल राजनीतिक, आर्थिक और सामा-जिक विकास हो पाया और न ही यहां की आबादी बहुत बढ़ पाई।

सियासी लिहाज से पहली बार 1905-6 ई० में बंग-विच्छेद के कारण यहां देश-भक्ति की एक लहर उठी और स्वदेशी की तहरीक ने कुछ जोर पकड़ा, मगर वैसे गदर के बाद यहां के लोग कुछ ऐसे सहम गए थे कि अधिकतर अंग्रेजों की खुशनूदी हासिल करने में ही लगे रहते थे। यही कारण है कि दिल्ली कोई मार्के के नेता पैदा न कर सकी, खासकर हिन्दुओं में। ले देकर दिल्ली ने दो ही नेता पैदा किए - एक हकीम अजमल खां साहब और दूसरे आसफ अली साहब। वरना और तो जितने थे, बाहर वाले थे। गदर के बाद शुरू-शुरू में तो अंग्रेज हिन्दुओं को बढ़ावा देते रहे और मुसलमानों को उन्होंने दबाकर रखना चाहा। मगर वह सदा बरतते थे फूट डालकर राज्य करने की नीति, इसलिए जब हिन्दुओं में कुछ जागृति आती दिखाई दी तो उन्होंने मुसलमानों को बढ़ावा देना शुरू कर दिया। इस फूट का जाहिर रूप दिखाई देता था कौमी दंगों की शक्ल में जो दिल्ली में रामलीला और ईद के मौकों पर अक्सर होते थे।

मगर यह बात नहीं है कि दिल्ली में आजादी का जजबा बिल्कुल रहा ही न हो। उसका पहला प्रदर्शन हुआ 1912 ई० में जब लार्ड हाडिंग पर बम फेंका गया। मगर यह काम था क्रांतिकारियों का। इसलिए आम जनता इससे उभर न सकी । दिल्ली में सियासी तहरीक का अत्तल आगाज हुआ 1914 ई० में युद्ध प्रारम्भ होने के बाद । होम रूल आन्दोलन से और फिर 1919 ई० के गांधीजी के रौलेट कानून के विरुद्ध आन्दोलन से उस वक्त से जो लहर चलनी शुरू हुई, वह 1947 ई० में स्वराज्य लेकर ही बंद हुई। दिल्ली फिर सियासी मैदान में किसी अन्य प्रान्त से पीछे न रही ।

रही बात आर्थिक विकास की। सदियों से विभिन्न हकूमतों की राजधानी रहने के कारण यहां दस्तकार और नौकरी पेशा लोग ही अधिक रहते आए हैं। इसलिए दिल्ली तिजारत का कोई बड़ा केन्द्र नहीं रही। बेशक यह असें से कपड़े की एक बड़ी मंडी रही है और पंजाब तथा उत्तर प्रदेश की कपड़े की जरूरत को पूरा करती रही है। यहां कपड़े के दो-तीन कारखाने भी लगे, मगर शुरू में यहां कोई बड़े कल

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दिल्ली की लोज

कारखाने न थे। मुकामी जरूरियात को पूरा करने के लिए यहां अनाज और किराने का काम भी अच्छे पैमाने पर होता था। मगर यहां के मुसलमान अधिकतर कारीगर पेशा थे और हिन्दू अधिकतर तिजारत पेशा या नौकरी पेशा। शुरू में सरकारी मुलाजमत में मुसलमानों को कम लिया जाता था। उन पर विश्वास कम था इसलिए हिन्दू अधिक रखे जाते थे। तिजारत तो हिन्दुओं के हाथ में थी ही। यह मुसलमानों के हाथों में तब बड़ी जब पंजाबी मुसलमान दिल्ली में आए और सदर बाजार को उन्होंने अपनी मंडी बनाया। वरना दिल्ली का मुसलमान तो अधिकतर कारीगर दस्तकार ही ता आया है। यहां की बाजवाज दस्तकारियां बहुत मशहूर थीं, मसलन गोटे-किनारी का काम, जरदोजी का काम, कसीदाकशी और छपाई का काम । हाथसिले कुरतों और अंगरखों तथा टोपियों पर बड़ी बारीक कढ़ाई का काम यहां ग्राम था। फिर ठप्पागीरी, कंदलाकशी, सोने-चांदी के जेवर और वरतन व वर्क बनाने का काम, सादेकारी, मीनाकारी, मुलम्मेसाजी, पटवागीरी, यह दसियों किस्म की दस्तकारियां यहां थीं। जेवरात ने इतनी तरक्की की थी कि शरीर के हर भाग के लिए कई-कई किस्म के अलग-अलग जेवर होते थे, मसलन अंगुलियों में अंगूठी, छल्ले, धार्ती, पंचांगला; कलाई पर चूड़ी, कड़े, पछेली, दस्तबंद नौगरी, पहुंची, कंगन, कंगना, छन; बाजुओं पर भुजबंद, जौशन गले में गोप हंसली, जंजीर, कंठी, दुलडा, तिलड़ा, पंचलड़ा, सतलड़ा, नौलड़ा, हारजों, हार पटड़ी, हारलोंग, हार नौलखा, गुलुबंद, तोड़ा, हॅकल, बद्दी, टिकड़ा, माला, सीतारामी चंद्रकला, चौरीतांसु, टीप; कानों में बाली, पत्ते, करनफूल, झुमके, कांटे, मगर चौगानी, लोंग, बाले; सिर पर शीशफूल, बिन्दी बेना, झूमर, चोटी, बोलड़ा; कमर में तगड़ी; पैरों में पायजेब, झाशंन, रमझोले, चूड़ी, कड़े, तोड़े, लच्छे, सूत, पायल टांक; पैर की उंगलियों में बिछवे, चुटकी, छल्ले नाक में भोगली, लोंग, नथ और न जाने क्या-क्या सैकड़ों ही किस्म थीं गहनों की जो हजारों लोगों की रोजी का जरिया था। मर्द भी गहने पहना करते थे और देवता भी। कई मर्द वाले, जंजीर, गोप, कंठा, जौशन, भादि अक्सर पहनते थे। तांबे, कांसा और पीतल के बरतन भी यहां बनते थे। काठ और हाथीदांत का काम यहां का मशहूर था। फिर नक्काशी का काम, चित्रकारी का काम भी होता था। इत्र और तेल फुलेल, सुरमा भी यहां की खास चीजें थीं। सलीमशाही जूता तो यहां की खास दस्तकारी थी ही। मगर उन दिनों आपा-धापी न थी। लोग थोड़े पर ही कनाअत करते थे। यहां का रिवाज था- 'दिये जले और मर्द मानस घर भले'। दिये जले से बाजार बंद हो जाता था और लोग घर चले जाते थे। व्यापारी थोड़े नफे से ही संतुष्ट रहते थे। उसी कमाई में तीज-त्योहार, लेन-देन, ब्याह-शादी, घर बनाना, दान-पुण्य सब हो जाता था। नौकरियां उन दिनों अधिकतर कमेटी और कचहरी की, रेल और तारघर की या दफ्तरों की हुआ करती थीं। राजधानी बनी तो सरकारी दफ्तरों में शुरू में अधिकतर बंगाली
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थे जो कलकत्ता से आाए थे। उनके लिए तिमारपुर में कौलोनी बनी थी। मगर वह अधिक समय तक यहां न रह सके। यहां जो-कुछ आर्थिक उन्नति हुई है, वह 1914ई० के युद्ध के बाद से या फिर देश-विभाजन के बाद से ।

सांस्कृतिक लिहाज से दिल्ली सदा ही एक तहजीब और तमद्दन का मरकज रही है जिस पर इसको नाज था। यही बात यहां की जुबान के लिए भी है। भाषा यहां की उर्दू थी जो दिल्ली की पैदायश मानी जाती है और जिसका अर्थ है लशकरी । फौजों में हर प्रान्त और सूबे के सिपाही भरती होते थे और अरब भी उसमें थे। यहां की प्राचीन भाषा ब्रज भाषा (खड़ी बोली) थी। फारसी और ब्रज भाषा के संयोग से उर्दू बन गई जिसमें दीगर जुबानों के अलफाज भी शामिल हो गए। यह मुस्लिम भाषा कैसे कही जाती है, समझ में नहीं आता। बेशक मुस्लिम काल की ईजाद यह जरूर है। जुबान यहां की निहायत शुस्ता और सलीस थी। लखनऊ और दिल्ली में इस पर सदा होड़ रहती थी। कुछ अंशों में लखनऊ फोकियत ले जाता था तो कुछ में दिल्ली। इसमें हिन्दू-मुस्लिम का कोई ख्याल था ही नहीं। हिन्दू भी उर्दू ही पड़ते थे। हिन्दी का अधिक रिवाज हुआ आर्यसमाजियों के आने से। मुगलों की भाषा फारसी थी, मगर उन्होंने भी उर्दू को अपनाया और शेर ओ सुलुन को उर्दू में बढ़ावा दिया। ग्रालिब को कौन नहीं जानता। जौक, मीर, तकी ये सब दिल्ली वाले ही थे। अक्सर अदबी मजलिसें हुआ करती थीं। बड़े-बड़े मुशायरे होते थे। गाने-बजाने का भी यहां अच्छा शौक था, मगर बाजारू गाने नहीं । शादियों पर महफिलें हुआ करती थीं और बारात के सामने मुजरे। मगर सब बातें कायदे-करीने के साथ होती थीं। अदव और लिहाज का ख्याल रखा जाता था। सदियों से मंझते-मंझते दिल्ली की एक खास तहजीब बन गई थी। दिल्ली वालों का रहन-सहन, अदब-आदाब, नशिस्त ओ बरखास्त, बोल-चाल, तीज-त्योहार, मेले-ठेले और तमाशा, इन सब में कुछ ऐसा सलीका और करीना था कि दिल्ली की तहजीब एक मिसाल, एक नमूना समझी जाती थी। सब में मोहब्बत थी, खलूस था, भाईचारा था। हिन्दू-मुसलमान का चोली-दामन का साथ है, यह कहावत ग्राम थी। एक दूसरे के मुख-दुःख में, शादी-गमीं में, मेलों और त्योहारों में शरीक होते थे । यह आपस की फूट और कट्टरपन तो बहुत बाद का है जो अधिकतर सियासतदानों की देन है। लोग मोहल्लों में रहते थे। मुशतर्का खानदान तो उन दिनों होते ही थे, मगर मोहल्ला भर एक खानदान की तरह रहता था। मोहल्ले की बहू-बेटी सबकी बहू-बेटी मानी जाती थी। हर मोहल्ले का कोई-न-कोई बुजुर्ग चौधरी होता था जिसका सब को अदब होता था। उम्र में बाप से बड़े सब ताऊ कहलाते थे और छोटे चाचा । फिर औरतों में ताई, चाची, भाभी, बुआ, मौसी कहकर पुकारा जाता था। कोई किसी का नाम तो लेता ही न था। यहां तक कि भंगन, नायन, कहारी को भी रिश्ते के नाम से पुकारते थे। मोहल्ले में जो भी बात करनी हुई, वह चौधरी साहब से पूछ
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दिल्ली की खोज

कर की जाती थी। मोहल्ले भर की रक्षा और इज्जत की जिम्मेदारी चौधरी साहब की होती थी। क्या मजाल जो कोई बहू बिना परदे के घर से निकल सके। वरना उसके मियां को डांट पड़ती थी और मियां की क्या मजाल जो बुजुर्ग का सामना कर सके। क्या मजाल जो कोई नौजवान गलत रास्ते चल सके। उसका मोहल्ले में रहना दूभर हो जाए। सबको अपने मोहल्ले की इज्जत और हुरमत का ख्याले था। क्या जमाना था वह !

दिल्ली का लिबास भी जुदा ही था। मलमल और लट्टे का कुर्ता, अक्सर कढ़ा हुधा और सलवट पड़ी हुई। घोती या मोरी और चूड़ीदार पायजामा, अंगरखा और दुपलड़ी टोपी, बगल में दुपट्टा या कंधे पर रूमाल, सलीमशाही जूता-यह थी अवाम की पोशाक। नंगे सिर, नंगे पैर घर से निकलना मायूब समझा जाता था। पगड़ी और साफे का भी रिवाज था और चोगा पहनने का भी। जौह-रियों की पगड़ी छज्जेदार होती थी। यहां के हज्जाम भी पगड़ी लगाते थे और कानमैलिये भी जिनकी पगड़ी लाल होती थी। हर बात में एक बजादारी थी। दुपलड़ी टोपी का स्थान लिया फैल्ट कैंप ने और मुसलमान पहनने लगे फूंदनेदार टरकी टोपी। गोटे के कपड़े भी पहने जाते थे। किम्वाब के अंगरले और चोगे बनते थे। फिर अचकन और कोटों का रिवाजू हुआ। कोट पतलून और टाई कौलर का रिवाज तो बहुत देर से जाकर हुआ, वह भी वकीलो और डाक्टरों में अधिक था। लिबास में भी एक खास बजादारी थी।

खान-पान का भी एक ढंग था। बाजार में खाने का रिवाज कम था। चलते. फिरते खाना, दुकान पर खड़े होकर खाना अच्छा नहीं समझा जाता था। गोश्त की दुकानों को ढक कर रखते थे। हिन्दुधों के अहसास का ख्याल रखा जाता था । यहां की मिठाई और नमकीन भी खास थे। नगौरी पूरी और बेड़मी, हलवा यहां का मशहूर था। इसी तरह घंटेवाले का कलाकंद और सोहन हलवा खास था। यहां बीसियों किस्म की मिठाई बनती थीं, मसलन लड्डु, पेड़ा, इमरती, घेबर, फेनी, अंदरसे की गोली, मोती पाग आदि बहादुरशाही सेब बादशाहपसंद मिठाई थी। दो चीज यहां की और खास होती थी-गजक और दौलत की चाट । बरसात में तिलंगनी भी खास होती थी ।

दिल्ली में सौदा सुलफ बेचने में भी शायस्तगी बरती जाती थी। खोंचेवाला बड़े मीठे सुर में आवाज लगाकर सौदा बेचता था। उसकी तरह-तरह की बोलिया होती थीं। बरसात का मौसम है। रात का समय है। खजूर बेचनेवाला रात को सुरीली आवाज में कहेगा- 'शीदी गौहर के बाग का मेवा बना' । हर चीज के लिए कोई लच्छेदार बोली जरूर होती थी। चीज को उसके नाम से न पुकारकर

प्राक्कथन

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दूसरी ही तरह उसे पुकारा जाता था जिसे समझने वाला ही समझ सके। मशक का पानी कटोरा बजा कर पिलाया जाता था ।

दिल्ली की सवारियां भी जुदा ही थीं। हुवादार पालकी, नालकी, तामझाम बादशाही जमाने की सवारियां थीं। पहले परदा न केवल होता था मुमलमानों में, बल्कि हिन्दुओं में भी परदे का रिवाज था। औरतें एक जगह से दूसरी जगह परदा डालकर डोली में जाती थीं जिसे कहार उठाते थे। फिनस और तामझाम भी चलते थे। इन्हें भी कहार उठाते थे। सवारी में बैल की मझोली थी या घोड़े का इक्का चलता था। तांगे तो 1911 ई० के दरबार के समय दिल्ली आए । रईसों के यहां तरह-तरह की सवारियां होती थीं। घोड़े रखने का बहुत रिवाज था। आम तौर से एक घोड़े की सवारी में फिटन, पालकी, वैगनेट, दुपहैया आदि होती थी । जोड़ी सवारी में पालकी, फिटन और लेंडो चलती थी। एक-दो रईस चौकड़ी भी रखते थे। शहर में हाथी आने की इजाजत नहीं थी। छः घोड़ों की गाड़ी के लिए इजाजत लेनी पड़ती थी। सबसे पहली मोटर श्री कृष्णदास गुड़वालों के यहां आई थी जो बहुत ऊंची और खुली हुई थी। धूम मच गई थी उसे देखने को ! अब तो शायद दो चार के यहां ही अपना गाड़ी-थोड़ा होगा।

यहां के रस्मों रिवाज भी जुदा हो किस्म के थे। शादियां यहां पंद्रह-पंद्रह दिन तक होती रहती थीं। कई-कई दिन तक दावतें और महफिलें चलती थीं। अब शादी होती है चंद घंटों में, खड़ा खेल फर्रुखाबादी ।

यहां के मेले भी अपनी किस्म के जुदा थे। दिल्ली में मेलों की भरमार रहती थी। चैत्र आया कि शुरू में माता पूजी गई। बुद्धो माता का मेला और बरा-हियों का मेलो होता था। फिर आए नौरात्रे और देवी की मान्यता होने लगी। गणगौर पुजने लगी। कालकाजी पर शहरी और देहातियों का भारी मेला होता था। सप्तमी-अष्टमी को गांववालों का और नौमी को शहरियों का जो ओखले में यमुना का स्नान करके आते थे। रामनौमी को राम का जन्मोत्सव मनाया जाता था ।

बैसाख में वैसाखी नहान तो होता ही था, और भी कई मेले होते थे। दिल्ली का जेठ का दशहरा मशहूर था। हजारों जाट जाटनी अपने-अपने लठ लिए यमुना स्नान को धाते थे। अब तो यह बंद ही हो गया। एकादशी के दिन खरबूजों के ढेर लगे रहते थे। पंखे और चीनी के चंदे-बताशे खूब बिकते थे।

आषाढ़ की शुक्ला दूज को रथयात्रा का मेला बड़ी धूमधाम से होता था। जगन्नाथजी की सवारी निकलती थी। फूलहार खूब बिकते थे। फिर पूर्णिमा को गुरु की पूजा तो होती ही थी। शाम को झंडेवालों पर पवन परीक्षा का मेला होता था। इसी महीने परेड के मैदान में नरसिंह चौदस का मेला लगता था ।

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दिल्ली को खोज

श्रावण में तीजों का मेला झंडेवालों पर फिर लगता था। खूब झूले झूले जाते थे। फूलवालों की सैर की नफीरी जब बजती थी तो कुतुब की सैर की तैयारियां होने लगती थीं। दरगाह और योगमाया पर पंखे, चढ़ते थे। पूर्णिमा के दिन श्रावणी का मेला होता था।

भादों में जन्माष्टमी दो दिन बड़ी धूमधाम के साथ मनाई जाती थी। फिर गणेश चौथ की बारी आती थी जिसमें गणेशजी की पूजा की जाती थी। डंडे खेले जाते थे जिसे चौकक्नी कहते थे। आम के पापड़, चम्पे दाना जैसी खास चीजें बिकती थीं। फिर अनन्त चौदस का मेला और कई मेले इस महीने में जैनियों के होते थे- अठ्या, धूप दसमी आदि। अनन्त चौदस को जौहरी अपने बहुमूल्य जेवरात पहनकर पानी भरने जाते थे।

आसौज में सांझियां और झांकियां निकलती थीं और फिर 11 दिन राम लीला का जोर रहता था। दशहरे के दिन बड़ी धूमधाम रहती थी। पूर्णमासी को शरत मनाई जाती थी ।

कार्तिक में दीवाली की तैयारी होती थी। एकादशी से ही मिट्टी के खिलौने निकलने शुरू हो जाते थे। मिट्टी के छोटे-बड़े दीये रोशनी करने को लांब के खिलौने और सील की बिक्री खूब होती थी। धनतेरस को बरतन बिकते थे। फिर छोटी दीवाली, बड़ी दीवाली, अन्नकूट और भाईदूज मनाते थे । इससे निपट कर गढ़मुक्तेश्वर गंगा स्नान को चल दिए। वह भी एक अजीब नजारा होता था। सैकड़ों छकड़े, मझोली, रथ गांववालों के जाते थे। तांते लग जाते थे, फिर इक्के-गाड़ी वगैरा ।

मंगसिर और पौस के महीने जरा शान्ति के रहते थे, मगर माघ में मकर संक्रांति खूब धूम से होती थी और फिर फागुन आया कि फाग की तैयारियां हुई। ढोलक बजने लगी। रातों को स्वांग होते थे। घुलहंडी के दिन कम्पनीबाग में बड़ा भारी मेला भरता था। उस दिन आम के बौर को हाथ में मलने से सांप नहीं काटता, यह रिवायत थी ।

हिन्दुधों की तो 'आठ वार और नौ त्योहार' की पुरानी मसल है ही, मुसल-मानों की भी ईद होती थी और ताजिये बड़ी धूमधाम से निकलते थे।

जैनियों और सिखों के मेलों का जोर धीरे-धीरे बढ़ा और ईसाइयों के त्यौहार तो अभी हाल में मनाए जाने लगे हैं। बेशक बड़े दिन और नए साल का जोर अंग्रेजों के जमाने में खूब रहता था। बुद्धपुणिमा भी कुछ वर्षों से शुरू हुई है।

लोगों को इमारतें बनाने का बहुत शौक था। अधिकतर मकान इकमंजिला बनते थे क्योंकि दिल्ली में उन दिनों जमीन की तंगी तो थी नहीं और मकान भी

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निहायत कुशादा और हवादार होते थे। मुसलमानों में परदा अधिक होने के कारण जनाना मरदाना मकान अलहदा रहता था। हर मकान में महल, सराय हमाम, तहखाना और बैठने को बैठक होती थी।

मुगलों को बाग लगाने का भी बहुत शौक था। चुनांचे हर मकान के सहन में छोटा-मोटा बगीचा भी रहता था। वैसे दिल्ली में बड़े-बड़े आलीशान बाग थे। यहां की सब्जीमंडी का इलाका तो बागों से भरा, पड़ा था। आबपाशी के लिए नहर थी ।

पुरानी दिल्ली में शालामार बाग कड़ेखां, महलदार खां, शीदीपुरा, करौलबाग, गुलाबी बाग, नई दिल्ली में सुनहरी बाग, तालकटोरा बाग यह सब उसी जमाने की यादगार हैं। हर मकबरे के साथ एक बड़ा बाग, पानी की नहर और फव्वारे नगाना यह चीजें आम थीं। शाहजहां रोड पर जो लोदी बाग है वह लोदियों के मकबरे का ही हिस्सा है। ऐसे ही हुमायूं के मकबरे में और सफदरजंग मकबरे में बड़े-बड़े बाग है। चांदनी चौक में, जहां अब भागीरथ पैलेस है, पहले शमरू की बेगम का बाग था। महरौली में कई बाग थे जहां गर्मियों में बादशाह जाकर रहा करते थे। लाल किले के सामने बाग ही बाग थे। गर्ज दिल्ली बागों से भरी पड़ी थी। चारों ओर खूब सायदार वृक्ष लगे हुए थे और खूब वर्षा होती थी। दिल्ली में गर्मी तो खूब पड़ती ही थी, लू भी खूब चलती थी। इनसे निजात इन बागों के ही सहारे मिलती थी। सारे चांदनी चौक में 1912 ई० से पहले बीच में बड़े-बड़े सायदार वृक्ष लगे हुए थे और बीच की नहर को बद करके पटड़ी बना दी थी। 1912 ई० में डिप्टी कमिश्नर बीडन ने तमाम वृक्ष कटवा दिए, पटड़ी निकलवा दी और एक सड़क बनवा दी।

दिल्ली में सब्जी और फल भी बहुत कसरत से पैदा होते थे। महरौली की खिरनी और शीदी गोहर के बाग की खजूर मशहूर थी, लोकाट और शहतूत बहुता-तायत से होता था। जामुन, बेर, गोंदनी, फालसे, कमरत, अमरूद और सरौली के आम जो कम्पनी बाग में खास कर लगते थे, काफी मिकदार में होते थे। देशी खरबूज और तरबूज, जो जमना की रेती में होते थे, खासे मशहूर थे, वैसे ही खीरे और ककड़ी । ककड़ी जितनी पतली हो, अच्छी मानी जाती थी। चुनांचे पतली ककड़ी की मुशाहबत लैला की उंगलियों से दी जाती थी। वह लौंग ककड़ी कहलाती थी।

यद्यपि दिल्ली राजधानी बन गई थी, मगर सरकारी दफ्तर यहां जाड़े के दिनों में ही रहते थे। गर्मी वे गुजारते थे शिमले में, इसलिए यहां की आबादी तेजी से बढ़ नहीं पाती थी। वह आने-जाने वाली बनी रहती थी। नई दिल्ली में शुरू-शुरू में पुरानी दिल्लीवाले अपने मकान बनाना पसंद ही नहीं करते थे क्योंकि बरसों तक वहां न कोई आबादी थी, न व्यापार। यही कारण है कि दिल्ली के करियों की बहुत कम जायदाद नई दिल्ली में बन सकी।

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बिल्ली की खोज

दिल्ली की आबादी बढ़ने लगी 1914 ई० से जब यूरोप का पहला युद्ध शरू हुआ। उस जमाने में यहां की तिजारत बहुत बढ़ गई और लोग इधर-उधर से आकर यहां रहने लगे। आबादी के साथ-साथ यहां के मकान भी बढ़ने लगे, मगर किराया और महंगाई इतनी नहीं थी जो कंट्रोल लगाने की जरूरत पड़ती ।

आबादी बढ़ने का अधिक जोर हुआ जब से सरकार ने शिमला जाना बंद कर दिया और सरकारी मुलाजिमों के लिए यहां उपनगर बनने लगे। उबर 1939 ई० का विश्व-युद्ध आ गया जिसने यहां की तिजारत और धंधों को बहुत बढ़ा दिया। साथ ही दिल्ली में इमारतें बनाने का काम भी बहुत बढ़ गया और कल-कारखाने भी बढ़ने लगे। मजदूरों की बस्तियां बनने लगीं। 1947 ई० के देश-विभाजन के बाद तो दिल्ली में आदमियों का टिड्डी दल ही आ गया। यहां की आबादी देखते-देखते दुगनी-तिगनी हो गई। न केवल शरणार्थी आए, बल्कि देश के हर हिस्से के लोग आकर यहां रहने लगे। नौबत यह पहुंची कि लोगों को जब रहने को मकान नहीं मिले तो ह‌जारों की संख्या में उन्होंने झोपड़ियां खड़ी कर लीं। खोले और सर ढकने को जो भी सामान मिला, उससे साया खड़ा कर लिया। वह भी न मिला तो पटड़ियों पर खुले में ही सोने लगे। सैकड़ों नई बस्तियां बन गई और लाखों नए मकान जिनमें न कोई प्लैनिग की बात थी, न नक्शे पास कराने की बात और न जमीन की मिल्कियत की बात रही। बस एक ही बात रही-

'सबै भूमि गोपाल की इसमें अंटक कहां । जाके मन में अटक है, वही अटक रहा।'

यहां की आबादी किस प्रकार बढ़ी, इसका अंदाजा नीचे के मरदुमशुमारी के धांकड़ों से लग सकेगा ।

गदर के बाद यहां की आबादी मुश्किल से लाख-डेढ़ लाख थी।

ई० 1881 में म्यु० इलाके की 1.7 लाख

1891

2.0 लाख

1901

2.09 लाख

4.06 सारी दिल्ली की

1-911

2.25 लाख

4.44

1921

2.48 लाख

4.88

1931

3.48 लाख

6.36

1941

" " " " 17

5.22 लाख

9.18

1951

9.15 लाख

17.44

1961

20.61 लाख 26,58,606

" 1961 की ग्राबादी के चार भाग हैं- 20,61,752 नगर निगम की;

प्राक्कथन

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2,61,545 नई दिल्ली की 36, 105 दिल्ली छावनी की और 2,99,204 दिल्ली के 320 देहातों की । इन आंकड़ों को देखने से पता लगता है कि 1901 ई० और 1931 ई० के तीस वर्ष में जहां आबादी डेढ़ गुनी से कुछ अधिक बढ़ी, वहां 1931 ई० और 1961 ई० के तीस वर्ष में वह चौगुनी से भी अधिक हो गई। इसका कारण यही है कि सत्तर हजार प्रति वर्ष तो वैसे ही लोग बाहर से नए यहां आ जाते हैं और पच्चीस प्रतिशत के करीव आबादी स्वाभाविक बढ़ जाती है। अभी जो मास्टर प्लान बनकर तैयार हुआ है, उसके अनुसार तो अनुमान है कि यहां की आबादी अगले बीस वर्ष में पचास लाख को भी पार कर जाएगी।

इस बढ़ती आबादी ने दिल्ली की एक प्रकार से नहीं, अनेक प्रकार से काया ही बदल डाली है और आज इसे पहचानना कठिन हो गया है। इसका असर न केवल लोगों के रहन-सहन के तरीकों पर पड़ा है, बल्कि खान-पान, बोल-चाल लिबास और भाषा, वाणिज्य-व्यापार, रस्मों-रिवाज, मेलों और खेलों, तहजीब और तमइन सभी पर पड़ा है। गर्ज जिन्दगी का कोई शोबा ऐसा बाकी नहीं बचा है जिस पर इसका असर न पड़ा हो। जो यहां का पचास-साठ वर्ष पहले का रहने वाला है वह अपने को खोया-खोया-सा पाता है। वह समझ ही नहीं पाता कि वह अपनी पैदायशी जगह पर है या किसी दूसरी जगह पहुंच गया है। उसे तो सब कुछ एक सपना-सा दिखाई देता है। दिल्ली के पुराने बाशिदे तो अब मुश्किल से दो तीन लाख ही होंगे, वरना अधिक आबादी अब नई है।

इस पुस्तक में जितना मसाला है, वह अधिकतर अंग्रेजी और उर्दू पुस्तकों से लेकर दिया गया है। मेरा कहने को इसमें नाममात्र ही है। जिन पुस्तकों के आधार पर यह पुस्तक लिखी गई है उनके नाम ये हैं:-

(1) Notes on the Administration of the Delhi Province, (2) Census Report-1931, (3) Delhi Guide, (4) Delhi, (5) The Ar-cheology & Monumental remains of Delhi by Carr Stephen, (6) Delhi-Past and present by H. C. Fanshawe (7) वाफयातदार उलहकूमत, दिल्ली (लेखक - बशीरउद्दीन अहमद देहलवी तीन भाग), (৪) दिल्ली टाउन डायरेक्टरी और (9) Sikh shrines in Delhi.

इनके लेखकों का मैं आभारी हूं, जिनकी मदद से मैं हिन्दी में यह पुस्तक तैयार कर सका ।

मैं श्री चंद्रगुप्त विद्यालंकार और श्री शोभालाल गुप्त, भूतपूर्व सहायक संपादक, हिन्दुस्तान का भी आभार प्रकट करना चाहता हूं जिन्होंने इसकी पांडुलिवि

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दिल्ली की खोज

देखकर इसे दुरुस्त किया है और श्री पी० सरनजी (इतिहासकार) का जिन्होंने इस पुस्तक के तारीखी पहलू की जांच की।

पाठकगण, यदि आपके पास इस मसरूफ जिन्दगी में इस बदलती और नापायदार दिल्ली की आप बीती को सुनने के लिए कुछ क्षण हों, तो आइए और इस पुस्तक का सहारा लेकर यहां की नई-पुरानी यादगारों पर एक निगाह डाल लीजिए ।

28-5-63

ब्रजकृष्ण चांदीवाला

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